Followers

Wednesday, January 17, 2018

"श्वेत कुहासा-बादल काले" (चर्चामंच 2851)

है क़शिश कुछ तो इस चश्मे तर में 

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
आजकल हिन्दी साहित्य व काव्य में पद्य-विधा के सनातन रूप गीत के दो अन्य रूप अगीत एवं नवगीत काफी प्रचलन में हैं | --------गद्य-विधा से भिन्नता के रूप में जिस कथ्य में, लय के साथ गति व यति का उचित समन्वय एवं प्रवाह हो वह काव्य है,गीत है| 
------तुकांत छंदों के अतिरिक्त, अन्त्यानुप्रास के अनुसार गीत- तुकांत या अतुकांत होते हैं | अतुकांत गीतों को गद्य-गीत भी कहा गया | गीत तो सनातन व सार्वकालिक है ही अतः आगे कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है| 
--------यहाँ अगीत व नवगीत पर कुछ दृष्टि डालने का प्रयत्न.... 


4 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति रविकर जी।

    ReplyDelete
  3. आदरणीय शास्त्री जी का आभार एवं धन्यवाद 'क्रांतिस्वर' की पोस्ट को इस अंक में स्थान देने हेतु ।

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति ...

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

"सब के सब चुप हैं" (चर्चा अंक-3126)

मित्रों!  मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...