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Friday, March 16, 2018

"मन्दिर का उन्माद" (चर्चा अंक-2911)

मित्रों! 
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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प्रकाशित लघुकथा 

बाल सुदामाघर 
तूलिकासदन पर सुधाकल्प 
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पञ्चतत्त्व 

यदि पञ्चत्त्वों के भी हमारी तरह जिह्वा और कंठ होता तो वे आकंठ प्रदूषित न हो रहे होते प्रतिकार करते प्रतिकार में कुछ शब्द, वाक्य बोलते। पर वे मौन हैं कुछ बोल नहीं रहे इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि वे हमें नहीं जानते या हमें तोल नहीं रहे। वे जानते हैं हमारा दंभ, गर्व, अभिमान और हमारी औकात इसलिये चुप हैं इसलिये संयत हैं। उनके लिए हमारे द्वारा फैलाया गया प्रदूषण पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु का दूषण क्या है? ... 
Mamta Tripathi 
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जब मिला तू जामे से बाहर मिला 

तूने चाहा था जो वो जी भर मिला  
तू ही कह क्या तू भी मुझको पर मिला... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 

4 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. उम्दा चर्चा। मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद,शास्त्री जी।

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  3. शानदार चर्चा मेरे आलेखों को शामिल करने के लिए आदरणीय आपका आभार

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  4. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति ...

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