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Tuesday, November 21, 2017

"भावनाओं के बाजार की संभावनाएँ" (चर्चा अंक 2794)

मित्रों!
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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भावनाओं के बाजार की संभावनाएं 

शहर के मुख्य बाजार की पैदल तफरी, 
आभासी दुनिया की चर्चाओं 
और विवाद के बीच 
भावनाओं का कॉकटेल.. 
ज्ञानवाणी पर वाणी गीत 
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तुम और मैं -९ 

मैंने दिया जला कर  
कर दी है रोशनी ... 
तुम प्रदीप्त बन हर लो, 
मेरा सारा अविश्वास... 
सु-मन (Suman Kapoor)  
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कागज़ का मन भींग रहा है 

लिखते रहने की सम्भावना का बचे रहना 
साँसों के बचे रहने की गवाही है 
दुःख का अनुभूति में बने रहना 
जीवित होने की पुष्टि है ... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक  
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काल का प्रवाह.. 

वे दुष्यंत थे 
भूल गये थे शकुन्तला को 
आज के दुष्यंत हैं 
जो शकुन्तला से मिलते ही हैं 
भूलने के लिए... 
अभिनव रचना पर ममता त्रिपाठी  
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हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे ... 

हम बुज़ुर्गों के चरणों में झुकते रहे
पद प्रतिष्ठा के संजोग बनते रहे

वो समुंदर में डूबेंगे हर हाल में 
नाव कागज़ की ले के जो चलते रहे... 
Digamber Naswa - 
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अबकी बार लौटा तो ....... 

कुंवर नारायण सिंह 

1927-2017 
अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें 
नहीं कमर में बांधें लोहे की पूँछे... 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal  
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हास्य-व्यंग्य अर्ज़ है 

9 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. आज की विस्तृत चर्चा का स्वागत है ...
    आभार मुझे शामिल करने का ...

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  3. चर्चा मंच यूँ ही सतत गतिमान रहे!
    सादर!!

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  4. आभार आदरणीय 'उलूक' के पन्ने को आज की सुन्दर चर्चा में जगह देने के लिये।

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  5. hamesha kee tarah bandhkar rakh diya hai aapke chaynit linkon ne,meri post ko sthan dene detu hardik dhanyawad

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  6. उम्दा चर्चा। मेरी रचना शामिल कराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  7. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति ...

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  8. चर्चा में ब्लॉग को शामिल किये जाने के लिए बहुत आभार...

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  9. मेरी कविता को चर्चा में शामिल करने के लिए बहुत-बहुत आभार...

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