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Friday, July 22, 2016

"रात का हरता अन्धेरा" (चर्चा अंक-2411)

मित्रों 
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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गीत  

"रात का हरता अन्धेरा" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 


बाँटता ठण्डक सभी को, चन्द्रमा सा रूप मेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।

रश्मियों से प्रेमियों को मैं बुलाता,
चाँदनी से मैं दिलों को हूँ लुभाता,
दीप सा बनकर हमेशा, रात का हरता अन्धेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा... 
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खुद को झूठा मानने में सच्चे 

जून और जुलाई महीनों में सौगन्ध उठाने के समारोहों की मानो बाढ़ आ जाती है। अन्तर राष्ट्रीय स्तर के सेवा संगठनों की स्थानीय इकाइयाँ अपने-अपने पद-भार ग्रहण और शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करती हैं। यह अलग बात है कि इन संगठनों के नीति निर्देशों में ऐसे शपथ ग्रहण समारोहों का प्रावधान नहीं है... 
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 
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जनाज़े को मेरे उठाने से पहले 

तेरे बज्म में कुछ सुनाने से पहले । 
मैं रोया बहुत गुनगुनाने से पहले... 
Naveen Mani Tripathi 
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ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं 

अश्को को रोकता हूँ मैं रुकते मगर नहीं 
आतिश हैं वो के आब हैं उनको ख़बर नहीं... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
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एक चिठ्ठी बेटी के नाम। .. 

मेरे मन की पर अर्चना चावजी  
Archana Chaoji 
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शांत रातें 

मेरी स्वलिखित अंग्रेजी लघुकथा कड़ियों में से 
एक का हिंदी अनुवाद.. 
त्रुटियों के लिए क्षमा... 
सुनहरी यादें पर abhinav pandey 
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लम्हा 

जिन्दगी तू पलट के देखती क्यों नहीं  
गुजरे लम्हों को समेटती क्यों नहीं... 
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL 
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अभिशाप नहीं,सीधे संवाद का 

सटीक माध्यम है सोशल मीडिया 

इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया खासकर न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया को खरी-खोटी सुनाना एक फैशन बन गया है. मीडिया की कार्यप्रणाली के बारे में ‘क-ख-ग’ जैसी प्रारंभिक समझ न रखने वाला व्यक्ति भी ज्ञान देने में पीछे नहीं रहता. हालाँकि यह आलोचना कोई एकतरफा भी नहीं है बल्कि टीआरपी/विज्ञापन और कम समय में ज्यादा चर्चित होने की होड़ में कई बार मीडिया भी अपनी सीमाएं लांघता रहता है और निजता और सार्वजनिक जीवन के अंतर तक को भुला देता है... 
सादर ब्लॉगस्ते! पर संजीव शर्मा 
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सबसे प्यारा उपहार 

कभी कभी एक पल भी जिंदगी को कितना हसीं बना देता है एक माँ के जन्मदिन पर एक छोटे बच्चे ने उपहार दिया डिब्बा माँ ने खोला तो वह खाली था कुछ देर माँ असमंजस मैं रही फिर वह बच्चे से बोली लगता है बेटे आप इसमें कुछ रखना भूल गए हो बेटा बोला माँ मैंने तो इसमें बहुत सारी पप्पी भर कर रखी थीं माँ स्तब्ध रह गई उसकी आंखे भर आई उसे जीवन का सबसे अच्छा . उपहार मिला था... 
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हिन्दी कविता की नई सुबह का इंतजार ? 

पृथ्वी पर आज तक विकास के जितने आश्चर्य दिखे या दिख रहे हैं, उसका सूत्रधार कौन है ? आगे अभी न जाने कितने चमत्कारी विकास प्रत्यक्ष होंगे, उनका मूल कारण कौन होगा ? प्रायः साधारण कद-काठी, वजन और शारीरिक बल वाला यह मनुष्य ही वह कारण है, जो कल्पना को जमीन पर उतारता है, जो इच्छाओं को आकार देता है, सपनों को हकीकत में बदलने का जज्बा रखता है... 
शब्द सक्रिय हैं पर सुशील कुमार 
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म प्रतिवर्ष सितंबर माह में हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह 
या फिर हिंदी पखवाड़ा मनाते हैं. 
साल भर की हिंदी के प्रति जिम्मेदारी 
एक दिन, एक सप्ताह... 
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पृथ्वी पर आज तक विकास के 
जितने आश्चर्य दिखे या दिख रहे हैं, 
उसका सूत्रधार कौन है ? 
आगे अभी न जाने कितने 
चमत्कारी विकास प्रत्यक्ष होंगे, 
उनका मूल कारण कौन... 
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टेढ़ी-मेढ़ी डगरिया, पड़ते डग-मग पैर |चार-दिना की उमरिया, रहा मनाता खैर |
रहा मनाता खैर, खैर यह बीत रही है |
ना काहू से बैर, दोस्ती नहीं कहीं है |
रविकर भव-भय तंग, करे यह देह अधेड़ी |
काम-क्रोध-मद क्षीण, मोक्ष की भृकुटी टेढ़ी || 
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"रंग जिंदगी के" (चर्चा अंक-2818)

मित्रों! शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...