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Tuesday, August 31, 2010

साप्ताहिक काव्य मंच - १४ ( संगीता स्वरुप ) चर्चा मंच --- 263

नमस्कार , हाज़िर हूँ एक ब्रेक के बाद ….सज गया है काव्य मंच और मंच पर सारी कविताएँ अपनी पात्रता निभा रही हैं …देखना यह है कि आपके मन के अनुरूप कौन सी रचना आपको भाती है …आज विशेष चर्चा में आपको मिलवा रही हूँ दो शख्सियत से ….उनकी रचनाओं में से चुनी हुई रचनाएँ आपको भी पसंद आएँगी ..ऐसी आशा करती हूँ …ब्लॉग पर पहुँचने के लिए आप चित्र पर भी क्लिक कर सकते हैं …चलिए बढते हैं फिर मंच की ओर …
 वाणी शर्मा जी गद्य और पद्य  दोनों ही विधा में माहिर हैं …अपने मंतव्य बहुत सलीके से और बेहिचक लिखती हैं …जहाँ तक मैंने इनकी दी हुई टिप्पणियाँ देखी हैं वहाँ भी इनकी अपनी पुख्ता राय होती है ..बात करते हैं काव्य सृजन की ..इनकी कविताएँ कहीं बहुत भावनाप्रधान होती हैं तो कहीं कहीं विचारोत्तेजक भी ..शालीनता से और दृढ़ता से  अपने भावों को व्यक्त करती हैं ..व्यंग भी  सटीक होता है ..कभी कभी ऐसी कविता भी पढ़ने को मिलती है कि सोच को झकझोर कर रख देती है ..बाज़ी दर बाज़ी चल रहा है चाल कोई  स्पष्टता इतनी है कि जहाँ से लिखने की प्रेरणा मिलती है वहाँ का लिंक देना भी नहीं भूलतीं .. भावनाओं में बह कर जब लिखती हैं तो पढ़ने वालों की आँखें भी नम हो जाती होंगी ..मैं और क्या कर सकती हूँ माँ….इसके अतिरिक्त कुछ रचनाओं को आप देखें …
मत रोको उन्हें उड़ने दो

सिखाओ उन्हें
कि खिंच सके
खुद अपनी लक्ष्मण रेखाएं ...
क्यूंकि
मुश्किल होता है
लांघना
खुद अपनी खिंची लक्ष्मण रेखाओं का

इस कविता में एक लडकी के जीवन में कब कब और कैसे बदलाव आता है …बहुत सटीक विश्लेषण किया है ..

अब चुप रह कर अपनी औकात में ..

दिनोदिन निस्पृह होती जाती वह
और मजबूत होती जाती वह
खुश अपनी औकात में रहने लगी है वह
क्यूंकि
रूबरू है जीवन के अंतिम सत्य से वह
इस रचना में माँ के माध्यम से घर की हर स्त्री के लिए कहा है कि घर की महिलाएं ही रिश्तों को बनाना और निबाहना जानती हैं ..

बस माँ ही जानती है .

याद आते हैं मुझे
पीतल के वे छोटे-बड़े टोपिये
माँ दूध उबाल देती थी जिनमे
दूध कभी फटता नहीं था ...
माँ उसमे कलाई करवाती थी
बस माँ ही जानती है ...
कलई चढ़ाना ...
बर्तनों पर भी
रिश्तों पर भी ...

कैसे विष पनपता है नारी हृदय में ज़रा उसको भी जानते चलिए …

विषकन्या

इस पहले घूँट से ही
मगर जो बच जाती हैं
और सीख जाती है
आंसू पीकर मुस्कुराना
उपेक्षा सहकर खिलखिलाना
*************
और अंततः होती हैं अभिशापित
पायें जिसे चाहे नहीं ....
चाहे जिसे पाए नहीं ....
आक्रान्ताओं ...
इन पर हंसो मत
इनसे लड़ो मत
इनसे डरो .....
ये करने वाली है
तुम्हारे नपुंसक दंभ को खंडित
तुम्हारी सभ्यता को लज्जित

 मेरा फोटो
अरुण चंद्र राय से बहुत से पाठक परिचित हैं …इनकी हर रचना मन में कहीं गहरे उतरती है …जब से मैंने इनकी रचनाओं को पढ़ना प्रारंभ किया तब से अब तक नियमित पाठिका हूँ …साधारण सी दिखने वाली चीज़ों में यह गहरे भाव भर कर कविता कह जाते हैं ..
कपड़े सुखाती औरतें …..कील पर टंगी बाबूजी की कमीज़..  इसके उदाहरण हैं …हर कविता एक नया बिम्ब लिए होती है और अद्भुत चित्र प्रस्तुत करती है ….आप भी देखें कुछ रचनाएँ ..
आग

आग
जिजीविषा है
जिज्ञासा है
जूनून है
जरुरी है..

क्योंकि
आपके लिए
व्यक्ति भी
ए़क वस्तु ही है
तूलिका और तालिका

तूलिका
जहाँ भरती है
सपनों में रंग
तालिका
करता है
सच्चे झूठे
आंकड़ो का
भव्य प्रदर्शन
और अब चर्चा सप्ताह की विशेष रचनाओं की …जिनमें आपको कुछ नए लोग और कुछ प्रतिष्ठित लोग मिलेंगे …उम्मीद है कि मेरा यह प्रयास आपको अच्छी रचनाओं तक ले जाने में सहायक होगा …
My Photoराकेश खंडेलवाल जी जाने माने गीतकार हैं ..उनकी हर रचना अद्भुत शब्दों के चयन से सुसज्जित होती है ..इस बार बहुत प्यारा गीत ले कर आये हैं …आप भी ज़रूर पढ़ें ..

तुम्हें देख मधुपों का गुंजन
तुम्हें देख बज उठे बांसुरी, और गूँजता है इकतारा
फुलवारी में तुम्हें देख कर होता मधुपों का गुंजन
हुई भोर आरुणी तुम्हारे चेहरे से पा कर अरुणाई
अधरों की खिलखिलाहटों से खिली धूप ने रंगी दुपहरी
संध्या हुई सुरमई छूकर नयनों की कजरारी रेखा
रंगत पा चिकुरों से रंगत हुई निशा की कुछ औ; गहरी
 
शोभना चौरे जी अपनी कविता   "स्त्रियाँ " के माध्यम से बता रही हैं कि स्त्री द्वारा किये गए हर कार्य में सौंदर्य विद्यमान होता है …जब वो खाना बनाती हैं तो लगता है कि पेटिंग कर रही हैं ..किस तरह समय की धुरी बनी होती हैं …आप भी इस बेहतरीन रचना का आनन्द लें ..

राजनीती की बिसात पर
भले ही बिछाई गई हो
कभी ?
आज राजनीती
की  किताब है
स्त्रियाँ

इन पंक्तियों में शायद द्यूत क्रीडा में द्रोपदी को दांव पर लगने का प्रसंग छिपा है
करण समस्तीपुरी  जी एक बहुत प्रभावशाली कविता कह रहे हैं जिसमें प्रवाह  है ..जैसे बाती जल कर आशा का संचार करती है ..वैसे ही यह कविता भी मन को आशान्वित कर रही है

साँझ भयी फिर जल गयी बाती
साँझ भयी फिर जल गयी बाती !
जल-जल मदिर-मदिर, झील-मिल,
कोई अतीत का गीत सुनाती !
साँझ भयी फिर जल गयी बाती !!

My Photoअनामिका जी इस बार अपने मन की भावनाओं को समेटने और सहेजने की बात बताते हुए कह रही हैं की इनको सहज बना लूं
 तो कुछ और कहूँ.

अपने दिल की उदासी को छुपा लूँ तो कुछ और कहूँ
अपने लफ़्ज़ों से जज्बातों को बहला लूँ तो कुछ और कहूँ.
अपनी साँसों से कुछ बेचैनियों को हटा लूँ तो कुछ और कहूँ
धूप तीखी है, जिंदगी को छाँव की याद दिला दूँ तो कुछ और कहूँ
 IMG_0505
 जीवन की आपा - धापी  में हर इंसान अपनी रोज़ी रोटी कमाने में लगा रहता है .इसी बात को  इंगित करते हुए ललित शर्मा जी  कह रहे हैं कि
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?
हाड़-तोड़ भाग-दौड़
फ़िर दिमागी दौड़ भाग
जीवन में विश्राम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?
 My Photo

डा० अजमल खान की एक तरही मुशायरे में शामिल गज़ल  पढ़िए 

धनक बिखेर रहे अब्र ..

धनक   बिखेर   रहे  अब्र   क्या  फ़ज़ाऐं  हैं
फलक   पे   झूम  रहीं   सांबली  घटाऐं  हैं.
गुलो    बहार    बगीचे    हुये  दिवाने  से
अजीब   कैफ   मे    डूबी   हुई  हवाऐं  हैं .
मेरा फोटोके० के० यादव जी बड़ी रूमानी सी कविता लाये हैं …
तुम्हारी खामोशी

तुम हो
मैं हूँ
और एक खामोशी
तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं
तुम्हारे एक-एक शब्द
मेरे वजूद का
अहसास कराते हैं
 मेरा फोटोसूर्यकान्त गुप्ता जी की आज उमडत घुमडत सोच ज्वलंत समस्या प्रदूषण पर विचार कर रही है ..आज पर्यावरण पर सबको सोचना चाहिए ..आप भी पढ़ें …शायद कुछ प्रेरणा मिल सके ..

प्रदूषण के कितने प्रकार
रोड जाम है;
दुपहिया तिपहिया बहुपहिया वाहन फेंके धुंआ,
करें हैरान, कर  'ध्वनि-संकेत' का शोर 
बहरे हो गए कान, हो गई नजर कमजोर
धूल स्नान कर कर के हो जाती जनता  धुलिया
बदल जाता है गाँव, शहर संग जनता का भी हुलिया
जय जोहार...........
My Photo एम० ए० शर्मा “सेहर" उबाऊ ज़िंदगी से बाहर निकालने के लिए कह रही हैं कि

बहार लिखने का मन था आ
दम तोड़ते रिश्ते बहुत देर डगमगाते हैं
इस कोशिश में सहारा मिले
तो टांग दें ज़ज्बात उस पर
दूर अहम् की चादर ओढ़े उम्मीद
हाथ बांध मुस्कुराती है

मेरा फोटो आम्रपाली शर्मा किसी से मिलने के एहसास को बयाँ करते हुए कह रही हैं .

अहसास

इतने सालों बाद
मिले तुम
खामोशी से सुनते हुए
बरसों पहले की तरह आज भी देखती रही
शाम के साथ गहराता तुम्हारी आंखों का रंग
आज ज्यादा लगा
रैग्युलर कौफी का भी फोम .
साखी पर पढ़िए इस बार
गिरीश पंकज की गज़लें 
इनका परिचय यह स्वयं हैं ..



1.
कोई तकरार लिक्खे है कोई इनकार लिखता है
हमारा मन बड़ा पागल हमेशा प्यार लिखता है

2.
किसी को धन नहीं मिलता
किसी को तन नहीं मिलता
लुटाओ धन मिलेगा तन
मगर फिर मन नहीं मिलता
3.
शख्स वो सचमुच बहुत धनवान है
पास जिसके सत्य है, ईमान है
प्रेम से तो पेश आना सीख ले
चार दिन का तू अरे मेहमान है
4.
मेरी जुबां पर सच भर आया
कुछ हाथों में पत्थर आया

मैंने फूल बढ़ाया हंस कर
मगर उधर से खंजर आया

My Photo भक्ति रस में डूबी अशोक व्यास जी की रचना पढ़िए 
हर पल में दीखे मनमोहन

गीला स्पर्श घनश्याम का
स्नेह निर्झर हरिनाम का
चहुँओर छाया उसका नर्तन
मुरली आलोक छू पाये मन
वह श्याम सलौना मन भाये
हर रोम कथा उसकी गाये
मेरा फोटो सुरेश यादव जी सपनों के बारे में कुछ अलग ही अंदाज़ रखते हैं …

अपनी बात

सपना : सांप

बचपन की रातें
घने जंगल सी
सपना - सांप सा
नींद डसी जाती रही बार-बार
काटा रातों का जंगल
खोजा सपना
मिला जहाँ - पत्थरों से मारा
घायल सपना खो जाता रहा हर बार
My Photoपी० सी० गोदियाल जी में एक जज़्बा है अपनी बात को सीधे पाठक तक पहुंचाने का ..धारदार व्यंग लिखते हैं …आज की कविता भी कुछ ऐसा ही कहती है ..
 
 

नक्कारखाने के.... !
सुबह शाम
ये जो भ्रष्ट,
नाक रगड़ते हैं
इतालवी जूतियों पर !
मैं अपना
कागज-कलम घिसकर
वक्त बरबाद करूँ क्यों,
इन तूतियों पर !
!
दीपशिखा वर्मा लायी हैं
गरमा गर्म मुलायम नज़्म !

इनकी नज्में आपस में बातें करती हैं और इंतज़ार गरमा गर्म नर्म नयी नज़्म का …
मेरी नज़्म , गीत , ग़ज़ल , कविताएँ
कभी कभी गोले में बैठ कर
बतियाती हैं -
खोल खोल के अपने जेवर
बिछा देती हैं एक दुसरे के सामने
ज़िंदगी में हर इंसान की न जाने कितनी चाहतें होती हैं …उसी पर सुमन सिन्हा जी ने अपनी लेखनी चलाई है …

चाहिए, बस चाहिए


क्या चाहिए इन्हें
नाम - शोहरत
धन - दौलत
मिल जाये तो?
फिर और चाहिए, और, और...
न मिले तो,
कैसे भी चाहिए...
 अपर्णा मनोज  भटनागर एक बहुत संवेदनशील रचना लायी हैं ….उन लोगों को कह रही हैं जो देश से बाहर बसे हुए हैं …

तुम तो बसे परदेश



मैंने देखा है -
तुम्हारा गाँव
उसी वैमनस्य से
लड़ता -झगड़ता ,
फसलें घृणा की काटता
...नस्लें उपेक्षा की बांटता

मेरा फोटो

क्षमा  सिमटे लम्हे मेरे मन के पर कह रही हैं कि ---

न हीर हूँ,न हूर हूँ..


न हीर हूँ,न हूर  हूँ , न नूर की कोई बूँद  हूँ,
ना किसी चमन की दिलकश बहार हूँ...
खिज़ा  में बिछड़ी एक डाल की पत्ती  हूँ...
My Photoपारुल जी इस बार कुछ उलझन ले कर आयीं हैं …नज़्म का हर शब्द दिल में उतरता चला जाता है ..आप भी जानिए उनकी   
मुश्किल
एक ही मुश्किल थी
कि उसकी कोई हद नहीं थी
चाह थी मुद्दत से
मगर वो 'जिद' नहीं थी #
देर तक बैठा था
तन्हाई की फांक लिये
इश्क रूहानी था
पर वो अब तक मुर्शिद नहीं थी #
 
शेखर सुमन जी प्यार में दे रहे हैं

प्यार का तोहफा

आज के मुबारक दिन
मैं तुझे एक
तोहफा देना चाहता हूँ |
ऐसा तोहफा जो
सबसे निराला हो |
पाकर जिसे तेरा
मन भी मतवाला हो |
वो तोहफा
मेरे प्यार का
उपहार भी हो |
 मयंक सक्सेना जी एक बहुत सुन्दर कविता लाये हैं …
बीज कभी नहीं मरते हैं..
कभी मन से
रोपे गए
कभी अनजाने में
गिर के ज़मीन पर
दब गए
ज़मीन में
जैसे थोपे गए
मेरा फोटो अर्चना तिवारी आज पक्षियों की भावना को कविता में रच कर लायी हैं …गौरैया के सारे क्रिया कलाप कितनी सूक्ष्मता से कहे हैं आप भी पढ़ें ..

एक गौरैया नन्ही सी

एक गौरैया नन्ही सी
नीड़ से निकली पहली बार
नील गगन को  छूने  की

चाह ह्रदय  में  लेकर आज 
फुदक रही है डाली-डाली 
पंख  फैलाए पहली बार

दिगंबर नासवा जी इस बार एक सटीक और सार्थक प्रश्न पूछ रहे हैं कि क्या समय के साथ परम्परा को बदला जा सकता है …पढ़िए एक चिंतन परक रचना 



क्या हर युग में 
एकलव्य को देना होगा अंगूठे का दान ..? 
शिक्षक की राजनीति का 
रखना होगा मान ..? 
झूठी परंपरा का 
करना होगा सम्मान ..?
My Photoडा० अजीत अपने ब्लॉग “शेष फिर” पर आज के हालातों को बयाँ कर रहे हैं …

अंजाम


अब जीने का रोजाना अन्दाज बदलना पडता है
भीगें पर वाले परीन्दे को परवाज़ बदलना पडता है
जवाब उनसे मांगू क्या अपनी हसरत का
रिश्तों का लिहाज करके सवाल बदलना पडता है
My Photoनित्यानंद ज्ञान जी टी वी पर बाबाओं से और रेडियो पर लव गुरुओं से परेशान हैं ..उनकी यह परेशानी उनकी कविताओं में साफ़ झलकती है …

तीन छोटी कवितायेँ

रेडियो पर लव गुरु
और --
टीवी पर बाबा
अपनी -अपनी दुकान खोलकर
कान और नाक पकड़ कर
निकल रहे हैं लोगों की हवा .
myselfमंसूर अली हाशमी की गज़ल पढ़िए आत्म मंथन पर ..

'न' होने का होना.....
'कुछ नहीं' थे ये तसल्ली फिर भी है,
'शून्य' से संसार की रचना हुई.



कहकशां  दर  कहकशां खुलते गए,
क्या अजब ये देखिये घटना हुई.
 बेटियों के ब्लॉग पर रवीश कुमार जी यमुना नदी से क्या कह रहे हैं जानिये इनकी कविता में

यमुना तुम ऐसे ही बहते रहना
अब तो बता दो
फैल कर
अपने ही दामन में
भींगोते हुए आंचल को
बहते हुए धारा प्रवाह
जी कैसा मचलता है


राणा प्रताप सिंह अपने ब्लॉग ब्रह्माण्ड पर एक गज़ल कह रहे हैं

pr78361
तारीकियों में चमके हैं जो माहताब से
साकी बना दे जाम जरा बेहिसाब से
मेरा ना कुछ भी होगा जरा सी शराब से
शब बीतने से पहले क़यामत ही आ गई
दीदार ना जरा सा मिला उस नकाब से
वृद्धग्राम पर महेंद्र जी की कविता प्रस्तुत की गयी है ..जिनकी उम्र ७५ वर्ष की है ..उनके कवि मन को पढ़िए जो उन्होंने आज अपनी स्थिति के बारे में रचा है ..

मौत की शक्ल को ढूंढ रहा हूं




मौत की शक्ल को ढूंढ रहा हूं,
मिलती ही नहीं, क्यों गुम है,
वह खड़ी चौखट पर,
यह समझता कोई नहीं,
सरक-सरक कर चलने वाला,
जीवन पागल बिल्कुल नहीं,

My Photo
डा० अभिज्ञात  नए चिट्ठाकार हैं ….आप भी उनके कवित्व से रु - ब- रु होइए …
ख़्वाब देखे कोई और

मेरे साथ ही ख़त्म नहीं हो जायेगा
सबका संसार
मेरी यात्राओं से ख़त्म नहीं हो जाना है
सबका सफ़र
अगर अधूरी है मेरी कामनाएं
तो हो सकता है तुममें हो जायें पूरी

My Photo स्वप्न मंजूषा जी की एक गज़ल जो कह रही हैं कि  यादें किस कदर किरकिरी के समान चुभती है .. 
फिर याद तेरी किरकिरी बन बिंदास चुभती रही...

जोड़ कर टुकड़े कई उस आईने के आज तक
अक्स ले हाथों में मैं ख़ुद से दरारें भरती रही
हो सामने ताबूत जैसे, ऐसे पड़ी थी ज़िन्दगी
जिस्म शोर करता रहा और रूह उतरती रही
मेरा फोटो
देश और समाज की विसंगतियों पर डा० रूपचन्द्र शास्त्री जी व्यथित और क्षुब्ध हो कर आज कह रहे हैं
 
 
"स्वतन्त्रता का नारा है बेकार"
जिस उपवन में पढ़े-लिखे हों रोजी को लाचार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

जिनके बंगलों के ऊपर,
बेखौफ ध्वजा लहराती,
रैन-दिवस चरणों को जिनके,
निर्धन सुता दबाती,
जिस आँगन में खुलकर होता सत्ता का व्यापार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।

मेरा फोटोआज का साप्ताहिक काव्य मंच का समापन कर रही हूँ समीर लाल जी की गज़ल से …गज़ल से पहले जिस घटना के माध्यम से उन्होंने माँ और पत्नि की खूबियां कहीं हैं वो कोई अनुभवी ही कह सकता है … और गज़ल बस लाजवाब … यह सब पढ़ना है तो क्लिक करें …
चकमित पत्नी!!

मंत्र कुछ सिद्ध  जाप लें तो चलें
तिलक माथे पे थाप लें तो चलें
सुनते हैं बस्ती फिर जली है कोई
चलो हम आग ताप लें तो चलें
आशा करती हूँ कि आज यहाँ प्रस्तुत किये गए चिट्ठे आपको पसंद आयेंगे …आपके सुझावों और प्रतिक्रिया का इंतज़ार है …फिर मिलते हैं नए काव्य कलश को लेकर …आगले मंगलवार …तब तक के लिए …………. नमस्कार

Monday, August 30, 2010

नया सफ़र्……………चर्चा मंच-262

 दोस्तों,
लीजिये हाजिर हूँ सोमवार की चर्चा के साथ्…………उम्मीद है ये अन्दाज़ भी पसन्द आयेगा।

कविता का सफ़र चल निकला 
और हम भी साथ चल पडे .

पूरक हो तुम -------------  
वो तो हैं ही , एक के बिना दूजे का जीवन अधूरा ही तो है .

पुरुष वेश्याएं , आधुनिकता की नयी उपज--------मिथिलेश दुबे--------------
अब इतना मोल तो आधुनिक बनने का चुकाना ही पडेगा ना ?

अगर कहो तो ना छूयें?

प्रेम किससे? मुझसे या

पता नही जी, सबसे मुश्किल सवाल?

कभी कभी शब्द ही नहीं होते आभार प्रकट करे के

तो क्या हुआ------दिल मे तो है ना वो ही काफ़ी है.

मुझको जला के खुशबु की वो बारिश सा कर गया

अब ये तो हद हो गयी!

जरूर किया गया होगा आखिर इंद्रधनुष के रंग जो ठहरे.

हकलाहट : दिल पे मत ले यार . . . ! 

बिल्कुल नही लेंगे जनाब!

कोई साथ नहीं देगा 

ये तो बिल्कुल पक्की बात है.

अवधिया जी, आखिर रहोगे आप पुरातनपंथी ही

और क्या अपना पंथ नही छोड्ना चाहिये.

मैनें एक परी को मित्र बनाया

जरूर बनाना चाहिये.

वाह! क्या कहने

बेलफास्ट कवि सम्मलेन के कुछ वीडिओ क्लिप 

आपके आदेश पर------>>>दीपक मशाल

बडे फ़रमाबरदार हो…………शुक्रिया।

भगवाधारी या खादीधारी ...>>> संजय कुमार

पता नही जी ---------आजकल तो सभी लूट्धारी दिखाई देते हैं।
हमे तो पता नहीं…………देखे जो नहीं

इन शहरो में

क्या है?

अब आप क्या कहेंगे?

ऐसी हिमाकत हम कैसे कर सकते हैं?

प्रकृति से पंगा?

अंजाम के लिये तैयार रहो फिर……………
ये नकाबपोश लड़कियाँ !---आखिर कब सुधरेंगी ?
कभी नहीं-----------ये कैसे हो सकता है?

यही तो मुश्किल है………बच के रहिये।

पत्थर हो गयी हूँ ......  क्यों…………क्या हुआ?

सबकी उम्र जानने के लिए हम आज एक मजेदार ट्रिक लेकर आए हैं !!



बताइये बताइये जल्दी से…………

 मेरा देश महान्………वीरांगनाओं को नमन

चलिये दोस्तों अब आज्ञा दीजिये। अगले हफ़्ते फिर मिलती हूँ नये- नये अन्दाज़ लेकर्।
अब आप अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करा कर होसला अफ़ज़ाई कीजियेगा।

Sunday, August 29, 2010

प्योर मैथ्स का रोमांस और पर्दा भी होना चाहिए ….चर्चा मंच --- 261 ..

नमस्कार , आज रविवार का दिन , यानि कि थोड़ा छुट्टी मनाने का मन …आराम आराम से काम करने का दिन …और मनोज जी तो छुट्टी पर ही चले गए …कोई बात नहीं ..उनकी तरफ से चर्चा ले कर मैं हाज़िर हूँ ..बस आज आप सबकी प्रविष्टियों पर चर्चा नहीं हो पायेगी …एक तरह से यहाँ नए और मेरी पसंद के चिट्ठों का संकलन है …आपातकालीन सेवा में त्रुटियाँ रह जाती हैं …अत: आप सभी से नम्र निवेदन है कि त्रुटियों पर ध्यान न दे कर चिट्ठों को पढ़ें और रविवार का आनन्द लें ….चर्चा में पहले काव्य कलश ….
My Photoस्वप्न मंजूषा जी को पढ़िए ..
हर मौज मगर क्यूँ लगती ज्यूँ, दामन हो साहिल का...
चल रहा काफ़िला दबे पाँव, धीरे-धीरे दिल का
और मुझे भी होश कहाँ, रास्तों का मंज़िल का
My Photo
डा० हरदीप संधू की रचना 
ओ कलम के धनी !
कलम से ज्यादा
ताकत नहीं रखती तलवार
लेकिन कलम की भी
होती है तेज़ धार
My Photo

कविता रावत जी पूछ रही हैं कि  
जिंदगी रहती कहाँ है
अपने वक्त पर साथ देते नहीं
यह कहते हुए हम थकते कहाँ है
ये अपने होते हैं कौन?
यह हम समझ पाते कहाँ है!
My Photo
शाहनवाज़ सिद्दीकी जी की एक गज़ल पढ़िए
यह दूरियों का सिलसिला कुछ इस तरह चला
यह दूरियों का सिलसिला कुछ इस तरह चला
कभी वो खफा रहे, तो कभी हम खफा रहे
रहते थे साथ-साथ मगर आज क्या हुआ
कभी वो जुदा रहे, तो कभी हम जुदा रहे
अनुपमा पाठक लिख रही हैं …
My Photo
कई बातों की बात अभी बाक़ी है ...
कुछ पहर शेष है ... रात अभी बाक़ी है
पर रात बीतेगी , उसे बीतना ही होगा ..
अहले सुबह की शुरुआत अभी बाक़ी है .
मेरा फोटो
वंदना जी तो खुद को ही डूबा हुआ बता रही हैं ..ज़रा देखें कैसे …

हम तो डूबे हुए अशआर हैं

हम तो डूबे हुए अशआर हैं 
दर्द बिन ग़ज़ल बन नहीं सकते 
बहर मात्राओं की जुगलबंदी बिन
मुकम्मल शेर बन नहीं सकते
मेरा फोटोअरुण चन्द्र राय जी आवरण के माध्यम से अपने प्यार को बताते हुए क्या कह रहे हैं …आप भी पढ़ें .. 

आवरण

आवरण
के पीछे
रहता है सच
आवरण झुठलाता है
सच को
देता है
नया अर्थ
नया रूप
मेरा फोटो

दिलीप लाये हैं कुछ नया कुछ अलग अंदाज़ में ….

कुछ ख्याल..

बारूद तो तुम्हारे सीने मे भी है, मेरे सीने मे भी...
बस देखना ये है की चिंगारी पहले किसे छूती है...
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रात के घर की रसोई की वो गोल खिड़की खोलो ना...
जाने कबसे वो चाँदी का गोल ढक्कन लगा हुआ है...
चूल्‍हे के धुएँ से रात की माँ का दम घुटता होगा...
मेरा फोटो
रश्मि जी कुछ खोयी खोयी सी हैं और पूछ रही हैं कि  

मैं कहाँ हूँ !!


मैं हमेशा खो जाती हूँ
फिर ढूंढती हूँ खुद को
सबके दरवाज़े खटखटाती हूँ
पर कहीं नहीं मिलती...
दम घुटता तो है
पर तलाश जारी है अपनी

वाणी गीत  इस बार लायीं हैं एक बहुत भाव पूर्ण रचना ..

विषकन्या


कन्यायें
यूं ही नहीं
रातो रात चुप चाप
तब्दील हो जाती है
विषकन्याओं में...
शिल्पकारशिल्पकार  ललित शर्मा जी  बता रहे हैं कि 
प्रिय तेरी याद आई

जब
मौसम ने ली अंगड़ाई
बदरी ने झड़ी लगाई
सूरज ने आँखे चुराई
तब,प्रिय तेरी याद आई।
जब
अपनो ने की बेवफ़ाई
पवन ने अगन लगाई
घनघोर अमावश छाई
तब,प्रिय तेरी याद आई
मेरा फोटो

आशा जी दिखा रही हैं 
एक झलक
है नई जगह अनजाने लोग ,
फिर भी अपने से लगते हैं ,
हैं भिन्न भिन्न जीवन शैली ,
भाषा भी हैं अलग अलग ,
पर सब समझा जा सकता है ,
उनकी आत्मीयता और स्नेह ,
गति अवरोध दूर करते हैं ,
मेरा फोटो
प्रतिभा सक्सेना जी को पढ़िए …

बार-बार आऊँगा

वाचक -आह रक्त की प्यास नजाने ,जाग जाग उठती क्यों ,
जाने क्यों शैतान उतर कर बार- बार आता है ,
फिर प्राणों के प्यासे बन जाते हैं भाई-भाई ,
उसी लाल लोहू से फिर इतिहास लिखा जाता है ,

वाचिका -मानव के मन कोई शैतान छिपा बैठा है ,
मौका पाते ही जो अपना दाँव दिखा जाता है ,
सींगों से वह निर्माणों को तहस-नहस कर देता ,
कठिन खुरों से सभी सभ्यता रौंद-रौंद देता है ,
My Photo
राजेंद्र स्वरंकर लिख रहे हैं

अभी रमज़ान के दिन हैं ! ईश्वर - अल्लाह एक हैं !

भुलादे रंज़िशो - नफ़रत , अभी रमज़ान के दिन हैं !
तू कर अल्लाह से उल्फ़त , अभी रमज़ान के दिन हैं !
इबादत कर ख़ुदा की , बंदगी  बंदों की ; करले तू
रसूलल्लाह से निस्बत , अभी रमज़ान के दिन हैं
My Photoविवेक रस्तोगी जी देखना चाहते हैं कि विजय किसकी होती है ..

देखना है रक्त की विजय !!! …

विषादों से ग्रसित जीवन,
रुधिर के थक्के
जीवन में जमते हुए,
खुली हवा की घुटन,
थक्के के पीछे
नलियों में, धमनियों में,
धक्के मारता हुआ
राजभाषा पर पढ़िए     विश्वास का उजास
रात कुछ गहरा सी गई है
शहर भी सारा सो सा रहा है
अचानक आता है -
कोई मंजर आंखों के सामने
ऐसा लगता है कि -
कहीं कुछ हो तो रहा है।
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शाहिद मिर्ज़ा जी की गज़ल का आनंद उठाइए .. 
पर्दा भी होना चाहिए

बेग़रज़ बेलौस इक रिश्ता भी होना चाहिए
ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अच्छा भी होना चाहिए
बोलिए कुछ भी मगर आज़ादी-ए-गुफ़्तार में
लफ़्ज़ पर तहज़ीब का पहरा भी होना चाहिए
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हरीश जी  बात कर रहे हैं कुछ     अंतःकरण    की

वह साहस
बहुत मुश्किल से आता हैं
आपके भीतर से कोई चीखता हैं
रुकना नहीं
जो होगा देखा जायेगा
आप ठिठक देखते हैं
कोई नहीं हैं
आसपास
मेरा फोटो

उच्चारण पर पढ़िए  …  
“आज का समय” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आज समय का, कुटिल - चक्र चल निकला है।
संस्कार का दुनिया भर में, दर्जा सबसे निचला है।।
नैतिकता के स्वर की लहरी मंद हो गयी।
इसीलिए नूतन पीढ़ी, स्वच्छन्द हो गयी।।
अपनी गलती को कोई स्वीकार नही करता है।
अपने दोष, सदा औरों के माथे पर धरता है।।
अब काव्य रस का आसास्वादन कर लेने के बाद  ले चलती हूँ कुछ बौद्धिक बातों पर ….अब आप कहेंगे कि क्या कविता मैं बुद्धि नहीं लगती ….लेकिन मैंने ऐसा नहीं कहा है …:) कविता में मन का भाव ज्यादा महत्त्व रखता है …  संवेदनशीलता ज्यादा होती है ….और लेखों में दिल से ज्यादा तर्क  काम  करता है …तो लीजिए अब हम ले चलते हैं तर्क के क्षेत्र में …
मेरा फोटोराजीव खंडेलवाल बता रहे हैं ….संसद के इतिहास का काला दिन
गत शुक्रवार को भारतीय संसद में सांसदो का वेतन १६ हजार से बढ़ाकर ५० हजार व अनेकानेक भो भी गई गुना बढ़ाये जाने का प्रस्ताव सर्वसमति से पारित किया गया और इसके ४ दिन बाद ही सोमवार केबिनेट ने पुनः १० हजार रुपये की पैकेज में वृद्धि के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की। इस प्रकार लगभग ८४०००/- से अधिक की कुछ वृद्धि वेतन व अन्य भाड़ो में हुई।
My Photoप० डी० के० शर्मा “वत्स" बता रहे हैं …   कर्म चक्र, भाग्य और आधुनिक विज्ञान
पिछले आलेख में आपने जाना कि कर्म का सिद्धान्त कोई धार्मिक अवधारणा नहीं है बल्कि कार्य-कारण के नियम से बँधा विशुद्ध् भौतिकी का ही सिद्धान्त हैं. अब सवाल ये उत्पन होता है कि कार्य-कारण के अटल नियम में से बच निकलने का इन्सान के पास कोई रास्ता नहीं, तो क्या कर्म के बन्धनों से बच निकलने का भी कोई रास्ता नहीं हैं ?
मेरा फोटोदीपक जी का ब्लॉग है ..दीपक बाबा की बक –बक …और वो बता रहे हैं …
शीला दीक्षित - हे दिल्ली की अर्राध्य देवी - तुम नमन है
हे हाईकमान नन्दनी, दिल्ली में आपके महंगाई जनक आदेशों से दबा हुवा शहरी होने के नाते में तुम्हे प्रणाम करता हूँ. मैडम जी, जिस प्रकार आप दिल्ली १९९८ से दिल्ली की बागडोर हाई कमान की इनायत से संभल रही हैं – उसे में अभिभूत हूँ – और आपके समक्ष नतमस्तक होकर आपको दुर्गेश नन्दनी की तर्ज़ पर हाईकमान नन्दनी के खिताब से नवाजता हूँ.
लोक संघर्ष पर पढ़िए सुमन जी का लेख …
हिन्दुवत्व वादी संगठन उन्माद फैलाने की तैयारी में
सितबर माह में बाबरी मस्जिद प्रकरण में माननीय उच्च न्यायलय, इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ काफैसला आने वाला है। उस फैसले के मद्देनजर हिन्दुवत्व वादी संगठनो के नेता व कार्यकर्ताजगह-जगह धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए प्रष्टभूमि तैयार कर रहे हैं

चंद्र भूषण जी लाये हैं गणित गाथा 

प्योर मैथ का रोमांस


अट्ठारह साल के एक नौजवान ने अपने पिता को लिखे पत्र में बड़े उत्साह से अपने रिसर्च टॉपिक के बारे में बताया। जवाब में भेजी गई चिट्ठी में पिता ने लिखा- मेरे बेटे, समानांतर रेखाओं के फेरे में तो तुम हरगिज न पड़ना। यह रास्ता मेरे लिए अच्छी तरह जाना-बूझा है। न जाने कितनी अंतहीन रातें जाग कर मैंने इसकी थाह लेने की कोशिश की है लेकिन मेरे जीवन की सारी रोशनी, मेरी सारी खुशी इस प्रयास में स्वाहा हो गई।
हमज़बान पर शहरोज़  लाये हैं    .. सैयद एस क़मर की कलम से 

पैसे से खलनायकी ...सफ़र कबाड़ का

 उड़ीसा से छत्तीसगढ़ तक वेदांता की ख़ूनी रेल

यह कोई फ़िल्मी  कहानी नहीं है जिसमें एक कुली मजदूर किस तरह रातों रात खरब पति बन जाता है,यह कहानी वेदांता जैसी कंपनी के मालिक की  है, जिसकी छवि आम लोगों के दरम्यान खलनायक की है ,लेकिन उसे  नायक बनाने के लिए कुछ अफसरों और राजनेताओं ने सारे नियम-कानून को धता बताते हुए ज़मीन-आसमान एक कर दिए हैं
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संगीता पूरी जी  गत्यात्मक ज्योतिष सिखाते हुए बता रही हैं कि -
गोचर क्‍या होता है ??

ज्‍योतिष में रूचि रखने वाले भी बहुत लोग गोचर का अर्थ नहीं जानते हैं। पृथ्‍वी के सापेक्ष सभी ग्रहों की गति ही गोचर कहलाती है। आकाश में वर्तमान में कौन सा ग्रह किस राशि और नक्षत्र में चल रहा है, यही ग्रहों का गोचर है , जिसे हम पंचांग के माध्‍यम से जान पाते हैं। भले ही हम जीवनभर की परिस्थितियां अपने जन्‍मकालीन ग्रहों से प्राप्‍त करते हों , पर गोचर का विचार फलित करते समय महत्‍वपूर्ण माना जाता है , क्‍यूंकि अस्‍थायी समस्‍याओं को जन्‍म देने में इसकी बडी भूमिका होती है। '
[IMG_0155[9].jpg]मनोज जी मनोज ब्लॉग पर लाये हैं .. 
फ़ुरसत में… साहब आप भी न.....
सुबह सुबह मॉर्निंग वाक पर जाता हूँ। सवा से डेढ़ घंटे की हमारी सैर होती है। जिस दिन जैसा स्‍पीड रहा। कभी ब्रिस्‍क वॉक, तो कभी फ़्रिस्क (frisk – to move sportively), कभी कभी तो रिस्‍क वॉक भी हो जाता है। अब उसी दिन एक टैक्सी वाला छूकर कर निकल गया, बाल-बाल बचा
My Photoपी० सी० गोदियाल जी अंधड पर आंधी ला रहे हैं …..

अन्य धर्मों द्वारा फैलाया जा रहा यह आतंकवाद तो कौंग्रेस और गृहमंत्री जी को नजर ही नहीं आता !

अपने मोहरों को बारी-बारी से आगे करके राजनीति की विसात पर जमकर राजनैतिक फायदा कैसे उठाया जाता है, मैं समझता हूँ कि हमारे राजनैतिक दलों को यह खेल कौंग्रेस से सीखना चाहिए ! अभी ताजा उदाहरण गृहमंत्री पी चिदंबरम का वह बयान है जिसमे उन्होंने भगवे को ही आतंकवाद का खिताब दे डाला
My Photoराज कुमार सोनी जी बिगुल पर दिखा रहे हैं कुछ  सपने ….

सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना
कवि पाश की यह बात पूरी तरह से सच है क्योंकि एक सपना ही है जो हमें आगे बढ़ाता है, पीछे धकेलता है और रास्ता भी बताता है। अब सवाल यह है कि सपनों को हकीकत में बदलने के लिए क्या किया जाए। अव्वल तो पहले वही सपना देखना चाहिए जिस सपने से आपका आत्मीय रिश्ता कायम हो सकें। अब हेमामालिनी का सपना देखकर कोई यह सोचे कि उसकी बिटिया से ब्याह कर लेगा तो इसे सपना मानना भी गलत है।
My Photo
राजीव ओझा जी मिलवा रहे हैं कुछ ब्लोगर्स से …आप भी मिलिए ..
भौकाली ब्लॉगर
कालेज डेज में हम लोगों को नसीहत दी जाती थी कि खाली, बीए-एमए करने से कुछ नही होगा. कुछ बनना है तो स्पेशलाइज्ड फील्ड चुनो. इसी तरह जर्नलिस्टों की जमात में घुसने पर सीनियर्स ने कहा आगे बढऩा है तो स्पेशलाइज्ड फील्ड पकड़ो. उस समय एड्स के बारे में कम ही लोग जानते थो सो इस पर खूब ज्ञान बघारा.


प्रवीण पाण्डेय  जी ने इतिहास बदल दिया है ….महाभारत १८ दिन की  जगह २१ दिन की  ले कर आये हैं ….नहीं विश्वास तो आप भी पढ़ें …
21 दिवसीय महाभारत
21 दिन पहले मानसिक ढलान को ठहरा देने का वचन किया था, स्वयं से। वह वचन भी नित दिये जाने वाले प्रवचनों की तरह ही प्रभावहीन निकल गया होता यदि उसमें रॉबिन शर्मा की 21 दिवसीय सुधारात्मक अवधि का उल्लेख न होता। जिस समय 21 दिन वाले नियम का उल्लेख कर रहा था, खटका उसी समय लगा था कि कहीं अपनी गर्दन टाँग रहा हूँ।
आज की चर्चा को यहीं विराम देती हूँ …..उम्मीद है कि आपको पसंद आएगी ….आपकी प्रतिक्रियाएं हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं ….शुक्रिया …नमस्कार

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