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Thursday, July 15, 2010

न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर---(चर्चा मंच-215)

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सभी पाठकों को डी.के.शर्मा”वत्स” की ओर से राम-राम,नमस्ते,सलाम,सत श्री अकाल,जय हिन्द….

समय की कमी के चलते बिना आपसे कुछ कहे सुने सीधे चर्चा शुरू करते हैं….अपने द्वारा पढी गई चन्द पोस्टस को एकत्रित कर आज का ये चर्चा मंच सजा दिया है…..आप पढिए और आनन्द लीजिए……जै राम जी की!

कहानी--भूखा कहीं का ---कहानीकार सुश्री प्रतिभा सक्सेना---चिट्ठा---कहानी - कुञ्ज
किंडर-गार्टन से जो पढ़ाई शुरू हुई, तो साल-दर-साल गुज़रते गये और वह द्रौपदी के चीर सी लंबाती चली गई ।बी.ए.पास करते-करते मन पढ़ाई से भर गया ।उन्हीं दिनों समझा जाने लगा था ,जिसने बी.एड. कर लिया उसने बड़ा तीर मार लिया ।मैंने भी सोचा ,जिस काम में जीवन का एक युग से भी अधिक झोंक दिया ,वहाँ एक साल और सही ।सच तो यह है कि होस्टल में रह कर पढने का आकर्षण था ,जो मैंने बी.एड. ज्वाइन कर लिया ।
कहानी---सांझ पहर का उगता सूरज--कहानीकार सुमन कुमार—चिट्ठा---दादा जी का जूता
image सर-सर चलती पहुआ हवा ने बूढ़ी हड्डियों को अंदर तक कंपा दिया था। ओस से धोती घुटनों तक भीग गई थी। फिर भी स्वाभिमान के मरुस्थल की आंच कम नहीं हो रही थी। ठंड से प्लास्टिक के जूते कठोर हो गए थे जो धोखे से भी टखनों में लड़ जाते तो मानों प्राण ही निकल जाते। सांसें फूलने लगीं। घुटने जाम हुए जा रहे थे। शरीर शिथिल होने लगा, किन्तु संकल्प पूर्ववत् है। चले जा रहे है.. लाठी के सहारे..
स्‍पष्‍ट लिखने वालों के पाठक होते हैं और जो अस्‍पष्‍ट लिखते हैं. . .रचनाकार—श्रीमति अजीत गुप्ता—चिट्ठा---अजित गुप्‍ता का कोना
मुझे कई बार लगता है कि आज के लेखक के पास सिवाय बंदिशों के और कुछ नहीं है। राजनैतिक क्षेत्र के बारे में कुछ लिखेगा तब उस पर यह आरोप लग जाएगा कि यह फला विचारधारा का है और जिन्‍हें भी अपनी विचारधारा से विपरीत बात लगेगी तो वे उसपर आक्रमण सा कर देंगे। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र में तो इतने व्‍यवधान है जैसे एक बाधा दौड़ के धावक को बाधाएं पार करनी होती हैं वैसे ही बेचारे लेखक को बाधाओं से गुजरना पड़ता है। अब वह स्‍पष्‍ट कैसे लिखे?मैं भी इस विषय पर गोलमाल ही करने वाली हूँ। किसी धर्म की आलोचना आप नहीं कर सकते। किसी सम्‍प्रदाय के बारे में नहीं लिख सकते। बहुत सारे ऐसे शब्‍द हैं जिनका प्रयोग नहीं कर सकते। गांधी जी ने एक शब्‍द दिया “हरिजन” आज उसका प्रयोग नहीं कर सकते। ऐसे ही कितनी बाधाएं हैं जिसे लेखक को पार करनी होती है।
मीठा खाओ तनाव भगाओ---संजीव शर्मा—चिट्ठाSanjivani
यदि आप तनाव और आक्रामकता से दूर रहना चाहते हैं तो मीठी चाय पिएं। मनोचिकित्सकों का मानना है कि मीठे पेय काम के तनाव को दूर करते हैं और आक्रामकता व बहस की प्रवृत्ति को भी कम करते हैं।एक अध्ययन के अनुसार मीठे पेय पदार्थो द्वारा प्राप्त ऊर्जा से मस्तिष्क को अपने आवेगों पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। इसका मतलब है कि इससे लोगों को तनाव में खुद के द्वारा अनायास प्रतिक्रिया देने से रोकने में मदद मिलती है।
ज़िंदगी का गणित---संगीता स्वरूप---चिट्ठा--गीत....मेरी अनुभूतियाँ
ज़िन्दगी,
गणित के
सवालों की तरह
कहीं जोड़ है तो कहीं घटाना
कभी गुणा है तो कभी भाग
और जब आ जाती है
भिन्न की परिस्थिति
तो होता है सामना
कठिनाइयों का
न जाने कितनी तरह के
कोष्ठों में बंटीं ज़िन्दगी
उलझ उलझ जाती है
ओक में पानी की इच्छा--प्रमोद
उसकी इच्छाओं में मानसून था
और मेरी पीठ पर घास उगी थी
मेरी पीठ के ढलान में जो चश्मे हैं
उनमें उसी की छुअन का पानी चमक रहा है
इस उमस में पानी से
उसकी याद की सीलन भरी गंध उठ रही है
मेरे मन की उँगलियों ने इक ओक रची है
इस ओक में पानी की इच्छा है
बदलती हवायें---पलाश
युग बदले मौसम बदले
बदले इंसानों के चेहरे
धर्म और कर्म रहे मगर
आस्थाएं और वजहें बदल गयी
हवाओं की ठंडक बदल गयी
लू की तपिश भी बदल गयी
सलोने से बसन्त की
तरुणाई भी है बदल गयी
रिश्ते और नाते है अब भी
निभाने के तरीके बदल गये
शब्दकोष तो रहा वही
बस उच्चारण बदल गये
आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूं मैं !---अली सैयद---चिट्ठा---उम्मतें 
सुबह सुबह दिनेश राय द्विवेदी जी के हैंगोवर के टिकाऊपन के लिए चिंता व्यक्त कर ही रहा था कि डा.अरविन्द मिश्र जी अधरों से कपोल तक की जात्रा में शामिल हो लिये !  पता नहीं उन्हें ये उम्मीद कैसे हुई कि दिवेदी जी को 'सारा कार्बोनेरो' के बारे में विस्तृत जानकारी होगी? शायद ऐसे ही कारणों से मैं अपने आलेखों में किसी खूबसूरत शै  की फोटो छापने से डरता हूं कि कहीं भाई बंद डिटेल ना पूछने लग जायें ! आज भले ही हम तीनों की उम्र जगन्नाथ जात्रा  में शामिल होने की है पर लालसाओं  का क्या करें, कमबख्त पलट पलट कर आती हैं स्मृतियों के खूबसूरत लम्हों के अक्स बनकर जेहन में !

सावधान,आपकी प्रोफाईल कमेंट्स खा रही है।—-बता रहे हैं जाकिर रजनीशचिट्ठा---मेरी दुनिया मेरे सपने
'वोट कटवा कंडीडेट' तो आपने सुने होंगे, जिसका उपयोग चुनाव में विरोधी पार्टी के लोग करते हैं। लेकिन शायद आपके लिए 'कमेंट कटवा प्रोफाइल' नया शब्द हो? लेकिन आज से इसे अपने शब्दकोश में शामिल कर लीजिए क्योंकि आप अंजाने में ही इसके शिकार हैं और आपके ना जाने कितने कमेंट आपकी प्रोफाइल खा चुकी है।
आखिर धर्म परिवर्तन जरुरी क्यों है ? - तारकेश्वर गिरी.चिट्ठा---काम की बातें
हमारे देश मैं जो भी धर्मपरिवर्तन कि गतिविधियाँ चल रही हैं,उसे देख कर यही लगता है कि धर्म परिवर्तन आस्था के साथ-साथ लालच के लिए भी किया जा रहा है.गाज़ियाबाद के विजय नगर में इसाई मशीनरियां आज भी पैसे के बल पर धर्म परिवर्तन करवा रही हैं. और वो भी मात्र ३ लाख रुपये में. गरीब और पिछड़े हुए लोग इसमें बढ़ चढ़ करके भाग ले रहे हैं.पैसे के साथ-साथ उन्हें तुरंत चमत्कार का लालच भी दिया जा रहा है. आज भी अगर आप सुबह- सुबह टी वी खोल कर के देखे तो उसमे कैसे-कैसे चमत्कार दिखा कर के लालच दिया जाता है कि आप अपना धर्म परिवर्तन करले.

दर्द दिया है तुमने मुझको, दवा न तुमसे मांगूंगा - सतीश सक्सेना----चिट्ठा--मेरे गीत !
एक कवि ह्रदय के स्वाभिमान और अपनी ईमानदारी के साथ,कुछ हद तक आहत मन का छलकता गर्व,महसूस करें! दो अलग अलग प्रकार के गर्वीले दोस्तों का टकराव,  कुछ इस प्रकार की रचना को जन्म देता है !
समझ प्यार की नही जिन्हें
है, समझ नही मानवता की
जिनकी अपनी ही इच्छाएँ
तृप्त , नही हो पाती हैं ,
दुनिया चाहे कुछ भी सोचे कभी न हाथ पसारूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

चिडियों का भी छोटा मन है
फिर भी वह कुछ देती हैं
चीं चीं करती दाना चुंगती
मन को हर्षित करती हैं
राजहंस का जीवन पाकर क्या भिक्षुक से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

यात्रा----साकार से निराकार तक.....पं.डी.के.शर्मा “वत्स”---चिट्ठा---धर्म यात्रा
image सफर के दौरान कुछ लोगों की आदत होती है कि वो कोई न कोई पुस्तक/समाचार पत्र इत्यादि पढते रहते हैं.वैसे मैं स्वयं भी इसी आदत का शिकार हूँ. कुछ दिन पहले की बात है, ट्रेन में सफर के दौरान,अपने अनन्त अज्ञान में कमी करने की खातिर मैं 'ओशो' की एक पुस्तक पढ रहा था.मेरे बगल की सीट पर बैठे एक भाई को या तो कोई काम नहीं था या शायद उन्हे एक पंडित को देखकर अपनी कोई जिज्ञासा मिटाने की सूझी, बोले---
देसिल बयना:-बैठे बैठे पेट पर हाथकरण समस्तीपुरी---चिट्ठा---मनोज
मार बढ़नी....पता नहीं कौन दुश्मन खाते वक़्त याद किया....इतना जोर से सरके कि आँख लोरा (आंसू आ जाना)गया। सच्चे कहता हैं....मजाक नहीं !अरे महराज, आज दुपहर में गए कलेऊ (दोपहर का भोजन) खाए तो पैंतीस रुपैय्या में भरपेट्टा थाली औडर किये। इहाँ दक्खिन में खाना में दही-भातजरूर देगा। थाली में उज्जर दक-दक चमकते दही-भार के ऊपर हरियर-पियर अंचार और लाल-लाल अनार के दाना देख के जी ऐसा सिहाया (ललचाया)कि हुलस के भर बेलचा (बड़ा चम्मच)मुँह में कोंच लिए। इस से पहिले कि दही-भात हल्लक से ससरे एगो ऐसन न किस्सा याद आ गया कि रोकते-रोकते भी फरफरा कर हंसी निकल गया। 
कहाँ से आया था वो......शरद कोकास---चिट्ठा---ना जादू ना टोना
image अब तक बहुत सारे विषयों पर हम लोग बात चीत कर चुके हैं । यह बृह्मांड कैसे बना, सूर्य चाँद सितरे ,पृथ्वी कैसे बने, पृथ्वी पर जीवन कैसे आया । सजीव और निर्जीव में क्या फर्क़ होता है, सजीवों के क्या लक्षण होते हैं आदि आदि । अब देखते हैं कि इस पृथ्वी पर मानव का आगमन कहाँ से हुआ और कैसे हुआ ?
"जीवन की अभिव्यक्ति!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)चिट्ठाउच्चारण
क्या शायर की भक्ति यही है?
जीवन की अभिव्यक्ति यही है!
शब्द कोई व्यापार नही है,
तलवारों की धार नही है,
राजनीति परिवार नही है,
भाई-भाई में प्यार नही है,
क्या दुनिया की शक्ति यही है?

जीवन की अभिव्यक्ति यही है!
अगर आप मोबाईल रिचार्ज का काम करते है तो सावधान हो जाए !—खबरदार कर रहे हैं नरेश सिँह राठौड---चिट्ठामेरी शेखावटी

जी हां यह सच है| अभी इन दिनों में इस व्यसाय में ठगे जाने के बहुत से मामले आ रहे है| सभी मोबाईल कंपनिया इस बारे में बार बार अपने रिटेलर को सावधान कर रही है|फिर भी ये ठगी के मामले कम नहीं हो रहे है |
माँ की चिट्ठी ---रामेश्वर पटेल---चिट्ठा---स्वान्तः सुखाय
image प्रिय बेटे,
मैंने करोड़ों वर्षों से अपने आँचल की छाँव में मनुष्यता को पाला पोषा है | आदिमानव से लेकर आज तक के विकास क्रम की साक्षी,तुम्हारी यह माँ तुम्हे अपनी व्यथा कथा सुनाना चाहती है | बेटे, मैंने अनेक प्रलयकाल झेल कर तुम्हारे पूर्वजों को सदैव अपने आँचल में छुपाया तथा उन्हें नष्ट होने से बचाकर तुम्हारी पीढ़ी को आगे बढाया है,बरगी के पास नंदिकेश्वर तीर्थ के भूपपर्टीय भ्रंश,मंडला,रामनगर में करिया पहाड़ के ज्वालामुखीय अवशेष,सहस्त्रधारा की ग्रेनाईट की चट्टानें,लम्हेटाघाट की गोंडवाना लैंड चट्टानें, भेडाघाट की संगमरमरीय वादियाँ, डिंडोरी के घुघुवा जीवाश्म पार्क आदि ऐसे अनेक प्रमाण हैं जो प्रलय काल की उथल पुथल तथा उसमें मानव को सुरक्षित रखने की कथा कहते हैं | भयंकर दुर्भिक्षों के समय में भी मैंने अपने आँचल में कभी अकाल को फटकने तक नहीं दिया |

सूचनार्थ

गणतंत्र दिवस पर बहादुरी पुरस्कार के लिए बच्चों से आवेदन आमंत्रित--चिट्ठा--बाल-दुनिया
image उम्मीदवारों के चयन के लिए मुख्य मानदंडों में जीवन के खतरों से मुकाबला करते हुए घायल होना,सामाजिक बुराई अथवा अपराध के खिलाफ बहादुरी तथा साहसिकता,बाल्यकाल में जोखिमपूर्ण कार्य आदि को ध्यान में रखा जाएगा। आवेदन की सिफारिश से पहले प्रत्येक मामले की मौके पर जाँच अनिवार्य होगी। प्रत्येक आवेदन के साथ मामले की जांच रिपोर्ट भी होनी चाहिए। सभी संबंधों में पूर्ण सिफारिश के साथ आवेदन 30 सितम्बर, 2010 तक भारतीय बाल कल्याण परिषद, 4 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली- 110002 पर पहुंचना अनिवार्य है।

कल  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने एक कार्टून लगाया था!

कार्टून : वाह!! ....... इतनी सारी गरीबी ??!!!

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जनसँख्या दिवस पर एक कार्टून ...


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10 comments:

  1. डी.के.शर्मा”वत्स” जी!
    सुन्दर चर्चा करने के लिए धन्यवाद!

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  2. बहुत बढ़िया चर्चा...बहुत से लिंक्स मिले..आभार

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  3. अच्छे लिंक्स के साथ बहुत अच्छी चर्चा।

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  4. bahut sundar charchaa lagayii hai ............aabhaar.

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  5. @ पंडित डी.के.शर्मा वत्स जी ,

    अब देखिएगा ब्राह्मण का आशीर्वाद विफल नहीं जायेगा ,क्लब जरुर फूले फलेगा :)

    सुन्दर लिंक्स दिए आपने !

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  6. चर्चा बहुत अच्छी रही |कई लिंक्स के लिए आभार
    आशा

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  7. बहुत बढ़िया चर्चा!

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  8. बेहतरीन चर्चा! कई अच्छे लेखों को पढवाने के लिए धन्यवाद!

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  9. मैं ब्लॉग कम ही पढ़ पता हूँ लेकिन आपके ब्लॉग पर इतने सरे अच्छे ब्लोगों की लिस्ट लगी हुई है, अच्छा लगा.

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"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

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"लाचार हुआ सारा समाज" (चर्चा अंक-2820)

मित्रों! रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...