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Wednesday, April 28, 2010

“ब्लॉगारा हरकीरत हीर” (चर्चा मंच-135)

"चर्चा मंच" अंक - 135
चर्चाकारः डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक
आइए आज "चर्चा मंच" में 
ब्लॉगारा हरकीरत “हीर” 
के प्रोफाइल पर उपलब्ध परिचय के साथ
उनकी प्रथम और अद्यतन पोस्ट की  
चर्चा करते हैं -

[Untitled-1+copy.jpg]हरकीरत ' हीर'

मेरे बारे में

क्या कहूँ अपने बारे में...? ऐसा कुछ बताने लायक है ही नहीं बस - इक-दर्द था सीने में,जिसे लफ्जों में पिरोती रही दिल में दहकते अंगारे लिए, मैं जिंदगी की सीढि़याँ चढती रही कुछ माजियों की कतरने थीं, कुछ रातों की बेकसी जख्मो के टांके मैं रातों को सीती रही। ('इक-दर्द' से संकलित)

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हरकीरत ' हीर'

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बी एस पाबला निर्मला कपिला नीरज गोस्वामी ਬਲਬਿਂਦਰ manvinder bhimber
यह रही हरकीरत “हीर” की प्रथम पोस्ट-
एक ख़त इमरोज जी के नाम


(२१ सितंबर २००८ मेरे लिए बहुत ही महत्‍वपूर्ण दिन था। 
आज मुझे इमरोज जी का नज्‍म रुप में खत मिला। 
उसी खत का जवाब मैंने उन्‍हें अपनी इस नज्‍म में दिया है...)


इमरोज़ 
यह ख़त,ख़त नहीं है तेरा 
मेरी बरसों की तपस्‍या का फल है 
बरसों पहले इक दिन 
तारों से गर्म राख़ झडी़ थी 
उस दिन 
इक आग अमृता के सीने में लगी 
और इक मेरे 
जलते अक्षरों को 
बरसों सीने से चिपकाये हम 
कोरे का़गच की सतरों को 
शापमुक्‍त करती रहीं... 
शायद 
यह कागज़ के टुकडे़ न होते 
तो दुनियाँ के कितने ही किस्‍से 
हवा में यूँ ही बह जाते 
और औरत 
आँखों में दर्द का कफ़न ओढे़ 
चुपचाप 
अरथियों में सजती रहती... 
इमरोज़ 
यह ख़त, ख़त नहीं है तेरा 
देख मेरी इन आँखों में 
इन आँखों में 
मौत से पहले का वह सकूं है 
जिसे बीस वर्षो से तलाशती मैं 
जिंदगी को 
अपने ही कंधों पर ढोती आई हूँ... 
यह ख़त 
उस पाक रूह से निकले अल्‍फाज़ हैं 
जो महोब्‍बत की खातिर 
बरसों आग में तपी थी 
आज तेरे इन लफ्‍जों के स्‍पर्श से 
मैं रूह सी हल्‍की हो गई हूँ 
देख ,मैंने आसमां की ओर 
बाँहें फैला दी हैं 
मैं उड़ने लगी हूँ 
और वह देख 
मेरी खुशी में 
बादल भी छलक पडे़ हैं 
मैं 
बरसात में भीगी 
कली से फूल बन गई हूँ 
जैसे बीस बरस बाद अमृता 
एक पाक रूह के स्‍पर्श से 
कली से फूल बन गई थी... 
इमरोज़! 
तुमने कहा है- 
''कवि, कलाकार 'हकी़र' नहीं होते, 
तुम तो खुद एक दुनियाँ हो, 
शमां भी हो और रौशनी भी'' 
तुम्‍हारे इन शब्‍दों ने आज मुझे 
अर्थ दे दिया है 
भले ही मैं सारी उम्र 
आसमान पर 
न लिख सकी 
कि जिंदगी सुख भी है 
पर आज धरती के 
एक क़ब्र जितने टुकडे़ पर तो 
लिख ही लूंगी 
कि जिंदगी सुख भी थी 
हाँ इमरोज़! 
लो आज मैं कहती हूँ 
जिंदगी सुख भी थी …
और यह रही इनकी अद्यतन पोस्ट-
३० नंबर की बीड़ी ......
Posted by हरकीरत ' हीर' Friday, April 23, 2010 at 11:11 PM


ज़िन्दगी तेरा ज़िक्र अब ......रात के वजूद पर टिकी सुब्ह का सा है ...जिसे सूरज कहीं रख करभूल गया है ....इंतजार के पन्ने अब सड़ने लगे हैं ....और दीवारे अभी बहुत ऊंची हैं .....बहुत...... 
डालना कुछ और चाहती थी ....इक बड़ी प्यारी सी नज़्म उतरी थी ...पर शब्दों ने मुँह फेर लिया.....सागर की कविता (वही जिसपर हल्का सा विवाद हुआ था ) के एवज में भी कुछ लिखा थावह भी धरा रह गया ......शायद अगली बार ...... 

जाने कब 
मिट्टी के ढेर को 
उड़ा ले गयी थी सबा 
कब्र की कोख से 
उठने लगा था धुआं 
रात....अभी बहुत 
लम्बी है ..... 
तूने कभी पीया है 
बीड़ी में डालकर 
जहरीले अक्षरों का ज़हर ? 
नहीं न ? 
कभी पीना भी मत 
फेंफडे बगावत कर उठेंगे ... 
औरत पीती है 
हर रोज़ अँधेरी रातों में 
कुछ हथेली पे मल के 
होंठों तले दबा लेती है 
कुनैन की तरह 
ज़िन्दगी को ...... 
ये नज्में 
यूँ ही नहीं उतरती 
रफ्ता-रफ्ता धुएँ में 
तलाशनी पड़ती है 
अपनी परछाई 
और फिर ... 
३० नंबर की ये बीड़ी 
प्रतिवाद स्वरूप 
खड़ी हो जाती है 
विल्स के एवज में .....!!

16 comments:

  1. Yeah, kaafee rochak likhtee hai harkeerat ji, unkee rachnaao kaa main bhee niymit paathak hoon.

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  2. बहुत अच्छा रहा यह...हरकीरत जी की रचनायें हमेशा पसंद आती हैं.

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  3. हरकीरत जी बहुत उम्दा लिखती हैं और हर रचना दिल को छू जाती है.

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  4. हरकीरत जी अपने फन की एक अजीम शख्शियत हैं !
    आखिर ब्लागरा शब्द इस्तेमाल में आ ही गया -जब शास्त्री जी का अप्रूवल मिल गया तो फिर सारे विवाद ख़त्म -फिर क्या न ?

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  5. बहुत ही बेहतरीन रचनायें हैं ! अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति !

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  6. yahi to harkirat ji ki khoobi hai

    dard ko jiti hi nahi
    piti bhi hain
    sinchti bhi hain
    taki phool bane
    aur phir kanton
    mein pale.

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  7. हीर नहीं शायरी, ब्लॉगिंग का नायाब हीरा...

    दर्द जब हद से गुज़र जाए तो कुछ कह लेती हूं...

    जय हिंद...

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  8. हरकीरत हीर जी की रचनाओं का मैं भी नियमित पाठक बन गया हूँ ... उनके लेखन में एक बेबाकपन है ... जो दर्द के चाशनी में डूबकर बाहर आता है !

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  9. हरकीरत जी को पढ़ना हमेशा मन को सूकून देता है...आज की विशेष चर्चा के लिए आभार

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  10. आप दोनों को ही हार्दिक शुभकामनयें !

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  11. जिंदगी सुख भी है
    पर आज धरती के
    एक क़ब्र जितने टुकडे़ पर तो
    लिख ही लूंगी
    कि जिंदगी सुख भी थी
    हाँ इमरोज़!
    लो आज मैं कहती हूँ
    जिंदगी सुख भी थी
    harkeerat amrita ke saanche se nikli hi ek shayraa hain, shabd shabd heer lagte hain

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  12. हरकीरत जी को पढ़ना हमेशा मन को सूकून देता है...
    आज की विशेष चर्चा के लिए आभार...

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  13. हरकीरत हीर जी का व्यक्तित्व और लेखन बेहद प्रभावशाली है - उनकी ज्यादातर रचनाओं में प्रदर्शित दर्द सीधे दिल में उतरता है और अपना सा लगता है.

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  14. हरकीरत जी का तो कोई जवाब ही नहीं है, प्रथम पोस्ट तो आज ही पढ़ पाया हूँ, कमाल का लिखा है, पढ़ते पढ़ते एक दूसरी दुनिया में खो सा गया मैं!

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  15. हरकीरत हीर को पढना आनन्द और अनुभूति के आस्वादन मे अवगाहन है ।

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