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Sunday, September 11, 2022

"श्रद्धा में मत कीजिए, कोई वाद-विवाद"(चर्चा अंक 4549)

 सादर अभिवादन 

आज रविवार की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से )

मात-पिता को मत कभीदेना तुम सन्ताप।
पितृपक्ष में कीजिएवन्दन-पूजा-जाप।।
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जिनके पुण्य-प्रताप सेरिद्धि-सिद्धि का वास।
उनका कभी न कीजिएजीवन में उपहास।।

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अपने माता-पिता और पितृ जनों के प्रति हृदय में सच्ची श्रद्धा रखकर उन्हें कोटि कोटि नमन करते हुए चलते हैं आज की कुछ खास रचनाओं की ओर...
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दोहे "श्रद्धा में मत कीजिए, कोई वाद-विवाद" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


श्रद्धा में मत कीजिएकोई वाद-विवाद।
श्रद्धा ही तो श्राद्ध कीहोती है बुनियाद।।
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सबके अपने ढंग हैंसबके अलग रिवाज।
श्राद्ध पक्ष में कीजिएविधि-विधान से काज।।

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छन्न पकैया


नाचे गाये मोर पपीहा

पादप झूम रहे हैं

बागों में कलियाँ मुस्काई

भँवरे घुम रहे हैं

बीच सरि के ठुम ठुम डोले

काठ मँढ़ी इक तरणी।।

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तुम दूर हुए मुझसे

जब बांह थामी थी मेरी

 वादा किया था साथ निभाने का 

जन्म जन्मान्तर का साथ अधूरा क्यों छोड़ा?

आशा न  थी मध्य मार्ग में  बिछुड़ने की 

उस वादे का क्या जो जन्म जन्मान्तर तक

 साथ निभाने का किया था

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आपको पहले भी कहीं देखा है


 रानीखेत एक्सप्रेस से दिल्ली-काठगोदाम का सफ़र कर के मैं काठगोदाम पर अल्मोड़ा जाने वाली एक शेयर्ड टैक्सी की तलाश में था.

जल्द ही अल्मोड़ा जाने वाली एक खाली टैक्सी मिल गयी.

मैं पीछे की विंडो वाली एक सीट पर बैठ गया.

कुछ देर बाद एक लड़की और उसके पिता श्री मेरे बगल में आ कर बैठ गए.

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एक व्यंग्य : टैग करने वालो से

 तौबा है ऐसे इन्सानों से ,

   अल्लाह बचाए----"

और इधर मैं गा रहा था--


बाते हैं मीठी मीठी , रचना है फीकी फीकी।

कहता हूँ मै सीधे सीधे, कविताएँ उल्टी-पुल्टी  

अल्लाह बचाए ’टैग वालों ’ से । अल्लाह !

अल्लाह बचाए---

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आओ भारत को जोड़ें हम......

हो साहस जब तन और मन में 
क्यों सच से मुख मोड़ें हम 
टूट कर जो है बिखर रहा 
आओ भारत को जोड़ें हम। 

बहुत कर लिया हिन्दू-मुस्लिम 
बहुत हो गईं खाप की बातें 
मुद्दे अपने खुद ही चुन लो 
कर लो अपने आप की बातें। 

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बरखा रिमझिम फुहार हो (कविता ) #भोजपुरी पावस गीत रिमझिम फुहार हो, नाचे लागल गुजारिया. नील आकाशवा पर तनल बा चदरिया काली काली कजरारी घिरेला बदरिया गोरी अपन चुनरी संवार हो, भींग जाई अंचरवा. बरखा क़े रिमझिम फुहार हो, नाचे लागल गुजरिया. पेड़वा क़े पतवा पर गिरेला बुंदिया जलवा भरल औ उफ़नल बा नदिया. मनवा में भरल बा हुलास हो, चली अब हरवा कुदरवा.--------------------------------जाने चले जाते हैं कहाँ .....


अक्सर, मैं भी यही सोचती हूँ आखिर दुनिया से जाने वाले कहाँ चले जाते हैं ? कहते हैं  इस जहाँ  से परे भी कोई जहाँ है, हमें छोड़ शायद वो उसी अलौकिक जहाँ में चले जाते हैं। क्या सचमुच ऐसी कोई दुनिया है ? क्या सचमुच आत्मा अमर है ? क्या वो हमसे बिछड़कर भी हमें देख सुन सकती है? क्या वो आत्माएं भी खुद को हमारी भावनाओं से जोड़ पाती है ? क्या वो दूसरे जहाँ में जाने के बाद भी हमें  हँसते देखकर खुश होते हैं और हमें  उदास देख वो भी उदास हो जाते हैं ? श्राद्ध के दिन चल रहे हैं सारे लोग पितरो के आत्मा की तृप्ति के लिए पूजा-पाठ ,दान-पुण्य कर रहे हैं, क्या हमारे द्वारा  किये हुए दान और तर्पण हमसे बिछड़े हमारे प्रियजनों की आत्मा तक पहुंचते हैं और उन्हें तृप्त करते हैं ? ऐसे अनगिनत सवाल मन में उमड़ते रहते हैं ,ये सारी बाते सत्य है या मिथ्य ?
------------------------------आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दे आपका दिन मंगलमय हो कामिनी सिन्हा 

6 comments:

  1. सुन्दर चर्चा प्रस्तुति।
    मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत
    बहुत धन्यवाद, कामिनी सिन्हा जी।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर संकलन

    ReplyDelete
  3. सुंदर सराहनीय अंक कामिनी जी ।बधाई और आभार ।

    ReplyDelete
  4. प्रशंसनीय अंक।
    विविधता लिए सुंदर चर्चा।
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय से आभार।
    सादर सस्नेह।

    ReplyDelete
  5. उम्दा लिनक्स से सजा अंक आज का |मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार |

    ReplyDelete

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