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Saturday, September 19, 2020

'अच्छा आदमी' (चर्चा अंक-3829)

शीर्षक पंक्ति : आदरणीय ओंकार सिंह विवेक जी --सादर अभिवादन। शनिवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। --आजकल व्यक्ति-व्यक्ति के रिश्ते प्रेम और स्वार्थ पर टिक गए हैं। जहाँ निस्वार्थ भाव से जुड़े रिश्ते हैं वहाँ प्रेम पनपता है और जहाँ किसी प्रकार का लाभ या गूढ़ हित जुड़ा होता है वहाँ रिश्ते स्वार्थ पर आधारित होते हैं। 
आजकल काम का आदमी, अच्छा आदमी, बुरा आदमी, स्वार्थी आदमी, साधु आदमी की चर्चा ख़ूब होती हैं। एक सामान्य-सी धारणा विकसित हो गई है कि जो व्यक्ति आपके अनुसार व्यवहार करे, आपके विचार और समूह का समर्थक हो, अपने हित-लाभ को परे रख आपके लिए समर्पित रहे तो उसे अच्छा आदमी कहना कितना उचित है?
या उसे अच्छा आदमी कहना ही उचित है। 
-अनीता सैनी  
आइए पढ़ते है आज की रचनाएँ ---गीत "खेतों में झुकी हैं डालियाँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

थम गई बरसात,
अब मौसम सुहाना आ गया,
षटपदों को रूप,
उपवन का सलोना भा गया,
हो गयी हैं अब नगर की
साफ-सुथरी नालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।
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    अच्छे आदमी की जब हम बात करते हैं तो स्वाभाविक रूप से सोचने पर यही माना जाता है कि जो व्यक्ति वास्तव में अच्छा है उसे ही सब लोग अच्छा आदमी कहेंगे। परंतु सच में ऐसा नहीं होता।आज  हम कई दृष्टि से इसकी पड़ताल करेंगे। समाज में अच्छे आदमी की कोई सार्वभौमिक परिभाषा नज़र नहीं आती।अच्छे आदमी को लेकर आज समाज में हर व्यक्ति ने अपने अलग मानदंड और मानक निर्धारित कर रखे हैं।
    --
कितनी नक़ल करेंगे, कितना उधार लेंगे,
सूरत बिगाड़ माँ की, जीवन सुधार लेंगे.
पश्चिम की बोलियों का, दामन वो थाम लेंगे,
हिंदी दिवस पे ही बस, हिंदी का नाम लेंगे.
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जब त्योहारों का हुल्लड़  डी जे के शोर में बदल जाता है

जब  घर के पकवानों की जगह पिज़्ज़ा में स्टेटस नजर आता है

जब माँ की लोरी का एहसास आइपॉड के म्यूज़िक में बदल जाता है

जब काग़ज़ की नाव ,सांप सीढ़ी का खेल गूगल प्ले में बदल जाता है

जब दीवाली के पटाखों और होली के रंगों में प्रदूषण नज़र आता है

जब जलती फुलझड़ियों और अनारों में पैसा जलता दिखने लगता है 

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बुंदेली व्यंग्य | अंगना में ठाड़े बड्डे | डॉ. वर्षा सिंह

 ‘‘हओ, सो तुम काए चीनहो हमाए लाने। काय से के तुम तो घरई में पिड़े रैत हो। चलो, हमाई बता देत हैं के हम को आएं। तो सुनो, हम कोरोना आएं। औ हमें उन औरन खों सम्मान करने है जो बिना मास्क लगाए, बिना डिस्टेंसिंग बनाए बजार-हाट में नांए-मांए घूमत रैत हैं। कोनऊ की नईं सुनत हैं। बे हमाए से मिलबे खों उधारे से फिरत हैं। सो हमें भी लग रओ है के हमें अपने ऐसे भक्तन खों सम्मान कारो चइए। काय, ठीक सोची ने हमने?’’

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तू जो मुझे ज़ी लेती थोड़ा,तो मर जाती...

ख़ून के से खूट पी ता रहा उम्र भर,
तू जो मुझे ज़ी लेती थोड़ा,तो मर जाती,

बादल,पँछी,फूल,फ़िज़ाये और मुस्कान तेरी,
बहार मेरे गाँव ना आती तो किधर जाती,

भूख़ से बिलखते रहे बच्चे रात भर,
दो दाने मिल जाते तो मज़बूरी घर जाती
--

उभर आती हैं अनगिनत छवियाँ 

मानस पटल पर 

तुम्हारा स्मरण होते ही, 

गोरी, चुलबुली, नटखट स्वस्थ बालिका 

जो हरेक को मोह लेती थीं !

पिता की आसन्न मृत्यु पर 

माँ को ढाँढस बंधातीं  किशोरी, 

नए देश और परिवेश में 

अपने बलबूते पर  शिक्षा ग्रहण करती !

--

मेरी बहन

     
    थीं तुम गुमसुम गुड़िया जेसी
    शांत सोम्य मुखमंडल तुम्हारा 
    मन मोहक मुस्कान तुम्हारी
    सब से प्यार करनेवाली 
    सब से प्यारी सबकी दुलारी
    बचपन से ही थीं ऐसी
अब भी कुछ परिवर्तन नहीं हुआ 
कम बोलना कायदे से बोलना
है  बड़ा गुण तुममें
हर कोई नहीं हो सकता तुम जैसा
    आँखों का मरुस्थल सभी
    मुंतज़िर हैं कहीं से
    मेघमास लौट
    आएं।
    मुझे कुछ भी नहीं चाहिए उन
    से, कुछ मुस्कुराहटों के
    झुरमुट, अहाते से
    झांकते पहली
    किरण के
    शिशु,
    कदम जब रुकने लगे 
    तो मन की बस आवाज सुन
    गर तुझे बनाया विधाता न
    श्रेष्ठ कृति संसार में तो
    कुछ सृजन करने होंगें 
    तुझ को विश्व उत्थान में
    बन अभियंता करने होंगें नव निर्माण
    निज दायित्व को पहचान तू
      यूँ तो आम हो या लीची उसकी स्वयं की स्वादेन्द्रिय इनके लिए अब कभी नहीं तरसती-तड़पती है । उसे तो यह भी नहीं पता कि पर्व-उत्सव के दिन कब निकल जाते हैं। वह पेट की आग बुझाने के लिऐ जैसे-तैसे कुछ भी बना-खा लेता है। जिह्वा पर नियंत्रण पाने में परिस्थितियों ने उसकी भरपूर मदद की है। थाली में पड़ीं कच्ची-पक्की रोटियाँ और उबली सब्जी उसके लिए पकवान समान हैं । जीवन की धूप-छाँव से दीपेंदु नहीं घबड़ाता, क्योंकि वह समझ चुका है कि जीवन की महत्ता वेदनाओं और पीड़ाओं को हँसते-हँसते सह लेने में है।
    आज का सफ़र यहीं तक 
    फिर मिलेंगे 
    कल के अंक में 
    --
    @अनीता सैनी  

13 comments:

  1. जो दूसरों के लिए समर्पित होते हैं, भद्रजनों के इस समाज में उन्हें मूर्ख समझा जाता है।
    हम जिनके लिए अपना जीवन दांव पर लगाते हैं, वे इसे हमारी कमजोरी समझ लेते हैं।

    ख़ैर, विचारणीय भूमिका एवं भावपूर्ण प्रस्तुति।

    मेरी रचना ' दुःख! तुम लौट आओ' को मंच पर स्थान देने के लिए आपका हृदय से आभार आदरणीया अनीता सैनी जी।

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  2. बहुत सुन्दर सराहनीय प्रस्तुति । सभी लिंक्स अत्यंत सुन्दर ।

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  3. भावपूर्ण एवं सहज प्रस्तुति
    आभार अनीता जी
    सादर नमन

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  4. हार्दिक आभार मेरी रचना सम्मिलित करने हेतु - - सुन्दर संकलन व प्रस्तुति - - नमन सह।

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  5. जब घर के पकवानों की जगह पिज़्ज़ा में स्टेटस नजर आता है

    बेहतरीन रचनाओ का संकलन।
    बधाई हो अनीताजी
    आभार।

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  6. उम्दा अंक आज का |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद अनीता जी |

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  7. अच्छी चर्चा रही।आभार आदरणीया

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  8. सम्मिलित कर सम्मान देने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

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  9. सार्थक भूमिका और पठनीय रचनाओं का चयन, बहुत बहुत आभार मुझे भी शामिल करने हेतु !

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  10. सुंदर, सराहनीय प्रस्तुति अनीता जी,सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं

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  11. अनीता जी, आपने बहुत अच्छा समसामयिक प्रश्न उठाया है। वास्तव में यह विचारणीय है। दूसरों के लिए समर्पित व्यक्तियों को मूर्ख समझा जाता है। उनकी सज्जनता पर प्रश्नचिंह लगाया जाता है।
    हम साहित्यकारों का यह दायित्व है कि हम सभी अपने साहित्य सृजन से इन स्थितियों में बदलाव लाने का प्रयास करें।
    बहुत अच्छी लिंक्स....
    मेरी पोस्ट को शामिल करने हेतु हार्दिक आभार 🙏

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  12. सार्थक भूमिका के साथ लाजवाब चर्चा प्रस्तुति सभी लिंक बेहद उम्दा...सभी रचनाकार ोोंं को बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  13. आदरणीया अत्यधिक आभार चर्चा हेतु

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