Followers

Friday, April 24, 2015

"आँखों की भाषा" (चर्चा अंक-1955)

नमस्कार मित्रों, आशा है ईश्वर की कृपा से आप सभी सकुशल होंगे। 
अपरिहार्य कार्य से दो महीने से चर्चा मंच से दूर रहा, 
परन्तु आप सभी की यादें हमेशा साथ रही।
आँखों की भाषा की महता और उपयोगिता उस समय बहुत बढ़ जाती है जब बोलने की स्थिति न हो, जरूरत न हो और इच्छा न हो।  ऐसे हालात में वाणी का काम आँखें किया करती है इसलिए आँखों पर विवेक का नियंत्रण रखना जरुरी हो जाता है।  आँखें मन का भेद खोल देती है इसलिए किसी को देखते समय इस बात को ख्याल रखना होगा की आँखें किस भाव की अभिव्यक्ति कर रही है। नारी वर्ग के मामले में आँखों की भाषा की महता और उपयोगिता पुरुष वर्ग की अपेक्षा ज्यादा ही है जो आचार-संहिता से जुडी हुई है। यह नारी की स्वभाविक विशेषता है की किसी की आँखों की भाषा समझने में उसे कठिनाई नही होती। हम इस भरम  में न रहें की यदि मुख से कुछ नही बोलें तो उनके मन की भावना प्रकट नही हुई।  जैसे मधुर, शिष्ट, हितकर और मर्यादित वाणी बोलना सभ्य आचरण का प्रतीक होता है उसी प्रकार आँखों की भाषा भी इसी के अनुकूल होना चाहिए। 
================================
स्वप्न मञ्जूषा
सुनो !
अभी रुको !
अब मुझे जाना है :(
पर रुको न, थोड़ी देर,
पर मैं जा रही हूँ
पर.…
================================
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सहते हो सन्ताप गुलमोहर!
फिर भी हँसते जाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

अनुपमा पाठक


एक दिन
फुर्सत से
सारे शब्द समेटेंगे...
कविता के आँगन में
विचरेंगे...
================================
मित्रों , आपको सूचित करते हुए प्रसन्नता हो रही है की मेरी कवितायों का संग्रह *“काव्य सौरभ “* छपकर तैयार हो गया है l
अनीता जी 
परमात्मा से मिलन हृदय से ही होता है बुद्धि से नहीं. बुद्धि शब्दों में उलझी रहती है, शास्त्रों में उलझी रहती है, हृदय तो आतुर होता है. बुद्धि आत्मरक्षा का उपाय खोजती है, हृदय समर्पण है.
प्रवीण चोपड़ा 
कल शाम को मैं इस ब्लॉग की १०००वीं पोस्ट लिखने लगा तो अचानक ध्यान आया कि इसे पेन से लिखते हैं...जैसे ही लिखने लगा बेटे ने कैमरा उठा लिया और वीडियो बना दी...
अर्चना चावजी
आज सुनिए आराधना "मुक्ति" के ब्लॉग ईचक दाना बीचक दाना से उनकी लिखी एक कहानी शर्त सुनकर बताईयेगा कैसी लगी ... कहानि को कहानी की तरह सुनाने का पहला प्रयास है ये मेरा ....
आकांक्षा यादव
राजस्थान के जोधपुर क्षेत्र में बाल-विवाह काफी प्रचलित हैं। यद्यपि इसे रोकने हेतु तमाम सरकारी और गैरसरकारी प्रयास किये जा रहे हैं, पर फिर भी इस क्षेत्र में अभी और कार्य बाकी है।
================================
फ़िरदौस ख़ान
कई साल पहले की बात है... हम रिश्ते के मामा के घर गए हुए थे... हमने अपने मामूज़ाद भाई ज़ुल्फ़िक़ार को ईदी में पांच सौ रुपये दे दिए, उसने बहुत ना-नुकर की...
================================
अभिषेक आर्जव
मैं जानता हूँ 
रह जाऊँगा अकेले किसी रात जैसे 
सबसे अन्त में बचा रह गया 
कोई पानी का छर्रा
छहर छहर हुई बारिश बाद।
================================
मल्होत्रा विम्मी 
मत छिन मुझसे 
जो मेरा ना था,
आँगन में महकता
सवेरा ना था।
================================
परी ऍम. 'श्लोक'
आप सभी पाठक मित्रों को बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आप सभी के स्नेह एवं आशीर्वाद से 'अहसास एक पल' साँझा संकलन में मेरी रचनाएं भी शामिल हो पायी हैं।
================================
अन्तर सोहिल
कुछ भी तो नहीं था
हाँ कुछ भी नहीं था 
तबतक
जबतक तुमने जाते जाते
मेरा हाथ जोर से नहीं पकड़ा था
================================
मदन मोहन सक्सेना 
कल शाम टी बी पर एक घटना देखी
 लाचार मजबूर किसान 
इस उम्मीद के साथ
तप्ति धूप में 
बृक्ष पर खड़ा होकर
अरुण साथी 
जंतर मंतर पे आप पार्टी की रैली में किसान गजेन्द्र जी ने पेड़ से लटक कर आत्महत्या कर ली और आत्महत्या के बाद भी आप नेता केजारीबाल सहित अन्य रैली को संबोधित करते रह गए,
================================
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
पढ़े-लिखे करते नहीं, पुस्तक से सम्वाद।
इसीलिए पुस्तक-दिवस, नहीं किसी को याद।।
--
उपयोगी पुस्तक नहीं, बस्ते का है भार।
बच्चों को कैसे भला, होगा इनसे प्यार।।
================================
अर्पणा खरे 
शाम का समय था 
हल्की हल्की बूँदा बंदी हो रही थी
मौसम उदासीन था 
या यू कह सकते हैं 
मैं ही उदास थी
हर्ष महाजन 
दो पलों की रुक्सती क्यूं ज़ार-ज़ार कर चली,
दिल से मेरे दिल्लगी क्यूँ बार-बार कर चली ।

ये ज़ुल्फ़ फिर अदा से अपनी शानों पर बिखेर कर,
चुरा के नज़रें मुझको शर्म सार यार कर चली ।
================================
रंजना डीन
याद तेरी फिर भटक कर मेरे दरवाज़े खड़ी
शक्ल है मायूस, आँखों में है आंसू की झड़ी 

थाम के बाँहें जो उसकी, मैंने बैठाया उसे 
गोद में सर रख के मेरे वो फफक कर रो पड़ी
================================
धन्यबाद, फिर मिलेंगें 
================================

No comments:

Post a Comment

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

"लाचार हुआ सारा समाज" (चर्चा अंक-2820)

मित्रों! रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...