शीर्षक पंक्ति: आदरणीय आनन्द पाठक जी की रचना से।
शुक्रवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।
लीजिए पढ़िए चंद चुनिंदा रचनाएँ-
दोहे "हिन्दी का अनुपात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मां फिसल जाती है
समय की मुट्ठी से
रेत की तरह
मुट्ठी से फिसला हुआ रेत
कब लौटा है मुट्ठी में।
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भावों को जुटा हिंदी अधरों पर आई
तब ढूँढ़ लो उस ठठेरे को
भोगी जिसने पहली प्रसव-पीड़ा
गढ़ा जिसने पहला शब्द
ऊँ शब्द में पुकार
माँ शब्द में दुनिया
पिता शब्द में छाँव गढ़ी।
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दाना डाला था इसे दिखाकर,गया बेचारा लालच में।
दो-चार दाने ही चुग पाया,फँसा जाल के आनन में।
बहुत सुन्दर और सार्थक चर्चा।
जवाब देंहटाएंआपका आभार आदरणीय चर्चाकारः रवीन्द्र सिंह यादव जी।
सुप्रभात।।। पटल पर मुझे स्थान देने हेतु आदरणीय रवीन्द्र जी का हार्दिक आभार।।।।। समस्त लेखाकारों और साहित्य प्रेमियों को मेरा नमस्कार।।।
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंसुप्रभात! पठनीय रचनाओं से सजा चर्चा मंच!
जवाब देंहटाएंसराहनीय प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सराहनीय संकलन।
जवाब देंहटाएंस्थान देने हेतु हार्दिक आभार सर।
सादर
बहुत बहुत सुंदर और प्रशंसनीय रचनाएं... हार्दिक बधाई।
जवाब देंहटाएंडॉ अशोक रस्तोगी अग्रवाल हाइट्स राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
अच्छी रचनाएँ।
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