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Wednesday, June 01, 2022

"जीवन जीने की कला" (चर्चा अंक-4448)

बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

देखिए कुछ अद्यतन लिंक।

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जीवन जीने की कला 

माना तुम हो हसीन किसी से कम नहीं

पर यह खूबसूरती जाने कब बीत जाएगी

यह भी तो पता नहीं |

 तुम सोचती ही रह जाओगी  

जब दर्पण में अपना बदला हुआ रूप देखोगी 

Akanksha -asha.blog spot.com 

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मिट्टी की गागरी 

भरी गागरी बड़ी जतन से 
मिट्टी वाली ।
ठूँस ठूँस कर भरी गई 
फिर भी है खाली ॥

जिज्ञासा की जिज्ञासा 

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नीति के दोहे मुक्तक 

त्यागना

विद्याहीन गुरू त्याग, बंधु त्याग बिनु प्रीति।

देश काल भी त्यागिए, जँह कोई नहि नीति ।।1।।

जुड़वाँ भ्राता

जुड़वाँ भ्राता भले ही, गुण में नहीं समान ।

जैसे  कांटा  अरु बेर, गुण में हैं आसमान ।।2।।

लक्ष्मी

न दंपति में लड़ाई हो , न मूर्ख पूजा जाय।

घर में कुछ संचय होय, लक्ष्मी दौड़ी आय।।3।।

-अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

काव्य दर्पण 

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पहचान और अनुभव 

 मैं पहचान हूँ,

पहचान हूँ तुम्हारी,

तुम्हारे संस्कारों की,

तुम्हारी सभ्यता की |

तुम्हारे पहनावे की,

तुम्हारी भाषा की |

तुम्हारे विश्वास की,

तुम्हारी आस्था की |

मेरी आवाज़ सीमा सचदेव

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ये आम रास्ता नहीं- रजनी गुप्त अब यहाँ सवाल यह उठता है कि मृदु उस घर में उस लड़की से मिलने आई थी जिसका बलात्कार हुआ था। ऐसे में किसी और के घर में पहली बार जाने के बाद बाहर से आने वाला व्यक्ति कैसे..किसी की रसोई में घुस कर पानी और चाय लेकर आ सकता है? वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस 152 पृष्ठीय उपन्यास के पेपरबैक संस्करण का मूल्य 150/- रुपए है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

 

हँसते रहो 

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स्वाद श्रेष्ठता का दम्भ  

मुझे इडली खाते देखते मजदूर विस्मित थे| उनके लिए कढ़ी कचौड़ी, आलू सब्ज़ी कचौड़ी, चटनी कचौड़ी आदि तो समझने वाली बात थी| यह कचौड़ी जैसी सफ़ेद चीज जिसमें कुछ भी भरा हुआ न था, सब्ज़ी मिली दाल के साथ खाना एक स्वादेन्द्रिक परिभ्रमण था| उन्हें संतोष होता कि भरवां इडली का परिचय चावल के आटे की कचौड़ी कहकर दिया जाता, पर भरवां भी तो नहीं थी| उस समय तक तो मैं खुद भरवां इडली, मसाला इडली, तली इडली और भुनी इडली जैसे पाककला पराक्रमों से अनिभिज्ञ था| खैर उस दिन, सभी का स्थिर निश्चिय था कि यह इडली नामक पदार्थ केवल कभी कभार खाया जा सकता है और इस से रोज पेट भरना असंभव है|  

हराना | विचार वेदना की गहराई 

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फ़िक्र" करने वालों को तो "आपको" ही पहचानना होगा 

"तारीफ़" करने वाले बेशक़ 

"आपको" पहचानते होंगे,
मगर "फ़िक्र" करने वालों को तो 
"आपको" ही पहचानना होगा।

AAJ KA AGRA 

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काफिया – रदीफ। 

 

जिसे रदीफ से पहले ही,

प्रयोग में लाया जाता।
जाने के लिए तैयार जो,
गजल के संदर्भ में शब्द,
इसको पाया जाता है।

KMSRAJ51-Always Positive Thinker 

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आनंद रूप शंकर 

गौरी समीप बैठे लगते बड़े निराले।
डाले गले विषैले फणिधर भुजंग काले।

काया भभूति लिपटी नंदी पिशाच संगी।
चोला बड़ा अजूबा सिर से जटा निकाले॥ 

सैलाब शब्दों का 

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अम्मा बाबू जी को समर्पित एक गीत 

ईश्वर से कुछ ना मांगें हम 

सब कुछ तुमसे पाया है 

राम सिया से मात पिता की

हम बच्चों पर छाया है  

palash "पलाश" 

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हिन्दी मात्रा प्रयोग 

बिन मात्रा के अजगर, अदरक, कटहल, शलजम, कलम।
हलचल, बरतन, खटपट, सरपट, टमटम, जलम।।1।।
आ से आम, आग में भूना, खट्टा मीठा स्वाद।
खाना-दाना पेड़ दे रहा, खुद खाता है खाद।।2।।
किरन किशन से झगड़ा करती, बिना बात की बात।
इमली तो इठलाती फिरती, इतराती इफरात।।3।।

मेरी दुनिया विमल कुमार शुक्ल

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पाठक के रूप में- छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह गुरतुर मया पर गुरतुर मया- छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह रचनाकार-रमेश कुमार सोनी प्रकाशक - श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली-११००१८ मूल्य- २५०/- किसी राज्यविशेष की भाषा में संग्रह पढ़ना, समझना और लिखना थोड़ा कठिन है। अपनी तरफ से कोशिश कर रही हूँ कि वही हाइकु लूँ जो समझ पा रही हूँ। त्रुटि की पूरी संभावना है, सोनी सर सही अर्थ बताएँ और मार्गदर्शन करें। यह पुस्तक मुझे श्वेतांशु प्रकाशन की ओर से मेरी पुस्तकों के साथ उपहार स्वरूप भेजी गई है। इसके लिए मैं प्रकाशन का आभार प्रकट करती हूँ। 

मधुर गुँजन 

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समीक्षा के बहाने 

साथियो कविता/शायरी तो हम करते ही रहते हैं लेकिन
कभी-कभी विषयगत सार्थक चर्चा भी होनी चाहिए।इसी
विचार को केंद्र में रखकर आज मैं अपनी कोई ग़ज़ल पोस्ट
न करते हुए एक बड़े साहित्यकार स्मृतिशेष पंडित कृष्णानंदचौबे जी की एक ग़ज़ल उनके शिष्य आदरणीय अंसारक़म्बरी जी की की वाल से लेकर 
साभार लेकर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
सागरों से जब से यारी हो गई,
ये नदी मीठी थी खारी हो गई।

आदमी हलका हुआ है इन दिनों,
ज़िन्दगी कुछ और भारी हो गई। 

मेरा सृजन 

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मेड फॉर ईच अदर 

India Art Fair 2022, Delhi में देखी गई  कलाकार `सोमा दास ‘ की क्रम से लगी ये पाँच पेंटिंग्स  `Made For Each Other ’ मेरे दिल में बस गई है ….ध्यान से देखिए तो इस पेंटिंग में छिपी एक कविता भी नजर आती है मुझे —

तुम चाहते हो न धरा सी

घूमती रहूँ तुम्हारे इर्द-गिर्द

काजल सा आँज लूँ

पलकों की चिलमन में

और खुशबू सा बसा लूँ

साँसों की लय में …! 

ताना बाना 

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मेरा भी जी तितलियों पर मचल जाए तो क्या कहिए 

कोई छूने से आबे हैवाँ जल जाए तो क्या कहिए
किसी की आरज़ू में दम निकल जाए तो क्या कहिए

निगाहे लुत्फ़ उसका है मेरी जानिब, हूँ किस्मतवर
पर इस पल ही मेरी किस्मत बदल जाए तो क्या कहिए 

अंदाज़े ग़ाफ़िल 

--

सीपिकाएँ "नेट के सम्बन्ध" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) 

(१)

नेट के सम्बन्ध

एक क्लिक में शुरू

दूसरी में बन्द

उच्चारण 

--

आज के लिए बस इतना ही...!

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8 comments:

  1. सुप्रभात !
    विविध रचनाओं से सजी सुंदर चर्चा प्रस्तुति।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका हार्दिक आभार और अभिनंदन आदरणीय शास्त्री जी । आपके श्रमसाध्य कार्य को नमन और वंदन

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  2. सभी संकलन उम्दा।

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  3. बहुत सुंदर संकलन। मेरी रचना को मंच पर स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय।

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  4. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  5. वाह लाजबाव प्रस्तुति

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  6. बहुत सुन्दर , सार्थक और विविधता-पूर्ण चर्चा प्रस्तुति।मेरी रचना को भी शामिल करने के लिए हृदय से आभार 😊🙏

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  7. Bahut hi acchi Aaj Ke Chacha Manch ki post Aur meri post ko Shamil karne ke liye बहुत-बहुत dhanyvad aadarniy Shastri ji

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