Followers

Monday, March 12, 2018

"नव वर्ष चलकर आ रहा" (चर्चा अंक-2907)

सुधि पाठकों!
सोमवार की चर्चा में 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
--
--
--
--
--
--
--

अपनी रोटी से ही तृप्ति 

कभी मन हुआ करता था कि दुनिया की हर बात जाने लेकिन आज कुछ और जानने का मन नहीं करता! लगने लगा है कि यह जानना, देखना बहुत हो गया अब तो बहुत कुछ भूलने का मन करता है। तृप्त सी हो गयी मन की चाहत। शायद एक उम्र आने के बाद सभी के साथ ऐसा होता हो और शायद नहीं भी होता हो! दौलत के ढेर पर बैठने के बाद दौलत कमाने की चाहत बन्द होनी ही चाहिये और दुनिया को समझने के बाद और अधिक समझने की चाहत भी बन्द होनी चाहिये... 
smt. Ajit Gupta  
--

समय बतायेगा 

हरी-हरी दूब खो गयी है हरी कालीन बिछी हुयी है 
हरियाली सबको चाहिये पर प्रकृति से ठनी हुयी है... 
अभिनव रचना पर Mamta Tripathi  
--
--
--

गोआ के सागर-तट से... 

मुक्ताकाश....पर आनन्द वर्धन ओझा 
--

नारी 

नारी से ही रीत है, नारी से है प्रीत।  
नारी से है सर्जना, नारी सुन्दर गीत... 
मधुर गुंजन पर ऋता शेखर 'मधु' 

5 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

    ReplyDelete
  2. मनमोहक और सार्थक चर्चा।
    धन्यवाद राधा तिवारी जी।

    ReplyDelete
  3. आपके परिश्रम को नमन।

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

    ReplyDelete
  5. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति, आभार।

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

"गीदड़ और विडाल" (चर्चा अंक-2977)

सुधि पाठकों! सोमवार   की चर्चा में  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। राधा तिवारी (राधे गोपाल)  -- दोहे   "गीदड़ और विडाल...