चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Monday, November 08, 2010

मिलिये उसकी मोहब्बत से …चर्चा मंच-331

दोस्तों 
आज की चर्चा कुछ हटकर कर रही हूँ ...........कुछ दोस्त कहते हैं कि कभी कुछ खास चर्चा भी किया कीजिये तो सोचा आज एक ऐसे इंसान से मिलवाया जाए जिसे आप जानते तो हैं मगर कुछ नए लोग जो आये हैं वो शायद नहीं जानते होंगे क्योंकि वो पिछले कुछ समय से ब्लोगिंग से दूर रहे हैं अपने निजी कारणों से मगर अब फिर कुछ समय से सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं................उनको पढेंगे तो लगेगा जैसे ...........

ये कहाँ आ गए हम ,यूँ ही साथ साथ चलते 

अब देखिये ना यहाँ ............

ज़िन्दगी का अंदाज़-ए-बयां जब एक कवि की कलम से गुजरता है तो यूँ लगेगा जैसे उसकी कलम हमने खुद पकड़ी हुई है और वो हमें ही तो लिख रहा है...........हमारे दिल के अहसासों को शब्द दे रहा है…………हमारे आपके सबके ख्यालों की दुनिया………




मुसाफ़िर --- मेरी 100 वी पोस्ट


बड़े ध्यान से मैंने अपनी गठरी को टटोला ,
वक़्त ने उस पर धुल के रंगों को ओढा दिया था ....
उसमे ज्यादातर जगह ;
मेरे अपने दुःख और तन्हाई ने घेर रखी थी
और कुछ अपनी - परायी यादे भी थी ;
और हाँ एक फटी सी तस्वीर भी तो थी ;
जो उसकी तस्वीर थी !!!


यही तो कवि का स्वभाव होता है कि वो वहाँ भी देख लेता है जहाँ आम नज़र पहुँच ही नहीं पाती जैसे देखिये ना ........."वक्त ने उस पर धूल के रंगों को ओढा दिया "............ये सिर्फ कवि ही कर सकता है कि धूल में भी रंगों की बानगी देख सके ............कितने खूबसूरत अल्फाज़  हैं और उनमे सिमटे कवि के जज़्बात

मैंने एक आह भरी
हाँ , मेरा हो सकता था ये शहर ..
लेकिन क्या शहर कभी किसी के हो सकते है
नहीं , पर बन्दे जरुर शहर के हो सकते है
जैसे वो थी ......इस शहर की
मैंने अपने आप से मुस्कराते हुए कहा
“अगर वो न होती तो मेरे लिए ये शहर ही नहीं होता !”

आदमी को जवाब देने के लिए;
जो ,मैंने कहीं पढ़ा था ; कह दिया कि..
“दुनिया एक मुसाफ़िरखाना है ,
अपनी अपनी बोलियों बोलकर सब उड़ जायेंगे !!!”

लफ़्ज़ों को बिना धागे के  पिरोना कोई कवि से सीखे ............."शहर क्या कभी किसी के हो सकते हैं या अपनी अपनी बोलियाँ बोलकर सब उड़ जायेंगे" ..............यही तो जीवन दर्शन है ...........बेशक कविता प्रेम की हो या नहीं मगर भावों का समन्वय ऐसा कि जीवन का यथार्थ बोध करा देता है

"झील"

बुजुर्ग ,अक्सर आलाव के पास बैठकर,
सर्द रातों में बतातें है कि,
वह दुनिया कि सबसे गहरी झील है
उसमे जो डूबा , फिर वह उभर कर नही आ पाया .
उसे जिंदगी की झील कहते है... 
 हर कविता में प्रेम की अतल  गहराइयाँ मगर उसके साथ जीवन दर्शन का समन्वय कवि की उत्कृष्ट सोच का परिचायक  है ..........यही तो ज़िन्दगी का सत्य है...............ज़िन्दगी रुपी झील के माध्यम से कवि कितना कुछ कह जाता है 

तुमने बहुत देर तक, उस झील में ,
अपना प्रतिबिम्ब तलाशती रही ,
तुम ढूंढ रही थी॥

कि शायद मैं भी दिखूं तुम्हारे संग,
पर ईश्वर ने मुझे छला…
मैं क्या, मेरी परछाई भी ,

झील में नही थी तुम्हारे संग !!! 

ज़िन्दगी की झील में मनचाहे चेहरे कब आकार लेते हैं ..........कितनी खूबसूरती से कवि ने इन भावों को संजोया है .............ज़िन्दगी हमेशा पाना ही तो नहीं...........खोने का नाम ही ज़िन्दगी है और जो इसमें डूबा समझो वो ही तो पार उतरा.

"मन की खिड़की /// The window of my heart"

 ज़िन्दगी की बैचेनियों से ;
घबराकर ....और डरकर ...
मैंने मन की खिड़की से;
बाहर झाँका .........

बाहर ज़िन्दगी की बारिश जोरो से हो रही थी ..
वक़्त के तुफानो के साथ साथ किस्मत की आंधी भी थी.

 मन की खिड़की से ज़रा झांक कर तो देखिये अपने मन  के अन्दर ही ...........शब्दों और भावों की पराकाष्ठा को दर्शाती ये कविता कवि के भावुक ह्रदय पर कैसे वज्राघात करती है ...........ज़िन्दगी सामने खडी है और वक्त बेरहम हो रहा है.

 और अब कवि के व्यक्तित्व का एक और दर्शन ...........

लेखन किसी भी विधा का हो ..........कवि की उच्च सोच को परिलक्षित करता है .........अब चाहे प्रेम हो या अध्यात्म ...............कवि हर रचना डूबकर ऐसे लिखता है कि पढने वाला कुछ पलों तक उसी में डूबा रहता है और यही उसके सफल लेखन का परिचय होता है ...........इसकी बानगी इस कविता में देखिये ...........

"आओ सजन"

 बुल्ले शाह ने कहा था ' रमज सजन दी होर '
आज समझा हूँ कि , क्यों खींचे तू मुझे अपनी ओर !
तू ही मेरा सजन ,बस तू ही मेरा सजन !
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

कवि भी तो इन्सान होता है उसमे भी तो वो ही जज़्बात होते हैं जो आम इन्सान में होते हैं और शायद उनसे भी ज्यादा तभी तो उसी भावुकता को वो शब्दों  में पिरोता है ...............देखिये कैसे माँ के प्रेम को तरसते एक बेटे के भावों को कवि बखूबी कह गया और अपनी छाप भी छोड़ गया .........कौन सा ऐसा पहलू है जो कवि को भिगोता नहीं 

"माँ का बेटा"

 वो जो बच्चा था ,वो अब एक
मशीनी मानव बना हुआ है ...
कई बार रोता है तेरे लिए
तेरी गोद के लिए ... 

 कुछ बातें सिर्फ माँ ही समझ सकती है और बेटा सिर्फ माँ से ही कह सकता है उन भावों को कितनी खूबसूरती से उकेरा है

यहाँ कोई नहीं ,जो मुझे ; तुझ जैसा संभाले
तुम क्या खो गयी ,
मैं दुनिया के जंगल में खो गया !
आज ,मुझे तेरी बहुत याद आ रही है माँ !!! 


यहाँ तो यूँ लगता है जैसे ना जाने कितने जन्मों के बिछड़े हैं दोनों और बच्चा कितनी करुणा भरे ह्रदय से माँ को पुकार रहा है ............जैसे कोई छोटा बच्चा भयावह सूनी रात में वक्त की बारिश में भीग रहा हो और अपनी माँ को पुकार रहा हो 

"अचानक एक मोड़ पर"

अगर मैं तुम्हारे आँखों के ठहरे हुए पानी से
मेरा नाम पूछूँ ; तो तुम नाराज़ तो नही होंगी न ?

अगर मैं तुम्हारी बोलती हुई खामोशी से
मेरी दास्ताँ पूछूँ ; तो तुम नाराज़ तो नही होंगी न ?

आज यूँ ही तुम्हे याद कर रहा हूँ और
उस नाराजगी को याद कर रहा हूँ ;
जिसने एक अजनबी मोड़ पर ;
हमें अलग कर दिया था !!!


सुनो , क्या तुम अब भी मुझसे नाराज हो जांना !!!

यहाँ कवि मन प्रेम के अंजाम से डर भी रहा है और अपना डर व्यक्त भी कर रहा है ..............यही तो प्रेम होता है जिसे चाहता है उसी से डरता भी है और उन भावों को कैसे लफ़्ज़ों की चूनर उढाई है 


अब देखिये कवि मन में छुपे एक पिता के वात्सल्य की प्रतिमूर्ति को .............जो शायद कोई पिता कह तो नहीं पाता मगर महसूस ऐसा ही करता है हमेशा ............शायद दुनिया का हर पिता ऐसा ही तो सोचता होगा और उन सबके भावों को कितने खूबसूरत शब्द दिए हैं कि लगता है जैसे अभी सामने ही तो बैठी है वो छोटी सी प्यारी सी बिटिया .............

"बिटिया"

 और वो भी जो रातों को मेरे छाती पर ;
लेटकर मुझे टुकर टुकर देखती थी !

और वो भी ,
जो चुपके से गमलों की मिटटी खाती थी !

और वो भी जो माँ की मार खाकर ,
मेरे पास रोते हुए आती थी ;
शिकायत का पिटारा लेकर !

 एक दिन वो छोटी सी लड़की बड़ी हो जाएँगी ;
बाबुल का घर छोड़कर ,पिया के घर जाएँगी !!!

फिर मैं दरवाजे पर खड़ा हो कर ,
तेरी राह देखूंगा ;
तेरे बिना , मेरी होली कैसी , मेरी दिवाली कैसी !
तेरे बिना ; मेरा दशहरा कैसा ,मेरी ईद कैसी !

तू जब जाए ; तो एक वादा करती जाना ;
हर जनम मेरी बेटी बन कर मेरे घर आना ….

 और अब आखिर में ------------

कवि के बहुआयामी व्यक्तित्व की एक और झांकी देखिये -----------

उनकी ये कविता शब्दयुद्ध --------आतंकवाद के विरुद्ध नाम से एक प्रदर्शनी में लगी थी ..........यहाँ तो कवि अपने देश प्रेम के सभी भावों को कुछ ऐसे प्रगट करता है कि पढ़ते पढ़ते ऐसा लगता है जैसे सामने ही घटित हो रहा हो ........... 

"शब्दयुद्ध : आतंकवाद के विरुद्ध"

शहीद हूँ मैं .....

मेरे देशवाशियों
जब कभी आप खुलकर हंसोंगे ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी नही हँसेंगे...

जब आप शाम को अपने
घर लौटें ,और अपने अपनों को
इन्तजार करते हुए देखे,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरा इन्तजार नही करेंगे..

एक शहीद के भावों को पिरोना वो भी इस तरह जैसे वो खुद अपनी व्यथा बयां कर रहा हो ...........ये एक कवि ही कर सकता है


मेरे देशवाशियों ;
शहीद हूँ मैं ,
मुझे भी कभी याद कर लेना ..
आपका परिवार आज जिंदा है ;
क्योंकि ,
नही हूँ...आज मैं !!!!!
शहीद हूँ मैं …………..!!!!

 यहाँ ज़िन्दगी की कटु सच्ची को कितने सरल शब्दों में उतार दिया है ...........अब कहने को कुछ बचा है क्या ?

ये तो हुई कवि के ह्रदय की बात 

अब देखिये कुछ बातें और बताती हूँ उनके बारे में ............वो ना केवल एक  सफल कवि ही हैं बल्कि एक बहुत ही बेहतरीन फोटोग्राफर भी हैं साथ ही साईं  बाबा के भक्त .........इसके अलावा बच्चों के लिए कॉमिक्स का भी एक ब्लॉग है तो उन सबके लिंक्स आपको यहाँ देती हूँ ..........एक बार जाकर तो देखिये...........मिलिए एक इंसान में छुपे अलग अलग इंसान को ........
http://photographyofvijay.blogspot.com/
http://artofvijay.blogspot.com/
http://comicsofindia.blogspot.com/

http://shrisaibabaofshirdi.blogspot.com/


http://spiritualityofsoul.blogspot.com/

http://hrudayam-theinnerjourney.blogspot.com/


 और अब सबसे खास मुकाम उनकी ज़िन्दगी का ............उनके ख्वाबों का महल ............अरे रेरेरेरे ............ये क्या किसी के ख्वाबों में जाने की हर किसी को इजाजत नहीं होती और आप सीधा चले जा रहे हैं.............यही तो वो धरोहर होते हैं जिनके सहारे उसका वजूद सांसें लेता है ...............यूँ तो इस ख्वाबगाह में आने की हमें इजाज़त नहीं हैं यानि के उसे हम देख तो सकते हैं मगर अपने भावों को वहाँ प्रगट नहीं कर सकते ............समझे या नहीं ......मतलब ये कि वहाँ आप उनकी रचनाओं को पढ़ तो सकते हैं और उन भावों में डूब-उतर सकते हैं मगर अपने भावों को व्यक्त करने के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है हमारे लिए..............कोई कमेन्ट बॉक्स नहीं है ..............तो क्या हुआ............जब तक इस ख्वाबगाह के दर्शन नहीं किये तो क्या किया............यहीं तो कवि का मन विचर रहा है अपने अनदेखे अहसास के साथ जहाँ उसकी जान उसके ख्वाबों को सहेजकर रखती है 
तो इस ब्लॉग का नाम है ----------"ख्वाबों के दामन से "
जैसा नाम है वैसा ही ब्लॉग............सच ख्वाब ही तो हैं वहाँ............शायद हम सभी के.......तो दोस्तों ये रहा उस ब्लॉग का लिंक----------

http://worldofvijaysappatti.blogspot.com/

यहाँ की कुछ खास कृतियाँ मैं आपको बता देती हूँ मगर पढनी वहीँ जाकर पड़ेंगी ............ना कॉपी कर पा रही हूँ और ना पेस्ट..........आखिर चुपके से किसी के ख्वाबगाह में जायेंगे तो उसके सपने तो नहीं चुरा सकते ना .........बस उनमे विचर ही सकते हैं ना ...........ये कुछ रचनाएँ किसी तरह निकली हैं उनके ख्वाबगाह से .........देखिये इनकी बानगी यहाँ सिर्फ वो हैं और उनकी मोहब्बत 

ख्वाबो के दामन से ...


स्पर्श 

प्रिय , तुम उस स्पर्श को क्या कहोंगी
मेरा प्यार या फिर तुम्हारा इकरार
वो थी हमारे प्रेम की संपूर्णता या एक कविता
जो तुम जैसी ही खूबसूरत  थी
जांना ; स्पर्श के उस अहसास में तुम अंकित थी

यूँ लगा जैसे फागुन अपने आप  में नहीं रहा
यूँ लगा की जैसे रजनीगंधा की खुशबु फैली
यूँ लगा जैसे मेघो से आकाश ढका रहा
तन और मन के मिलन की वो मधुर बेला थी
जांना ; स्पर्श के उस अहसास में तुम अंकित थी

प्रेम की परिभाषा को मैं न कहूँगा
हृदय की भाषा को व्यक्त न करूँगा
शब्दों में अपनी अनुभूति को न बांधूंगा
उन स्वर्गिक पलों की मैंने कल्पना  न की थी
जांना ; स्पर्श के उस अहसास में तुम अंकित थी


" एक अँधेरी सुरंग के अहसास "


जब भी मैं अपने सफ़र को देखता हूँ तो
कुछ और नजर नहीं आता दूर दूर तक ......
ज़िन्दगी अब एक लम्बी सुरंग हो चुकी है ....


जिसकी सीमा  के पार कुछ नज़र नहीं आ रहा है ...
कहीं ; कोई रौशनी का दिया नहीं  है
मैं तेरा हाथ पकड़कर चल रहा हूँ ..
अनवरत ....किसी अनंत की ओर .....
जहाँ ,किसी आखरी छोर पर ;  हमें कोई खुदा मिले
और अपनी खुली हुई बाहों से हमारा स्वागत करे.... 


मैं अक्सर नर्म अँधेरे में तेरा चेहरा थाम लेता हूँ
और फिर हौले से तेरा नाम लेता हूँ
तुझे मालूम होता है कि , मैं कहाँ हूँ 
तू मुझे और मैं तुझे छु लेते है ........
मैं चंद साँसे और ले लेता हूँ
कुछ पल और जी लेता हूँ ...
.....इस सफ़र के लिए ... तेरे लिये !!!


अक्सर रास्ते के कुछ अनजाने मोड़ पर
तुम रो लेती हो जार जार ....
मैं तुम्हारे आंसुओ को छु लेता हूँ.....
जो कि ; जन्मो के दुःख लिए होते है
और कहता हूँ कि; 
एक दिन इस रात की सुबह होंगी !
तुम ये सुन कर और रोती हो
क्योंकि जिस सुरंग में हम चल रहें है
वो अक्सर नाखतम सी सुरंगे होती है ...


मुझे याद आता है कि ;
ज़िन्दगी के जिस मोड़ पर हम मिले थे
वो एक ढलती हुई शाम थी
वहां कुछ रौशनी थी ,
मैंने डूबते हुए सूरज से आँख-मिचौली की
और तुझे आँख भर कर देख लिया ...
और तुझे चाह लिया ; सच किसी खुदा कि कसम !!!
और तुझे 'तेरे' ईश्वर से इस उम्र के लिये मांग लिया !!!


तुझे मालुम न था कि इस चाह  की सुरंग 
इतनी लम्बी होंगी 
मुझे यकीन न था कि मैं तेरे संग
इसे पार  न कर पाऊंगा 
पर हम तो किस्मत के मारे है ...


कुछ मेरा यकीन , कुछ तेरी चाह्त ,  
कुछ मेरी चाहत और तेरा यकीन
हम सफ़र पर निकल पड़े  .......
ज़िन्दगी की इस सुरंग में चल पड़े ...
और सफ़र अभी भी जारी है........
जारी है ना मेरी 'जांना' !!!




 दोस्तों  
ये  हमारे आपके ब्लोगर दोस्त हैं ............विजय कुमार सपत्ति जी .............एक बेहद नरमदिल, भावुक इन्सान ..............इन्हें सभी दोस्त लव गुरु यूँ ही नहीं कहा करते ...........देखिये ना कितने नाज़ुक अहसासों को पिरोते हैं कि पढने वाला खुद उनमे डूब जाता है उसे अपनी सी व्यथा दिखने लगती है और प्रेम का हर रूप ऐसे संवारते हैं जैसे कोई माली अपने बागीचे के हर फूल को सहेजता है ............अब क्या ज्यादा कहूं आप सब को उनके ब्लॉग के लिंक्स तो दे ही दिए हैं............जाइये और आराम से विचरिए ..............और कामना कीजिये कि जल्दी से जल्दी विजय जी फिर अपने उसी रूप में हमारे सामने उपस्थित हों .........वक्त उन्हें हमारे लिए भी थोडा सा वक्त दे दे ताकि हम उनकी कविताओं से वंचित ना रहें.


चलिए दोस्तों हो गयी आज की एकल चर्चा  .........अब बताइयेगा ये प्रयास कैसा लगा..........आपको पसंद भी आया या नहीं...........पहली बार की है इसलिए हो सकता है कुछ त्रुटी भी रह  गई हो.........वैसे एक बार तो ये चर्चा जब लगा रही थी तो पूरी ही डिलीट हो गयी थी जबकि सारी तैयार कर चुकी थी मगर फिर दोबारा लगायी तब भी ऐसी ही मुश्किल तो आई मगर इस बार साथ साथ सेव करती रही तो बच गयी.............अब चलती हूँ अगले सोमवार फिर मिलूंगी

19 comments:

  1. आज की चर्चा के माध्यम से-
    विजय कुमार सम्पत्ति से मिलकर बहुत अच्छा लगा!

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  2. वो जो बच्चा था ,वो अब एक
    मशीनी मानव बना हुआ है ...
    कई बार रोता है तेरे लिए
    तेरी गोद के लिए ...

    Shaandaar charcha...aabhar.

    .

    ReplyDelete
  3. Bhaw pradhan prastuti.Man ko andolit karati si lagi.

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  4. विस्तार से की गयी विशेष चर्चा अच्छी रही ...
    आभार !

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  5. 5/10

    एकल चर्चा के तहत अच्छी पोस्ट.
    बहुत सुन्दर प्रयास

    प्रस्तुति बिखरी हुयी है.
    ब्लॉगर का परिचय शुरुआत में देना चाहिए.
    'फांट साईज' कई जगह ज्यादा है.

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  6. विजय कुमार जी से परिचय बहुत अच्छा लगा ...रचनाएँ पढते हुए अंत तक उत्सुकता बनी रही कि इतनी अच्छी रचनाओं का रचनाकार आखिर है कौन ....बहुत सुगढ़ता से सहेजी है एकल चर्चा ...इस चर्चा से उनके ख्वाबगाह कि सैर भी हो गयी ..बहुत मेहनत से चुनी हैं उनकी कविताएँ ....इनकी एक कविता है स्त्री ....उसे भी पाठकगण पढ़ें ...

    सुन्दर एकल चर्चा के लिए आभार

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  7. सुन्दर चर्चा ... विजय कुमार जी से ऐसा परिचय .. बहुत खूब...और कवितायेँ भी सशक्त
    धन्यवाद इस परिचय के लिए चर्चामंच के माध्यम से .. शुभदिवस

    ReplyDelete
  8. विजय कुमार सम्पत्ति के इस परिचय के लिए बहुत बहुत आभार आपका !

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  9. विजय जी की प्रेम कविताओं में गहराई होती है ... मासूमियत होती है ... बहुत अछा लगा ये फ्लश बैक ....

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  10. sundar ekal charcha!!!
    vijay kumar ji ki rachnaon se parichit hona accha laga!!
    aabhar aapka!

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  11. सुंदर चर्चा के लिए धन्यवाद. विजय कुमार सपत्ति जी से परिचय कराने के लिए आभार. सादर
    डोरोथी.

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  12. charcha ke madhayam se ''vijay kumar ji ''ka pura sahitik vishleshan bahut achchha laga.badhiy swikar karen.

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  13. ये हट के चर्चा भी बढ़िया रही

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  14. वंदना जी सच कहूँ तो ये चर्चा मुझे आपकी सभी चर्चाओं में सबसे बढ़िया लगी. और शब्द व्यंजना तो जबरदस्त है कवि की रचनाओं की जानकारी देने के लिए. बहुत बार पढ़ा है संपत्ति जी को...और कई बार ऐसा भी हुआ की उनका ब्लॉग खुला ही नहीं और कई बार कमेन्ट बॉक्स नहीं मिला.

    बहुत जबरदस्त रही आपकी आज की ये चर्चा. कोई बेशक आपको ५/१० अंक दे, हम तो आपको ८.५/१० से कम नहीं देंगे.

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  15. सुंदर चर्चा............

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  16. प्रिय वंदना,

    मैं आपके इस प्रयास से बहुत भावुक हो गया हूँ, अपनी ही कविताओ को पढना , बहुत अरसे के बाद ऐसा लगा , की यादो को rewind कर रहा हूँ. आपका तहे दिल से शुक्रिया , की आपने मेरे लिए इतनी मेहनत की . मुझसे बहुत ख़ुशी हुई की ब्लॉगर दोस्तों ने इस प्रयास को सराहा भी . उन सभी दोस्तों का शुक्रिया .

    आपका
    विजय

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  17. most touching...

    यहाँ कोई नहीं ,जो मुझे ; तुझ जैसा संभाले
    ................................
    आज ,मुझे तेरी बहुत याद आ रही है माँ !!!
    tears are in my eyes....

    ReplyDelete
  18. most touching...

    यहाँ कोई नहीं ,जो मुझे ; तुझ जैसा संभाले
    ................................
    आज ,मुझे तेरी बहुत याद आ रही है माँ !!!
    tears are in my eyes....

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