चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Sunday, December 29, 2013

शक़ ना करो....रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1476

नमस्कार....
इस वर्ष की आखिरी रविवारीय चर्चा मे ई॰ राहुल मिश्रा का आप सभी को प्यार भरा नमस्कार....
हर तरफ एक नया सूरज अपनी छंटा बिखेरने को आतुर हैं....मानो सब बस नए साल की इंतेजार मे बैठे पड़े थे....
जिस ब्लॉग पर नज़ेरें फिरा रहा हर तरफ नए वर्ष का माहौल है
संकल्प....इरादा....रेसोल्यूशन....
जो भी कह ले आप....जो भी ले ले आप....
जरूरी है वक़्त चलायमान है....स्थिर तो बस आपकी व्यावहारिक सोच है....
बस उसे बदले....सकारात्मक सोच से असीम ऊर्जा का संचार होता....
नव वर्ष की अग्रीम शुभकामनाएँ आपको
अभी हम कुछ चुनिन्दा लिंको को आपसे सांझा करते है....

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तो ग़ज़ल लिखती 

(प्रीति सुराना)


अगर कोई सिखाता तो ग़ज़ल लिखती,
ग़ज़ल क्या है बताता तो ग़ज़ल लिखती
न मतला जानती हूँ और ना मकता,
बहर क्या है बताता तो ग़ज़ल लिखती...!!!

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आप की हूक दिल में जो उठबे लगी..............

(यशोदा अग्रवाल)

आप की हूक दिल में जो उठबे लगी...
जिन्दगी सगरे पन्ना उलटिबे लगी...!!
बस निहारौ हतो आप कौ चन्द्र-मुख...
जा ह्रिदे की नदी घाट चढ़िबे लगी...!!!
पीउ तनिबे लग्यौ, बन गई बौ लता...
छिन में चढ़िबे लगी छिन उतरिबे लगी...!!
प्रेम कौ रंग जीबन में रस भर गयौ...
रेत पानी सौ ब्यौहार करिबे लगी...!!
मन की आबाज सुन कें भयौ जै गजब...
ओस की बूँद सूँ प्यास बुझबे लगी...!!
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कवितायें 

(स्वाति जैन)

तुझसे शुरू होकर
तुझ पर खत्म होने वाली
हजारों कवितायें मुझमें
सिमटी है

इन कविताओं की प्रत्येक
पंक्ति में प्यार बसा है,
शब्दों में संवेदनायें निहित है
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नये साल में 

(रोहित रुसिया)


कल के पन्नों पर हम लिख दें
अपना भी इतिहास

बीज रोपते हाथों की
उष्मा बन जाएँ
चट्टानी धरती पर
झरनों से बह जाएँ

सूखे कंठों की खातिर हो लें
बुझने वाली प्यास
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"विदा 2013" एक नज़्म.........

(अनुलता राज नायर)

दिसम्बर के आते ही
सुनाई देने लगती है नए साल की दस्तक
जो तेज़ होती जाती है हर दिन
मानों आगंतुक अधीर हो उठा हो !
मेरा मन भी अधीर हो उठता है
जाते वर्ष की रूंधी आवाज़ और सीली पलकें देख....
बिसरा दिए जाने का दुःख खूब जानती हूँ मैं |
तसल्ली दी मैंने बीते साल को कि
वो रहेगा सदा मेरी स्मृतियों में !
सो जमा कर रही हूँ एक संदूक में
बीते वर्ष की हर बात
जिसने मुझे सहलाया/रुलाया/बहकाया/सिखाया...
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शक़ ना करो 

(राजीव शर्मा)

शक़ ना करो हम पर तुम
जब से है देखा इन आँखों ने तुमको
ना जाना किसी को ना चाहा किसी को
बस रहती हैं ये गुमसुम, शक़ ना करो हम पर तुम
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असम्बद्ध टुकड़े...!

(अनुपमा पाठक)

यहाँ अजब परिपाटी है... न रहने के बाद ही लोग याद करते हैं... जीवन रहते याद आने को तरसते हुए ही कटती है अक्सर ज़िंदगियाँ...
***
बहुत डर लगता है... सब रूठ जाते हैं मुझसे... जिन्हें हम चाहते हैं... मानते हैं... उनसे बात करने के लिए तरसते रह जाते हैं... ये अभागापन नहीं तो और क्या है, कि ज़िन्दगी! तू भी तो अक्सर रूठी हुई ही मिलती है मुझे...
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कुदरत की रीत अनोखी है

(अनीता)


जो खाली है वह भरा हुआ
जो कुछ भी नहीं वही सब कुछ,
कुदरत की रीत अनोखी है
जो लुटा रहा वह ही पाता !


जो नयन मुँदे वे सब देखें
उस की यह कैसी चतुराई,
थम जाता जो वह ही पहुँचा
जो हुआ मौन सब कह जाता !

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रिवाज- ए- दुनिया...

 (प्रीति वाजपेयी)

जरा हौसला कर मैंने, 
जो कदम निकाला डेहरी पर 
मेरे हिस्से की जमीं ही,
मुझसे मुँह मोड़ लेती है| 

मै सोचती हु बेख़ौफ़ हो 
कही दूर उड़ जाउ एक दिन 
पर चिढ़कर किस्मत
मेरे ही पंखों को नोच देती है।
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संबंधो के रेशे....!!! 

(शिखा गुप्ता)

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दर्द और आगोश...

(प्रियंका जैन)

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(शांतनु शान्याल)



तुम्हारी चाहतों में है कितनी सदाक़त 
ये सिर्फ़ तुम्हें है ख़बर, हमने तो 
ज़िन्दगी यूँ ही दाँव पे 
लगा दिया, हर 
मोड़ पर 
हिसाब ए मंज़िल आसां नहीं, तुम्हें - - 
इसलिए दिल में मुस्तक़ल तौर 
पे बसा लिया, वो हँसते हैं 
मेरी दीवानगी पे 
अक्सर !
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आज एक ख्वाब हो तुम...

(निदा रहमान)


आज एक
ख्वाब हो गए
कल तुम
सच थे मेरा...
मैंने तो कभी
नहीं माँगा था
साथ तुम्हारा
तुमने ही
हाथ बढाया...
क्यों आये
मेरे करीब
नहीं समझ पाई...
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ख़ामोशी 

(अभिषेक शुक्ल)


रात के अँधेरे मेँ,
ख़ामोशी
कुछ इस कदर
पाँव
पसारती है
कि,
समझना
मुश्किल हो जाता है
कि
ख़ामोश हम हैँ
या रातेँ ?
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कितनी कहावतें ||दोहे|| 

(राजेश कुमारी)

कष्ट सहे जितनी यहाँ,डालो उन पर धूल|
अंत भला सो सब भला ,बीती बातें भूल||

विद्या वितरण से खुलें ,क्लिष्ट ज्ञान के राज|
कुशल तीर से ही सधे ,एक पंथ दो काज||

कृष्ण काग खादी पहन,भूला अपनी जात|
चार दिवस की चाँदनी,फिर अँधियारी रात||

जिसके दर पर रो रहा , वो है भाव विहीन|
फिर क्यों आगे भैंसके,बजा रहा तू बीन||
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धन्यवाद....अब नए वर्ष मे मुलाक़ात होगी.....!!!`
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हमारे नेट को सर्दी लग गयी थी।
इसलिए "उच्चारण" पर न तो अपनी पेस्ट लगा पाया 
और न ही कुछ लिख पाया।
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अब आगे देखिए.. "मयंक का कोना"
मित्रों कल दोपहर के बाद
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जीवन की चाह ......

 *जीवन* की इस रेल -पेल में ..
इस भाग दौड़ में 
जिन्दगी जैसे ठहर -सी गई थी ...
दर्शन कौर धनोय 
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भारतीय नेता की योग्यता 

एक आम भारतीय सरकारी क्लर्क बनने जाता है 
परीक्षा पर परीक्षा उसको नित्य देना पड़ जाता है...
आपका ब्लॉग पर Hema Pal 
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सज गई "सम्मान" की मंडी 
पुस्तक मेले में गई हुई थी, तमाम  किताबों को उलटते पलटते मेरी  निगाह एक किताब पर जा टिकी.. उसका  नाम था " धन कमाने की तीन सौ तरीके " । कीमत थोड़ा ज्यादा थी, आठ सौ रुपये, लेकिन दिमाग में एक बात थी,  क्या फर्क पड़ता है, ले लेते हैं। अगर एक तरीका भी हिट हो गया तो बस अपनी तो लाटरी निकल जाएगी। चुपचाप मैने ये किताब खरीद ली और घर पहुंच कर सब  काम धाम निपटाने के बाद उनसे कह दिया कि आज चाय खुद बना लीजिएगा,  मुझे डिस्टर्ब नहीं करना है। पहले तो मियां जी समझ नहीं पाए कि आखिर माज़रा  क्या है, क्यों कह रही है कि  चाय खुद ही बना लेना, लेकिन जब उन्होंने  मेरे हाथ  में धन कमाने की तीन सौ तरीके वाली किताब देखी तो खुशी-खुशी  राजी हो गए...
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र पर 

vandana gupta 
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फुरसत में… 114 नालंदा के खंडहरों की सैर 

मनोज पर मनोज कुमार 

--
"मेरा टेलीफोन" 
बालकृति नन्हें सुमन से
एक बालकविता
स्वर - अर्चना चावजी का 

IMG_1687
होता कभी नही है मौन!
यह है मेरा टेलीफोन!!

इसमें जब घण्टी आती है,
लाल रौशनी जल जाती है,

हाथों में तब इसे उठाकर,
बड़े मजे से कान लगा कर,

मीठी भाषा में कहती हूँ,
हैल्लो बोल रहे हैं कौन!
यह है मेरा टेलीफोन!!
नन्हे सुमन
--
काँटों से निबटना जरूरी 
कदम खुद का खुद से परखना जरूरी 
मुसीबत से लड़कर निकलना जरूरी 
सहज नींद आती है रोटी भी मीठी 
पसीने में हर दिन महकना जरूरी....
मनोरमा पर श्यामल सुमन

--
कांग्रेस बोले तो करप्ट पार्टी 
कांग्रेस पार्टी करप्ट पार्टी के रूप में बदनाम (मशहूर )हो चुकी है। 
इसलिए कांग्रेस आदर्श स्केम के गिर्द गिरिफ्त में आये 
महाराष्ट्र के कांग्रेसियों (मौसेरे  भाइयों ) को 
हटाने का नाटक तो कर सकती है 
लेकिन नैतिक बल  अब कांग्रेस के पास कहाँ  हैं?... 
आपका ब्लॉग पर वीरेन्द्र कुमार शर्मा
--
तहेदिल से शुभकामनाएँ 
 केजरीवाल जो कहते हैं कि ‘भ्रष्टाचार की जड़ें नीचे से ऊपर तक पूरे तन्त्र को जकड़ी हुई हैं, विधान सभाओं और संसद में आधे से अधिक सदस्य भ्रष्ट और दागी हैं इसलिए जनलोकपाल जैसे कठोर क़ानून की जरूरत है और इस पूरी व्यवस्था को बदलना होगा... 
जाले पर (पुरुषोत्तम पाण्डेय)

--
मैं आम आदमी हूँ ... 
मैं आम आदमी हूँ..... कहने को तो मैं प्रजातंत्र का राजा हूं पर मुझे हरम में रखा गया। मुझे देख कर पुलिस उसी प्रकार टूट पड़ती जैसे किसी गली कोई नया कुत्ता आने पर अन्य कुत्ते टूट पड़ते...
चौथाखंभा पर ARUN SATHI 

--
"कैसे उतरें पार?" 
लिए पुरानी अपनी नौका, 

टूटी सी पतवार, 

बताओ कैसे उतरें पार? 
देख रवानी लहरों की, 
हमने मानी है हार, 
बताओ कैसे उतरें पार? 
शब्दों का दंगल
--
"जिल्लत का दाग़" 

जब गाँव का मुसाफिरआया नये शहर में।
गुदड़ी में लाल-ओ-गौहर, लाया नये शहर में।

इज्जत का था दुपट्टा, आदर की थी चदरिया,
जिल्लत का दाग़ उसने, पाया नये शहर में।
--
"रिश्वत का चलन मिटायें" 

अपना देश महान बनायें। 
आओ नूतन वर्ष मनायें।।
काग़ज़ की नाव (मेरे गीत)

23 comments:

  1. आभार ....बेहतरीन संग्रह

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  2. आने वाला वर्ष सबके लिए सुखद हो...!
    शुभकामनाएं!

    आभार!

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  3. बहुत सुंदर सूत्र संयोजन !

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  4. बहुत रसीला संयोजन, बधाई है.

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  5. बढ़िया सूत्रों से सजा आज का चर्चा मंच |

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  6. बहुत सुन्दर चर्चा ...बहुत बहुत बधाई मिश्रा राहुल जी को सुन्दर सूत्र संयोजन.

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  7. सभी मित्रों को नव वर्ष की अग्रिम बधाई ,बाहर जा रही हूँ कुछ वक़्त तक चर्चा नहीं लगा पाउंगी शुभकामनायें

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  8. बढ़िया लिंक्स व प्रस्तुति , मिश्रा जी व मंच को धन्यवाद
    नया प्रकाशन -: कंप्यूटर क्या है ? ( what is the computer ?)

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  9. बहुत बढियां लिंक्स से आज की चर्चा सजाई है ..

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  10. अगर कोई सिखाता तो गज़ल लिखती ,

    बहर कहते किसे बताता तो गज़ल लिखती ,

    सादगी लिए है प्रीती सुराणा की गज़ल ,

    आंचलिक रंग भर दीन्हाँ

    यशोदा अगरवाल ने -

    बस निहारौ हतो आप कौ चन्द्र-मुख...
    जा ह्रिदे की नदी घाट चढ़िबे लगी...!!!

    स्वाति जैन कविता में स्वांस का विस्तार कृष्ण की तरह -

    तुझसे शुरू होकर
    तुझ पर खत्म होने वाली
    हजारों कवितायें मुझमें
    सिमटी है

    खूब सूरत रंग भरे आया है साल का आखिरी मंच चर्चा।

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  11. नए संकल्पों का काव्य रच रहें हैं नव वर्ष वेला में शास्त्री जी -

    चमचे-गुण्डे और मवाली,
    यहाँ न खाने पाये दलाली,
    उनको ही मत देना अपना,
    जो रिश्वत का चलन मिटायें।
    अपना देश महान बनायें।
    आओ नूतन वर्ष मनायें।।

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  12. बहुत सुन्दर रचना परिवेश प्रधान

    जब गाँव का मुसाफिर, आया नये शहर में।
    गुदड़ी में लाल-ओ-गौहर, लाया नये शहर में।

    इज्जत का था दुपट्टा, आदर की थी चदरिया,
    जिल्लत का दाग़ उसने, पाया नये शहर में।

    चलती यहाँ फरेबी, हत्यायें और डकैती,
    बस खौफ का ही आलम, छाया नये शहर में।

    औरत के हुस्न थी, चारों तरफ नुमायस,
    शैतानियत का देखा, साया नये शहर में।

    इंसानियत यहाँ तो, देखी जलेबियों सी,
    मिष्ठान झूठ का भी, खाया नये शहर में।

    इससे हजार दर्जे, बेहतर था गाँव उसका,
    फिर “रूप” याद उसको, आया नये शहर में।

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  13. सुन्दर लिंक ... बेहतरीन चर्चा ...

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  14. बहुत सुन्दर चर्चा.....
    बहुत बढ़िया लिंक्स....हमारी नज़्म को स्थान देने का बहुत बहुत शुक्रिया....
    नव वर्ष की मंगलकामनाएँ

    अनु

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  15. धन्यवाद राहुल मिश्रा जी..!!

    सादर आभार..!!

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  16. बेहतरीन सूत्र समायोजन, समायोजक महोदय बधाई के पात्र हैं;मेरी कविता को शामिल करने के लिए शुक्रिया.....

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  17. एक से बढ़कर एक लिंक्स ... नए वर्ष की ओर जाते दिनों को सुंदर भेंट मिली है
    हमारी रचना 'संबंधों के रेशे' को यहाँ स्थान देने के लिए बहुत सारा आभार
    शुभ-कामनायें

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  18. एक चूक हो गयी थी.....लिंक संबंधो के रेशे....(शिखा गुप्ता)....!!
    का लिंक ठीक तरीके से लग नहीं पाया था....अगर भूल वस कुछ गलती हो जाती तो हमसे अवगत करा दिया करे....!!!
    क्षमा शिखा जी...क्षमा मंच....!!!
    - मिश्रा राहुल

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  19. आभार ..उम्दा लिंक्स .!
    नव वर्ष की मंगलकामनाएँ
    Recent post -: सूनापन कितना खलता है.

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  20. बहुत बहुत आभार मुझे आज की चर्चा में शामिल करने के लिए..सुंदर पठनीय लिंक्स !

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