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Friday, January 12, 2018

"कुहरा चारों ओर" (चर्चा अंक-2846)

मित्रों!
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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बेटी का जीवन 

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बेटी का जीवन भी देखो कैसा अद्भुत होता है,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है... .
भारतीय नारी पर Shalini Kaushik  
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यह पथ बंधु है मेरा!... 

आनन्द वर्धन ओझा  
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थमा हुआ प्रवाह 

अनुशील पर अनुपमा पाठक 
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जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है...  

अज्ञेय  

जियो उस प्यार में
जो मैंने तुम्हें दिया है,
उस दु:ख में नहीं जिसे
बेझिझक मैंने पिया है... 
विविधा.....पर  yashoda Agrawal 
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वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन 

ये वैसे तो एक गीत की पंक्ति है ,पर मैं कई दिनों से यही सोच रही थी कि सच में ये सम्भव है भी कि छोड़ना सम्भव है क्या ,चाहे वो मोड़ खूबसूरत हो या विवशता  ..... अफ़साना है क्या  .... क्या उसको सिर्फ एक कहानी मान लिया जाए या फिर कहानी से परे जा कर एक अनुभव या फिर चंद लम्हों की कुछ जीवंत साँसें ... 
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव  
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अनूठा नजदीकी रिश्तेदार 

पूरे एक बरस पहले, 11 जनवरी 2017 को उन्हें देखा था। उस दिन सुबह ग्यारह बजे मेरे दा’ साहब माणक भाई अग्रवाल का दाह संस्कार था। उससे बहुत पहले से लोग आने शुरु हो गए थे... 
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8 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. सुन्दर शुक्रवारीय अंक। आभार आज की चर्चा में 'उलूक' के हिन्दी दिवस सूत्र को शामिल करने के लिये।

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  3. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  4. बहुत बहुत आभार

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  5. आभार सर, चर्चा मंच पर मेरी कविता को आपने स्थान दिया। सुंदर चर्चा।

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  6. सशक्त संग्रह , आभार

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  7. सुंदर और सशक्त संग्रह
    सभी रचनाकरीं को बधाई
    आपको साधुवाद
    सादर

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