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Sunday, April 19, 2015

"अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है" (चर्चा - 1950)

मित्रों।
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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"नीम की छाँव नहीं रही" 

जाने कहाँ खो गया अपनाआज पुराना गाँव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।

घर-घर में हैं टैलीवीजिनसूनी है चौपाल,
छाछ-दूध-नवनीत न भाताचाय पियें गोपाल,
भूल गये नाविक के बच्चे, आज चलानी नाव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।... 
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स्‍लेट जब रिक्‍त हो जाए 

तब अपनापन ही 

रिक्‍तता को भरता है 

हमारे पास अधिकार के कुछ नम्‍बर होते हैं, रात 2 बजे भी उन्‍हीं नम्‍बरों पर हम डायल करके उनकी बाँहों को आमन्त्रित कर लेते हैं। वे भी तुरन्‍त ही बिना विलम्‍ब किए आ जाते हैं और आश्‍वस्‍त कर देते हैं कि हम अकेले नहीं है... 
smt. Ajit Gupta 
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स्वतः सवेरा खिल आता है...! 

व्यक्त होते होते 
कितना कुछ है जो रह जाता है, 
अनकहा कितना कुछ अनायास ही 
आँखों से बह जाता है... 
हर सुबह उग आता है 
सम्पूर्ण लालिमा के साथ इठलाता सूरज, 
रात्रि संग उसका 
सदियों पुराना दूर का कोई नाता है... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक 
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दौड़े बहुत हो 

आँतक-वाद की रोकथाम कैसे हो ..... 
बदले के बदले चलते रहेंगे 
खुदा बन के खुद को छलते रहेंगे... 
गीत-ग़ज़ल पर शारदा अरोरा 
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शिव से 

शिव, 
वह गंगा, 
जो कभी तुम्हारी जटाओं से निकली थी, 
अब मैली हो गई है, बल्कि हमने कर दी है, 
अब चाहकर भी हमसे साफ़ नहीं हो रही, 
बरसों की कोशिश का परिणाम 
कुछ भी नहीं निकल रहा, 
शायद हमारी इच्छा-शक्ति 
या 
सामर्थ्य में कोई कमी है... 
कविताएँ पर Onkar 
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कश्मीर की समस्या 

कश्मीर में इन दिनों जो हो रहा है उसे देखकर संदेह होता है कि हमारा देश वास्तव में एक सम्प्रभु राष्ट्र है अथवा टुकड़ों में बाटे भू- भागके अतिरिक्त और कुछ नहीं जहाँ सियासत के नाम पर देश तक की सौदेबाज़ी होती है... 
वंदे मातरम् पर abhishek shukla 
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भगवान् परशुराम को समर्पित 

कुछ छंद 

स्वाभिमान सर्वथा प्रतीक बन जाता यहॉं ,  
न्याय पक्ष के प्रत्यक्ष पूर्ण परिणाम हैं । 
मातृ शीष काट के प्रमाण जग को है दिया ,  
सिद्ग साधना के प्रति प्रभु निष्काम हैं... 
Naveen Mani Tripathi 
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गेहूँ 

हम शहरियों के लिए कितना कठिन है धोना सुखाना चक्की से पिसा कर घर ले आना आंटा! उनकी नियति है जोतना बोना उगाना पकने की प्रतीक्षा करना काटना दंवाई करना खाने के लिए रखकर बाजार तक ले जाना गेहूँ!!! हमारे पास विकल्प है हम बाज़ार से सीधे खरीद सकते हैं आंटा उनके पास कोई विकल्प नहीं उन्हें उगाना ही है गेहूँ हम खुश हैं उनकी मजबूरी के तले हमारे सभी विकल्प सुरक्षित हैं 
बेचैन आत्मा पर देवेन्द्र पाण्डेय 
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घड़ियाली आँसू 
( कविता ) 

शिक्षक से छीनकर
शिक्षण कार्य
भला चाहा जा रहा है
शिक्षा का
और शिक्षा के पतन पर
घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं ... 
साहित्य सुरभि
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अपसंस्कृति फैलाते टी वी धारावाहिक 

और 

रियलिटी शोज़ 

Sudhinamaपरsadhana vaid 
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गुलाम हर किसी को समझें हैं मर्द सारे 

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! कौशल ! पर Shalini Kaushik 
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*मुक्त-मुक्तक : 701 

तुझमें ख़राबी है ॥ 

*फ़क़त इक ही 
मगर  
सबसे बड़ी तुझमें ख़राबी है ॥ 
ज़रा रुक ! सुन ! 
तुझे रहती हमेशा क्यों शिताबी है... 
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ऐसा तभी हो सकता है 

खामोश अक्स का उन्हें मालूम न हो
सुबह-सांझ कोई शिकायत न हो
कोई न संवाद न ही कोई कारण हो
ऐसा तभी हो सकता है
जब उन्हें मेरे प्रेम का मालूम न हो... 
प्रभात 
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12 comments:

  1. सुप्रभात
    विविधता लिए लिंक्स से सजा आज का चर्चामंच
    मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद सर |

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  2. बहुत सुन्दर सार्थक सूत्रों से सुसज्जित मंच ! मेरे विचारों को भी स्थान मिला आपका आभार शास्त्री जी !

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  3. बहुत सुंदर रविवारीय अंक । आज की चर्चा में 'उलूक' उवाच 'आइना कभी नहीं देखने वाला
    दिखाने के लिये रख गया' को भी जगह देने के लिये आभार ।

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  4. बेहतरीन लिंक्स
    रविवार की मेरी आवारगी सफल साधना तक पहुँच गयी
    निवेदित शुभकामनायें !!!

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  5. बढ़िया चर्चा. मेरी रचना को जगह दी. आभार

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  6. सुन्दर चर्चा।
    नीव की छांव बहुत पसंद आई।
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए ह्रदय से आभार।

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  7. खूबसुरत चर्चा

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  8. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..

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  9. कुछ प्रस्तुतियाँ बहुत बहुत ही शानदार लगीं
    सभी अच्छी प्रविष्टियों को पढ़ने के लिए एक ही मंच
    मेरा सौभाग्य आपका आभार

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  10. धन्यवाद !मयंक जी ! मेरी रचना ''*मुक्त-मुक्तक : 701 तुझमें ख़राबी है ॥ '' को शामिल करने का ।

    ReplyDelete
  11. धन्यवाद !मयंक जी ! मेरी रचना ''*मुक्त-मुक्तक : 701 तुझमें ख़राबी है ॥ '' को शामिल करने का ।

    ReplyDelete

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