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Wednesday, September 21, 2022

"मोम के पुतले" (चर्चा अंक 4559)

 मित्रों!

बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

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आइए अब चलते हैं 

कुछ लिंकों की ओर!

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सरस्वती वन्दना 

हे वीणा वादिनी स्वर की देवी

मधुर तुम्हारी वीणा का स्वर 

सुनकर  पहुँची तुम्हारे दर  पर 

पाँव पकड़ वंदन किया | 

Akanksha -asha.blog spot.com 

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ग़ज़ल "रूप पुतले घड़ी भर में बदलते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

जहाँ अरमान पलते हैं
वहीं पर दीप जलते हैं
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जहाँ बरसात होती है
वहीं पत्थर फिसलते हैं 

उच्चारण 

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अल्प कालिक कुंद कवि 

मन घुमड़ते बादलों से

सृष्टि की चाहत लड़ी

तूलिका क्यों मूक होकर

दूर एकाकी खड़ी। 

मन की वीणा - कुसुम कोठारी। 

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गीत : हिन्दी को सम्मान मिला : संजय कौशिक 'विज्ञात' 

स्वर व्यंजन का मेल मिला तब शब्दों ने ली अँगड़ाई बना व्याकरण मात्रा खिलती भावों की यह चतुराई मुकुट चंद्र बिंदी का धरके वर्णों को अभिमान मिला।।  विज्ञात की कलम 

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कहते थे पापा 

" बेटी! तुम सबसे अलग हो! 
सब्र जितना है तुममें
किसी और में कहाँ! 
तुम सीता - सा सब्र रखती हो!! "

 बोल ये पिता के 
थे अपनी लाडली के लिए......... 
 या भविष्य की कोख में पल रहे
 अपनी बेटी के सीता बनने की
 वेदना से हुए पूर्व साक्षात्कार के थे।.....  

मेरी जुबानी : मेरी आत्माभिव्यक्ति सुधा सिंह व्याध्र

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दंत कथा 

दांतों तले उँगली दबाते देख एआई  के कमाल 

आज मरने के बाद लिया जाता मृतक का उस से  हाल

दांत काटे की रोटी खाते हैं जो, कभी अकेले नहीं रहते 

कोई जन  बात-बात पर दांत पीसने लगते

मन पाए विश्राम जहाँ 

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दो मुस्कुराते नैन 

दो मुस्कुराते नैन देखे

नैन में जलधार देखा 

लाल-नीला,श्वेतश्यामल

सज रहा संसार देखा ॥ 

जिज्ञासा की जिज्ञासा 

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फेमस फाइव और कारवाँ का सफर - एनिड ब्लाइटन | अनुवाद: डॉ सुधीर दीक्षित, रजनी दीक्षित 

समीक्षा: फेमस फाइव और कारवाँ का सफर - एनिड ब्लाइटन | Review: Famous Five Aur Carvaan Ka Safar (Famous Five Go Off in a Caravan in Hindi)

कहानी 

गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थीं और इस बार बच्चे किरिन कॉटेज की जगह जूलियन डिक और एन के घर आए हुए थे। जॉर्ज भी टिम के साथ यहीं पर इस बार अपनी छुट्टियाँ मना रही थी। वह सभी इन छुट्टियों में  भी कुछ ऐसा रोचक काम करना चाहते थे जो उन्हें खतरे में भी न डाले और उन्हें मज़ा भी आए। पर उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें।   

एक बुक जर्नल 

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प्रेमांकुर 

प्रेमांकुर
अकथ्य, अकल्पनीय, प्रेम के ये दृश्य...
पतझड़ों सा है रंग, पर, बसन्त सा उमंग,
सूखे से बीज में, जागे अंकुरण,
उम्र से परे, नर्म सा ये चुभन,
एहसास, फिर से वही,
लिए ही आते हैं, प्रेम के ये वृक्ष! 

कविता "जीवन कलश" 

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एक ख़त तुम्हारे नाम 

प्रिय शुचि,

आज जीवन के जिस मोड़ पर हम आ खड़े हुए हैं वहाँ से हमारी मंज़िलों के रास्ते अलग अलग दिशाओं के लिए मुड़ गए हैं ! मुझे नहीं लगता कि हम अब फिर से कभी एक ही राह के हमसफ़र हो सकेंगे ! इनके पीछे क्या वजहें रहीं उनके विश्लेषण के लिये एक ईमानदार आत्मचिंतन की बहुत ज़रुरत है ! वो पता नहीं हम और तुम कभी कर पायेंगे या नहीं लेकिन यह सच है कि अपनी सोच और अपने फैसले को, सही हो या ग़लत, उचित सिद्ध करने की धुन में प्रेम और विश्वास की डोर को तुमने इतने झटके के साथ खींचा कि वह टूट ही गयी और अब उसका जुड़ना नितांत असंभव है ! 

Sudhinama 

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सम्मान 

बतायें तो सही पाँच हजार में,
कैसा साहित्यिक सम्मान चाहेंगे।
आपके खास आर्डर पर वैसा ही,
सम्मान फैक्ट्री में तैयार करवायेंगे।
आप चाहें तो रेडीमेड भी मिलेगा,
कुछ खर्च भी कम लगेगा
किन्तु शर्त है 
मंच से उतरने के वापस लिया जाएगा,
और दो घंटे बाद 
किसी और को दिया जाएगा। 

मेरी दुनिया विमल कुमार शुक्ल

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माँ का न होना 

 जैसे वृक्ष का  है

जड़ विहीन हो जाना 

नदी का है

जल हीन हो जाना  

सरोकार अरुण चन्द्र रॉय

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ग़ज़ल  जिसमें हो परमेश्वर का नाम वो चौपाई नही हो सकते तुम 

सिर्फ कालिख हो सकते हो स्याही नही हो सकते तुम 
चाहते हो नफरत दुआओं में और गाते हो शांति के गीत 
सिर्फ मुनाफ़िक़ हो सकते हो सिपाही नही हो सकते तुम  

साहित्यमठ हरिनारायण तनहा

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दौड़ (कहानी) सुबह गहरी धुंध में लिपटी थी उसमें भीगे पेड़ ठिठुरे से खड़े थे। सूरज भी कोहरे की चादर में लिपटा मानों उजाला होने और धूप निकलने का इंतजार कर रहा था। सुबह के 8:00 बज रहे थे लेकिन लोग अभी भी घरों में दुबके थे। कच्ची सड़क पर इक्का-दुक्का साइकिल या बाइक सवार कोहरे की चादर से इस निस्तब्धता को चीर के गुजर जाते और उनके गुजरते ही सब कुछ मानों फिर जम जाता। मेघना रोज की तरह सुबह 6:00 बजे उठ गई थी। 

कहानी Kahani कविता वर्मा

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राधा तिवारी राधेगोपाल , राधे के अनमोल दोहे 

 सूर्य किरण को देखकर, खिल जाता है गात।
 मन भावन सब को लगे, सुंदर सुखद प्रभात।।

 मूंगफली और गुड़ करे,तन मन को मजबूत।
 शीत दूर करते यही, इसके बहुत सबूत।। 
राधे का संसार 

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कार्टून :- चीते को चुनाव भी लड़वाया जा सकता है 

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दोहे "माता के आशीष ने, मुझको किया निहाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

 
माता दशमी तिथि को, चली गयीं परलोक।

तब से अब तक हृदय में, भरा हुआ है शोक।।

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पैंसठ वर्षों तक रहा, सिर पर माँ का हाथ।

जब से माँ सुरपुर गयी, मैं हो गया अनाथ।।

उच्चारण 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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5 comments:

  1. सादर नमस्कार सर।
    बहुत ही सुंदर सराहनीय संकलन।
    सभी को बधाई।

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  2. सुन्दर सार्थक सूत्रों से सुसज्जित आज का चर्चामंच शास्त्री जी ! मेरे ब्लॉग 'सुधीनामा' की पोस्ट को आपने आज की चर्चा में सम्मिलित किया आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार ! सादर वन्दे !

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  3. रोचक लिंक्स से सुसज्जित चर्चा। मेरी पोस्ट को स्थान देने हेतु हार्दिक आभार।

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  4. बहुत सुंदर लिंक, सुधिनामा की कहानी बहुत बेहतरीन

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  5. बहुत सुंदर सराहनीय और सार्थक अंक ।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका हार्दिक आभार और अभिनंदन आदरणीय शास्त्री जी । सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।

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