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Friday, September 06, 2019

"हैं दिखावे के लिए दैरो-हरम" (चर्चा अंक- 3450)

मित्रों!
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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शिक्षक दिवस 

आज टीचर्स डे है.....यानि कि शिक्षक दिवस। यूँ तो जिंदगी हमारी सबसे बड़ी शिक्षक है लेकिन मूल रुप से हम, आज का दिन हमे अक्षर ज्ञान सिखाने वाले गुरुओं को ही समर्पित करते है। स्कूल में बिताया गया समय हमारे जीवन का एक सुनहरा समय होता है, न जाने कितनी खट्टी मिठ्ठी यादें जूड़ी है स्कूली जीवन और शिक्षकों के साथ ... 
आत्ममुग्धा 
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शिक्षा संग बदल गए शिक्षकों के मायने 

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शिक्षक दिवस:  

‘नौकरी की सोच’ से आगे की बात 

The point beyond 'job thinking'
Alaknanda Singh  
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शिक्षक दिवस 

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अर्पण करते स्व जीवन -  

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 

! कौशल ! पर 
Shalini kaushik  
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खुदकी खुद से एक जंग सी जारी रही.... 

tHe Missed Beat पर dr.zafar  
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हम मौत के कुआँ में वाहन चलाने के आदि है,  

सुधारने के लिए कठोरता जरूरी। 

नए ट्रॉफिक नियम को लेकर हंगामा बरपा है। सोशल मीडिया में जोक्स और पटना की सड़क पे ऑटो का सड़क जाम। सभी का गुस्सा है कि जुर्माना दस गुणा बढ़ा दिया। खैर, चर्चा होनी चाहिए। सबसे पहले । एक प्रसंग। अपने बिहार के सबसे छोटे से जिले शेखपुरा से। पत्थर हब होने की वजह से यहां ट्रकों की संख्या पर्याप्त से कई गुणा अधिक है। हर दिन कई ट्रक खरीद कर आते है। इसी क्षेत्र से जुड़े एक मित्र ने पूछा। कभी सोंचा है कि नए नए ट्रकों के चालक कहाँ से आ जाते है। उन्होंने बताया। ट्रॉकों के खलासी ( सहचालक) ही कुछ माह बाद नए ट्रॉकों पे चालक होते है! नाबालिग। बगैर सीखे। बगैर लाइसेंस के। परिणामस्वरूप वे सड़कों पे हत्यारे है। यह बसों, स्कार्पियो, बलोरो सब के लिए भी समान है... 
चौथाखंभा पर Arun sathi  
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उलझन .... 

इधर जग उधर  ईश्वर का द्वार है
सर्वत्र गूँजती कर्तव्य की पुकार है

चाहती हूँ थोड़ी शीतल सी छाँव
हर कदम पर बिछा ये अंगार है... 
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव  
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जन्मदिन 


मुकेश कुमार सिन्हा  
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पापा किसके साथ सोयेंगे ? 

कभी कभी बच्चे अपने भोलेपन और मासूमियत में कुछ ऐसी बात कर जाते हैं कि मन हँसे बिना नहीं रह पाता। अधिकांशतः अभिभावकों के समक्ष बड़े होते बच्चो को अकेले सुलाने की विकराल समस्या होती हैं। इस समस्या में जहाँ एक तरफ स्वयं का वात्सल्य आड़े आता हैं वहीं दूसरी और बच्चों के अंकुरित होते मानस पटल में उभरने वाले भय नए नए कारक भी होते हैं... 
Sudhir (सुधीर) 
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कहीं न कहीं 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
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4 comments:

  1. बहुत सुंदर ग़ज़ल है , शास्त्री सर।
    ...एक बात यह समझने की आवश्यकता है कि गुरु और शिक्षक दोनों में अंतर है।
    गुरु वह है , जो शिष्यों को निःशुल्क शिक्षा दान देता था। राज - रंक सभी एक समान थें उसके गुरूकुल में।
    रही बात शिक्षक की तो वे एक व्यवसाय से जुड़े हैं। शिक्षा देने के बदले अधिक से अधिक वेतन पाने की उम्मीद रखते हैं। इसके लिये अथवा अपनी अन्य सुख सुविधा के लिये सरकारी अध्यापकों को आये दिन धरना - प्रदर्शन करते देखा जा सकता है। क्यों कि इस आधुनिक युग में अर्थ का विशेष महत्व है।
    ..और सचमुच जीवन ही एक सच्चा पाठशाला है। सभी को प्रणाम।

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  2. बहुत सुन्दर चर्चा आदरणीय
    मुझे स्थान देने के लिए आभार आप का
    प्रणाम
    सादर

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  3. सुप्रभात सादर आभार।
    इतनी रोचक प्रस्तुति में मुझे स्थान देने के लिए धन्यवाद।

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