Followers


Search This Blog

Saturday, September 17, 2022

"भंग हो गये सारे मानक" (चर्चा अंक 4554)

 मित्रों!

आप सबको विश्वकर्मा पूजा की बधाई हो।

--

देखिए शनिवार की चर्चा में कुछ अद्यतन लिंक!

--

गीत "हिन्दी का पथ नहीं सरल है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

--

भरत-भूमि में हिन्दी की,

आशाएँ लगती धूमिल हैं।

हिन्दी की बरबादी में,

खुद हिन्दी वाले शामिल हैं।।

उच्चारण 

--

मरुस्थल की नदियाँ 

"बाँकपन लिए,

मरुस्थल की नदियाँ खारी होती हैं!”

 विनय! रेत से भरी मुट्ठी हवा में उछालता व्यंगात्मक दृष्टि से अरुँधती की ओर मुस्कराता है।

अपेक्षाओं की बिखरती लहर देख वह शिकायतों का सेतु खड़ा करता है। तैरती विचारों की मछलियाँ समंदर और मरुस्थल का भेद भूल जाती हैं। रेत हवा में उड़ने लगती है। बची जल धराओं को सुविधा अनुसार मोड़ने का प्रयास पहाड़-सा लगता है।

”आख़िर समंदर की बेटियाँ हैं! लवणीयता लिए तो बहेंगी ही!” 

--

दुःख में सुमिरन सब करें जीवन में जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, कोई अभाव नहीं खटक रहा होता. शरीर स्वस्थ होता है और कोई आर्थिक समस्या भी नहीं होती तब मानव ईश्वर को याद नहीं करता. वह यदि नित्य की पूजा में बैठता भी है तो उसकी प्रार्थनाओं में गहराई नहीं होती. वह फूल भी अर्पित करता है और उसके मन्दिर में घन्टा भी बजा देता है पर उसके मन में कोई कोई आतुरता नहीं होती

डायरी के पन्नों से अनीता

--

शुभ दीपक एक जलाना है 

छँट जाएगा घोर अँधेरा 

उहापोह, उलझन का डेरा, 

थोड़ा सा स्नेह जगाना है 

शुभ दीपक एक जलाना है !

मन पाए विश्राम जहाँ 

--

कुर्सी 

म्यूजिकल चेयर
--
कुर्सी 
हाए कुर्सी...
कुर्सी की दौड़ 
आगे निकलने की होड़ 
जोड़-तोड़
तरोड-मरोड़ 

काव्य कूची अनीता सुधीर आख्या 

--

हमारी मातृभाषा (6 हाइकु) 1. 

बिलखती है,   
बेचारी मातृभाषा   
पा अपमान।  

2. 
हमारी भाषा   
बनी जो राजभाषा   
है मातृभाषा।  

लम्हों का सफ़र जेन्नी शबनम 

--

हर दिन हिन्दी का है . 

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है .

प्राणवायु सी साँसों में, जीवन हिन्दी का है .

 जैसे भावों को माँ समझे और सबको समझाए  .

माँ के वशभर सन्तानों का सिर न कभी झुक पाए .

सम्बल दे माँ जैसा ही अंचल हिन्दी का है .

एक दिवस ही क्यों अपना हर दिन हिन्दी का है. 

Yeh Mera Jahaan गिरिजा कुलश्रेष्ठ

--

'हिन्दी दिवस' (लघु कविता) 

हिन्दी भाषा की जो आन-बान है, किसी और की कब हो सकती है! मेरे देश को परिभाषित करती, हिन्दी तो स्वयं मां सरस्वती है।

Gajendra Bhatt 

--

सच्चा मोती 

 सागर में सीपी 

सीपी में मोती 

मोती में जुति अद्भुद 

छिपी अन्दर है | 

आशा लता सक्सेना

Akanksha -asha.blog spot.com 

--

देश की अखण्डता के लिये देश के हर हिस्से में सभी धर्मो के लोगो का बिखराव जरूरी है विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
अधीक्षण अभियंता सिविल, म प्र पू क्षे विद्युत वितरण कम्पनी
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर ४८२००८
फोन ०७६१२६६२०५२

        प्रश्न है देशों का निर्माण  कैसे हुआ  ?  भौगोलिक स्थितियो के अनुसार लोगो का रहन सहन लगभग एक समान ही होता है . नदियो , पहाड़ो , रेगिस्तानो जैसी प्राकृतिक बाधाओ ने प्राचीन समय में देशो की सीमायें निर्धारित की . इतिहास साक्षी है कि एक ही विचारधारा और धर्म के मानने वाले भी एक ही राज्य के झंडे तले एकजुट होते रहे . विस्तार वादी नीतीयो से जब युद्ध राजधर्म सा बन गया तो सेनाओ को एकजुट रखने में भी धर्म का उपयोग किया गया . पिछली सदी में जब दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्यो का महत्व बढ़ा तो ,विस्तारवादी  युद्धो की वैश्विक भर्तसना होनी शुरु हुई . पर किंबहुना आज भी देशो के नक्शे  क्षेत्रो की भौगोलिक स्थिति  , राष्ट्रो की शक्तिसंपन्नता , वैचारिक और धार्मिक आधारो पर ही तय हो रहे हैं . भारत एक लोकतांत्रिक विश्व शक्ति है . हमारा संविधान हमें धार्मिक स्वतंत्रता देता है  .संविधान के अनुच्छेद (२५-२८) के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार वर्णित हैं, 
कुछ तुम कहो कुछ मैं कहु | 

--

मुरादाबाद मंडल के अफजलगढ़ (जनपद बिजनौर) के साहित्यकार डॉ अशोक रस्तोगी की लघुकथा ...श्रद्धा 

शिवालय में माता का भव्य जागरण हो रहा था। भांति-भांति की पुष्प श्रंखलाओं से देवोपम भव्य दरबार सज्जित किया गया था।लब्ध प्रतिष्ठ गायक और कलाकार आये हुए थे। साहित्यिक मुरादाबाद 

--

16-30 September 2022 

--

पुस्तक समीक्षा 

रत्नकुमार सांभरिया ज़मीन से जुड़े रचनाकार हैं। ज़मीनी महक, देसी गमक उनकी कहानियों को एक खास बानगी देती है और कहानियों को अधिक संजीदा अधिक रोचक और कहीं अधिक पठनीय भी बनाती है। डॉ0 लोकेश कुमार गुप्ता द्वारा संपादित ‘पुस्तक रत्न कुमार संभरिया की प्रतिनिधि कहानियां’ कुछ ऐसी ही कहानियों का संग्रह है, जिसमें संपादक  ने बहुत कुशलता से कहानियों का चुनाव किया है। लेखकीय क्षमता से प्रभावित सम्पादक का यह कथन उल्लेखनीय है- 

“अगर मैं एक पंक्ति में कहूं तो रत्न कुमार सांभरिया का लेखन एक महाकाव्यात्मक पीड़ा, संघर्ष, वेदना, वंचना और अभिजन-समाज में व्यक्ति जीवन के नवीन मूल्य और मानदंडों को स्थापित करता है।“  

🌈🌹शेफालिका उवाच🌹🌈 

--

त्रिकोण के मध्य 

कुछ नदियां अपने गर्भ में रखती

हैं अंतहीन गहराइयां, देह की

असंख्य शिराओं से हो 

कर बहते हैं अणु 

अग्निशिखा 

--

असली-नकली लोकतंत्र की बहस में भारत 

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में हम इस बात पर बहस कर रहे हैं कि लोकतंत्र क्या हैदिसंबर, 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ‘डेमोक्रेसी समिट’ का आयोजन किया थाजिसके जवाब में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने कहा कि असली और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र चीन में है. हम मानते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत में है, पर इकोनॉमिस्ट के डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत को उतना अच्छा स्थान नहीं दिया जाता, जितना हम चाहते हैं. पश्चिम में हमारी आलोचना हो रही है. वैसे ही जैसे 1975-77 की इमर्जेंसी के दौर में हुई थी. 

जिज्ञासा 

--

Gds के साथ वैष्णोदेवी की यात्रा 

दर्शन कौर धनोए

--

दक्षिण भारत वाले क्या हमारी ही तरह मूर्ख हैं जो अपनी लुटिया डुबो लें  वाह भाई वाह! कितने बुरबक हैं हम 'गोबर पट्टी' माफ करें हिन्दी पट्टी वाले और पतनशील भी। इतना भी भेजा में नहीं सोच पाते कि कोई पिछड़ा ही किसी विकसित की नकल करता है, विकसित पिछड़े की नहीं। वैसे भी हम जैसे मूढ़ लोगों से आशा ही क्या की जा सकती है, जिन्हें अपनी मातृभाषा को ही बोली कहने में जरा भी शर्म नहीं आती।@श्रीकांत सौरभ

 

अंजोर Anjor 

--

रेस्टोरेंट स्टाइल दही वाली धनिया चटनी (restaurant style dahi wali dhaniya chutney) 

--

पांच लोग जिनसे आप स्वर्ग में मिलते हैं। 

The फाइव पीपल यू मीट इन हेवन मिच एल्बॉम का 2003 का एक उपन्यास है।  वे पांच लोग जिनसे आप स्वर्ग में मिलते हैं जिंदगी और मृत्यु हमारे जीवन के दो महत्पूर्ण पहलू हैं। जीवन के यह दोनो हादसे ही अजब ही होते हैं। जब जीवन मिलता है तो हम तब भी उस से अनजान होते हैं और मौत का वक्त भी तय नहीं होता सो उस से भी अनजान । और मौत के बाद क्या होता है यह बताने वाला भी गायब होता है। पर हर धर्म की अपनी धारणा है। और उसी के अनुसार स्वर्ग नरक की परिभाषा मान ली जाती है। 

कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** 

--

काव्य क्षितिज पर उभरते एक नये सितारे का अचानक अवसान 

 (आलेख - स्वराज्य करुण )

दुर्भाग्य से पिथौरा में ऐन रक्षाबंधन के दिन 11 अगस्त 2022 को एक मोटरसाइकिल हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे । स्थानीय  अस्पतालों की भारी अव्यवस्था के बीच उन्हें बेहोशी की हालत में राजधानी रायपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती करवाया गया ,जिसके कर्णधारों की भयानक निर्ममता को झेलते हुए उनकी आत्मा 14 अगस्त 2022 को दुनिया छोड़ गई। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के काव्य क्षितिज पर आकार ले रही संभावनाओं के   एक नये सितारे का भी  अचानक अवसान हो गया।  मेरे दिल की बात 

--

आज के लिए बस इतना ही...!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

8 comments:

  1. नमस्कार, डॉ. शास्त्री 'मयंक' जी! चर्चा मंच के पटल पर मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत आभार! समस्त रचनाकारों को भी स्नेहिल नमस्कार व बधाई

    ReplyDelete
  2. उम्दा चर्चा। मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

    ReplyDelete
  3. सुप्रभात! सभी रचनाकारों व पाठकों को विश्वकर्मा देव की जयंती के अवसर पर शुभकामनाएँ, सुंदर चर्चा प्रस्तुति, आभार!

    ReplyDelete
  4. बहुत ही सुंदर सराहनीय संकलन आदरणीय शास्त्री जी सर। 'मरुस्थल की नदियाँ ' को स्थान देने हेतु हार्दिक आभार।
    सादर

    ReplyDelete
  5. बहुत सुंदर सराहनीय रचनाओं से सज्जित अंक।

    ReplyDelete
  6. वृहत लिंको से सुसज्जित शानदार चर्चा।
    सभी रचनाएं बहुत आकर्षक सुंदर।
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
    सादर।

    ReplyDelete
  7. बढ़िया लिंक मिले, आभार आपका

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।