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Tuesday, January 17, 2012

"टीचर जी! मत पकड़ो कान" (चर्चा मंच-761)

मित्रों!
अपनी सुविधा से लिए, चर्चा के दो वार।
चर्चा मंच सजाउँगा, मंगल और बुधवार।।
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।

"टीचर जी! मत पकड़ो कान"

- अम्मी ने कहा मत बुन ख्वाब
ठीक हैं लेकिन क्या करूँ,
ख्वाब बिना जिंदगी जिंदगी नही लगती......
लगता हैं शमशान है...
हिन्दी साहित्य पहेली 64 पत्रिका को पहचानो - हिन्दी साहित्य पहेली 63 के संबंध में आदरणीय डा0 रूपचंद जी शास्त्री मयंक जी का यह प्रेक्षण (आव्जरवेशन) रहा है कि इतनी आसान पहेली नहीं पूछनी चाहिये...
अन्नपूर्णा--- कविता...डा श्याम गुप्त - भोजन ब्रह्म है, और जीव - हज़ार मुखों से ग्रहण करने वाला- वैश्वानर है, जगत है | और हज़ार हाथों से बांटने वाली, अन्नपूर्णा- माया है उसी ब्रह्म की..... |
हमारी कमजोर नस! - * आज के युवा जो अपने भविष्य निर्माण के लिए पढ़ रहे हें और माँ बाप जिन्हें अपने घर गाँव से दूर , चाहे वे खुद नमक रोटी खा लें लेकिन बेटे के लिए खर्च पूरा ही भरते हैं...
खाते थे पांच मिनिट में तीन...
उम्र की दराज खोलकर जो देखी उम्र ही वहाँ जमींदोज़ मिली सिर्फ़ एक लम्हा था रुका हुआ जिसके सीने मे था कैद ज़िन्दगी का वो सफ़ा...
कैसी-कैसी बिल्लियां
हमारे देश में तो सिर्फ "सनातन धर्म " था। जिसमें 'सेवा-भाव' को ही धर्म कहा गया है ! लेकिन अब धर्म की सच्ची परिभाषा कौन समझता है भला?..
बदली दर्द की बरस कर पलकों पर रह गई
बात दिल की फ़िर होंठों तक आ कर रह गई
टूटी न खामोशी आज भी पहली रातों की तरह
ख्वाव उजले लिये यह रात भी काली रह गई..
की
मैंने एक शेर कहा था :
संजीदगी, वाबस्तगी, शाइस्तगी, खुद-आगही आसूदगी,
इंसानियत, जिसमें नहीं, क्या आदमी वाबस्तगी..
शाबाश! अभिनव प्रकाश!:
वाह!
पोस्ट लगाकर हटा भी दी।
कोई भला कैसे शाबाशी दे पायेगा?
२५ अगस्त' २००९ को लिखे गए कुछ पन्ने हाथ आ गए... पढ़ा उन्हें... सहेजने का मन हुआ उन पन्नों को और पढ़ते हुए वो भाव फिर से जी गए..
पिछले सप्प्ताह बर्फ़ पड़ी। बर्फ़ पड़ने के बाद वाले दिन,
जब पूरी ज़मीन ढकी होती है सफ़ेद रूई से...
फूलों की वीथियों में ,शूलों को पाए हैं ,
जख्म इतने गहरे हैं ,भूले न भुलाये हैं -
टूटे थे पत्ते कितने तरुअर की साखों से..
बड़ा सरल संसार है , यहाँ नहीं कुछ गूढ़।
है तलाश किसकी तुझे,तय करले मति मूढ़. I 1 I...
कल हम दोनों ने एक पुल जलाया था
और दरिया के किनारों की तरह नसीब बांटे थे
बदन झटके तो एक बदन की वीरानी इस पार थी
और एक बदन की वीरानी उस किनारे फिर...
*आ*प सोच रहे होंगे अरे भाई रात भर जागने का क्या मतलब है,
क्या लोग इतना काम करते हैं कि रतजगा करना पड़ता है,
तो मैं आपको बता दूं ये काम के चलते नहीं जागते।...
यही तो है
क्योंकि

मंदिर है मन : प्रणय कविता

अन्त में देखिए!

18 comments:

  1. लाजवाब प्रविष्टि और सुन्दर लिंक्स

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  2. सार्थक, सु-संयोजित पोस्ट के लिए बधाई हो मान्यवर.

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  3. शुभप्रभात ....बहुत सुंदर चर्चा ...
    मुझे स्थान दिया ...मेरे प्रश्न को स्थान दिया ...आभार आपका ...!!

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  4. सुन्दर और ढेर सारे लिंक्स के साथ बहुत खूबसूरती से आपने चर्चा प्रस्तुत किया है!मेरी शायरी चर्चा में शामिल करने के लिए धन्यवाद!

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  5. सुसज्जित चर्चा,बढ़िया लिंक्स...
    मेरी रचना काश तुम ना पधारते को स्थान देने के लिए आभार|

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  6. बढिया तरीके से सजा मंच।
    सुंदर लिंक्‍स।

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  7. सुंदर लिंक्स
    कुछ नए अंदाज में चर्चा है आज

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  8. धन्यवाद ...अन्नपूर्णा के लिये..

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  9. बहुत बढ़िया रंग-रँगीली चर्चा!

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  10. बहुत सुन्दर.:)

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  11. सुंदर लिंक्स से सजी रंगीन चर्चा, अभी-अभी ही पूरी पढ़ पाये.आभार.

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