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Sunday, June 09, 2019

"धरती का पारा" (चर्चा अंक- 3361)

मित्रों!
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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रात 

Sweta sinha  
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615.  

नहीं आता 

ग़ज़ल नहीं कहती   
यूँ कि मुझे कहना नहीं आता   
चाहती तो हूँ मगर   
मन का भेद खोलना नहीं आता... 
डॉ. जेन्नी शबनम  
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एक ग़ज़ल :  

जब भी ये प्राण निकले-- 

जब भी ये प्राण निकलें ,पीड़ा मेरी घनी हो  
इक हाथ पुस्तिका हो .इक हाथ लेखनी हो... 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक  
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Justice for Twinkle. 

Nitish Tiwary  
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साहिर और अमृता 

अमृता का प्यार सदाबहार  
उसके गले का हार  
साहिर बस साहिर  
उसका चैन उसका गुरूर  
उसकी आदत उसकी चाहत उसका सुकून  
उसकी मंज़िल साहिर बस साहिर... 
प्यार पर Rewa Tibrewal 

6 comments:

  1. सुन्दर लिन्क्स. मेरी कविता शामिल की. आभार.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  4. सुंदर प्रस्तुति शानदार मंच

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  5. शानदार प्रस्तुति!

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  6. बहुत सुन्दर सूत्र आज की चर्चा में ! मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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