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Sunday, September 13, 2020

"सफ़ेदपोशों के नाम बंद लिफ़ाफ़े में क्यों" (चर्चा अंक-3823)

पर्वों का महत्व 
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो सामाजिक बन्धनों और रिश्तों की सुनहरी डोर से बँधा हुआ है। व्यक्ति सम्पूर्ण जीवन व्यस्त रहता है इन सबसे कुछ राहत पाने तथा कुछ समय हर्षोल्लास के साथ, बिना किसी तनाव के व्यतीत करने के लिये ही मुख्यतः पर्व एवं त्यौहार मनाने का प्रचलन हुआ। इसीलिये समय-समय पर वर्षारम्भ से वर्षान्त तक वर्षपर्यन्त कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है।
जनवरी-फरवरी में वसंत पंचमी, मार्च में होली, अप्रैल में नवरात्र, जुलाई अगस्त में शिव पूजन, सितंबर में ऋषि पंचमी, हरतालिका तीज, अक्तूबर में शारदीय नवरात्र, करवाचैथ, दशहरा, नवम्बर में दीपावली तथा दिसम्बर में बड़ा दिन तथा नववर्ष भी आधुनिक समय में एक पर्व के रूप में ही मनाया जाने लगा है। पर्वों को मनाने के कई कारण हैं जिनमें से एक मुख्य कारण यह भी है कि इन विभिन्न पर्व एवं त्योहारों के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्परा की अविरल धारा निर्बाध गति से सदैव प्रवाहित होती रहे। हिन्दुओं के मुख्य पर्व- होली, दीपावली, रक्षा बंधन, दशहरा, करवा चौथ नवरात्र इत्यादि सभी किसी न किसी धार्मिक मान्यता से जुड़े हैं। 
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मित्रों!
रविवार की चर्चा में 
अब मेरी पसन्द के कुछ लिंक देखिए।
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आज से लगभग दस वर्ष पूर्व मेरे पति की पोस्टिंग जयपुर कमांड हॉउस में थी। हम सरकारी क्वाटर में रहते थे। उस वक़्त मेरी गुड़िया की उम्र यही कुछ दो वर्ष थी। शर्मीले स्वभाव की वजह से यह अक्सर मेरे साथ ही खेलती रहती या बालकनी में रहती। मेरा भी तकरीबन समय इसके साथ बालकनी में ही बीतता......
उनके बहुत ही प्यारे-प्यारे दो जुड़वा बच्चे थे।उनकी उम्र यही कुछ सात-आठ महीने ही रही होगी। ज़्यादातर वे बालकनी में ही खेलते रहते। वे हमें देखते रहते और हम उन्हें यह सिलसिला काफ़ी दिनों तक ऐसे ही चलता रहा... 
मैं उन बच्चों को कभी भूला ही नहीं पाई। मन के एक कोने में मीठी-सी याद बन बैठे हैं वे बच्चे। 
अवदत् अनीता पर अनीता सैनी 
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स्वार्थ में डूबे हुए हैं हाशिए
जर्जरित रिश्ते कोई कैसे सिए

मैं नदी बन भी गई तो क्या हुआ
कौन जो सागर बने मेरे लिए  
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इन सफ़ेदपोशों के नाम बंद लिफ़ाफ़े में क्यों ?
इनके आय के समस्त स्त्रोत गुप्त क्यों ?
इस लूट पर अपनी  सरकार है  सुप्त  क्यों ?
ये ऐसा चमत्कारी फ़ॉर्मूला  जनता को नहीं बताते क्यों ?
ये ढोंगीधूर्त जनसेवक चुनाव-सभा में देशभक्ति गीत  बजाते  क्यों ?
हम भी जानना चाहते हैं देश ने इन्हें ऐसा हक़ कब दिया था ?

1955  में  ही  ख्वाजा अहमद अब्बास ने 
 राजकपूर अभिनीत फिल्म में इन्हें "श्री 420" लिख दिया था।  
हिन्दी-आभा*भारत  पर Ravindra Singh Yadav  
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Sahitya Surbhi पर दिलबागसिंह विर्क 
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डॉ बशीर बद्र जी कहते हैं उनकी ग़ज़ल के शेर हैं। अब है टूटा सा दिल खुद से बेज़ार सा , इस हवेली में लगता था बाज़ार  सा। बात क्या है मशहूर लोगों के घर सोग का दिन भी लगता है त्यौहार सा। इस तरह साथ निभाना है मुश्किल , तू भी तलवार सा मैं भी तलवार सा। जो था चारागर अब खुद बीमार है दुश्मन का दुश्मन है अपना यार है कठपुतली है उसकी उसका औज़ार है। या इस पार है या उस पार है अभी क्या खबर कोई मझधार है ये डूबती नैया लगती क्या पार है। कैसा मातम है खास लोगों का जश्न है कि कोई त्यौहार है। शराफ़त न जाने कहां छुप गई किसलिए वो भला शर्मसार है। ये शहर मुहब्बत का नहीं है यहां मुहब्बत भी शराफ़त भी ईबादत भी सियासत भी बिकती है इस शहर का मिजाज़ यही है। ग़ज़ल सुनते हैं इक जगजीत सिंह जी की आवाज़ में। 
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खोदते रहे सुरंगे  
निचोड़ते रहे धरती की तलहटी  
उन्हें जिंदगी अब बड़ी खोखली सी लगती है ... 
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Rahul Kaushal  
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लक्ष्य बाहरी लगते धूमिल 
यही जागने की बेला है,
चौराहे पर बाट जोहती 
मृत्यु, शेष रही नहीं मंजिल !
अब तो द्वार खुले अनंत का 
मन में गूँजे बंसी की धुन, 
चाहों के जंगल अर्घट हों 
रस्ता दें झरनों को पाहन !
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परमात्मा को हम अनुभव कर सकते हैं, उसे पा नहीं सकते वह कभी भी वस्तु बनकर हमें नहीं मिल सकता, वैसे ही यह जगत कभी पकड़ में नहीं आता. न वस्तु शाश्वत है, न पकड़ने वाला ही. यह उस बाजार की तरह है जिसमें से हमें इसकी शोभा देखते हुए गुजर भर जाना है. 
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क्यूँ अकेले खड़े निहार रहे  मौन व्रत धारण किये  मूक मुख मंडल पर मुखर होने को  बेकल शब्दों को पहरा मिला... 
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दो वक़्त की
चिंता
से आगे नज़र जाती नहीं, न जाने
किस अंधी सुई में रेशमी धागा
पिरोना चाहते हैं लोग, न
जाने किन क्षितिजों
को छूना चाहते
हैं लोग। 
Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल 
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*परावर्तन*  
*सुषमा मुनीन्द्र* अभिप्राय पर Rahul Dev  
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उसकी आँखों का कोमल नेत्र बीच से और पतला और या अधिक मोटा होने कनकेव और कॉन्वेक्स होने की क्षमता नहीं रखता है,तब जब वह अपने पास की दो फ़ीट या और भी कम दूरी की वस्तु ,देखता हैं ठीक आँखों के आगे। मोबाइल स्क्रीन जैसी चीज़ पर नज़रें गड़ाते हुए -हमारा आइलेंस ज्यादा कॉन्वेक्स हो जाता है केंद्र से फूले हुए फुल्के सा जब दूर की चीज़ों को निहारते हैं तब पतला (कनकेव )हो जाता है केंद्र से।इसे ही सभी दूरियों को समाहित करने आँख के परदे पर वस्तु को प्रतिबिम्ब रूप ले आना या पावर ऑफ़ अकोमो -डेशन कहते हैं...
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"जब पतवार थामना हो ,  
नौका के पाल पर  
नजर गड़ाये रखनी चाहिए।" 
विभा रानी श्रीवास्तव 
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silhouette of trees near mountain during sunset
अपने अन्दर उतरोगे,
तो तुम्हें वह सब मिलेगा,
जो तुम हमेशा सोचते थे 
कि तुम्हारे अन्दर नहीं,
कहीं बाहर है. 
कविताएँ पर Onkar  
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आपका ब्लॉग
1
रिश्तों की तिजारत में 
ढूँढ रहे हो क्या
नौ फ़स्ल-ए-रवायत में  ?
2
क्या वस्ल की रातें थीं
और न था कोई 
हम तुम थे,बातें थीं... 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक 
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कँगना हो या हो रिया, या स्वर्गीय सुशान्त।
न्यायालय के न्याय पर, थोपो मत सिद्धान्त।।
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अपने मन के सब यहाँ, बजा रहे हैं ढोल।
बिगड़ गये हैं इसलिए, दो पक्षों के बोल।।
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अच्छा होता है नहीं, आपस में टकराव।
आपस की तकरार में, पीता दूध बिलाव।।
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आज के लिए बस इतना ही...!
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18 comments:

  1. जन्मदिन की हार्दिक बधाई के संग पुत्र को असीम शुभकामनाएं
    हमारा सौभाग्य है कि आपको हमारा लेखन पसंद आया... यहाँ प्रस्तुत करने के लिए आभार आपका
    उम्दा प्रस्तुतीकरण

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  2. जन्मदिन की असीम शुभकामनाएं!!!

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  3. बहुत ही सुंदर सराहनीय भूमिका आदरणीय सर साथ ही बेहतरीन प्रस्तुति। मेरे संस्मरण को स्थान देने हेतु सादर आभार। ज्येष्ठ भाई को जन्मदिवस हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामननएँ।
    सादर प्रणाम

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  4. सुन्दर संकलन. मेरी कविता शामिल करने के लिए आभार.

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  5. सुन्दर संकलन |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद सर |

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  6. जन्मदिन की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं । भगवान से प्रार्थना है कि वह आपको उतम स्वास्थ्य, दीर्घ आयु तथा सुख समृद्धि प्रदान करें|

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  7. प्रिय नितिन को जन्मदिन की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐🌺💐💐

    बहुत अच्छी चर्चा... आदरणीय शास्त्री जी,
    मेरी पोस्ट को स्थान देने हेतु हार्दिक आभार🙏

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  8. हिंदी भाषी क्षेत्र को भी हिंदी दिवस मनाना पड़ता है। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी ,जो हमारे साँसों की धौंकनी है ,हमारा सहज रुदन और आवेश है उसे एक दिवस पखवाड़े की सीमा में आबद्ध करने की नाकाम कोशिश करते हैं हम लोग। kabirakhadabazarmein.blogspot.com 

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  9. हिंदी करती आ रही खुद अपना श्रृंगार ,हम क्या खाकर देंगे ,उसको कुछ अधिकार। बेहतरीन उदगार शास्त्री जी के लयात्मक अर्थगर्भित प्रासंगिक लेखन के पुरोधा  रहे हैं शास्त्री जी। kabirakhadabazarmein.blogspot.com

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  10. एक तीर से हो रहे, बिना लक्ष्य के वार।लड़ती हैं नेपथ्य में, दोनों ही सरकार।।इन पंक्तियों में महाराष्ट्र का पूरा राजनीतिक परिदृश्य बयाँ हो गया है कल कंगना निश्चय ही राजनीति में होंगी उन्हें ये अवसर भरपूर दिया जाएगा देखते हैं उनके अंदर का एक कलाकार जीतता है यह राजनीति सुंदर रचना शास्त्री जी की 
    kabirakhadabazarmein.blogspot.com

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  11. हिंदी भाषी क्षेत्र को भी हिंदी दिवस मनाना पड़ता है। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी ,जो हमारे साँसों की धौंकनी है ,हमारा सहज रुदन और आवेश है उसे एक दिवस पखवाड़े की सीमा में आबद्ध करने की नाकाम कोशिश करते हैं हम लोग। बहुत ही सुखद पोस्ट :एक जगह इतना भंडार  मिला है हिंदी को ,बिन बादल  वर्षा का प्यारा मिला है हिंदी को ।  
    kabirakhadabazarmein.blogspot.com 

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  12. सु -प्रिय नितिन को जन्मदिन की  हार्दिक बधाई एवं  शुभकामनाएं 💐💐🌺💐💐

    बेहद नायाब सेतु लिए आई है -  चर्चा... आदरणीय शास्त्री जी  की  कलम से निकलकर 
    मेरी पोस्ट को स्थान देने हेतु हार्दिक आभार🙏
    kabirakhadabazarmein.blogspot.com 

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  13. सार्थक भूमिका के साथ पठनीय लिंक्स का चयन, मेरी रचना को शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार !

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  14. आदरणीय डॉ साहब आपका आशीर्वाद सर माथे , सभी मानद सदस्य,सूत्रधार व पाठकगण को प्रणाम !

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  15. बहुत सुंदर प्रस्तुति।

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  16. पुत्र जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई 💐 💐आदरणीय! बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति । सादर.

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  17. विविधताओं से परिपूर्ण संकलन व प्रस्तुति, आपका आभार - - नमन सह।

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  18. बेहतरीन प्रस्तुति सर, पुत्र को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई

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"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

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