Followers

Wednesday, November 16, 2011

"सुना था होता है इक बचपन" (चर्चा मंच-700)

नमस्कार!

बुधवासरीय चर्चा में एक बार फ़िर आप सभी का स्वागत है । पिछले एक हफ़्ते में सियासी से लेकर आर्थिक सरगर्मिया जोरो पर हैं। ’वाल स्ट्रीट कब्जा करो’ नामक आंदोलन पिछले कुछ दिनो से जारी है। पर भारत में आम आदमी को आर्थिक विषयों पर कुछ खास जानकारी या कहें रूची भी नही है। यहां प्राथमिकताएं कुछ अलग हैं । सरकार आंकड़ो के जरिये घटाई जा रही गरीबी में व्यस्त है। जनता आरक्षण और जातिवाद में मग्न है, नारद मुनी ने जबरदस्त व्यंगात्मक शैली मे समाधान दिया है। सवाल यह नही है कि आम आदमी भीख न मांगे सवाल यह है कि अपने ही राज्‍य में भीख मांगें।" । जाहिर सी बात है राजनीति भी एक व्यापार है और नेता गण "आज बन गये सब व्यापारी" हैं। ऐसे मे परम पूज्यनीय बाबा रामू का प्रवचन आदमी को एक क्षद्म आशा दिखाता है। वैसे भी हिंदुस्तान को शायद अब नेताओ से ज्यादा बाबाओ पर ही भरोसा रह गया है।

बाल दिवस पर लोगो की अनपेक्षित प्रतिक्रियाएं भी नजर आयी, बाज लोग गांधी, नेहरू खानदान को कोसने के व्यवसाय में लगे हुये हैं। आम आदमी भी इस खानदान के सपूतो से त्रस्त तो है ही। संजय शर्मा हबीब साहब ने "बहता बचपन" में साहित्यिक राहत जरूर प्रदान की। और इस अवसर पर शास्त्री जी की किताबों का विमोचन भी हुआ। वंदना जी ने सुना था होता है इक बचपन में खूबसूरती से चित्रण किया है।

दूसरी ओर स्वराज्य करूण जी ने पत्रकारिता में भी आ गए मुन्ना भाई ! में एक ही दिन दो अलग अलग अखबारो में छपे एक ही संपादकीय अनेको उदाहरण सहित हाल बताया है। उस पर भी तुर्रा यह कि दोनो ने ही वे लेख ब्लाग जगत से चुराये थे।

ललित शर्मा जी इन सब से ऐसा उबे कि निकल पड़े , तीर्थाटन - मथुरा की ओर उधर संजय महापात्रा जी मोमबत्तियों का मानवाधिकार में मोमबत्ती ब्रिगेड पर भड़के हुये है कि उन्हे शहीदो की चिंता क्यों नही होती। अतुल प्रकाश त्रिवेदी जी कौन हूँ मैं में खूबसूरती से मनोभावो का चित्रण करते हुये।

सबसे आखीर में कश्मीर- सच, झूठ और अंतिम समाधान । वह समस्या जो हमारे देश और पाकिस्तान को हर दिन कीमत चुकाने को मजबूर करती है। समाधान तो खैर तब होगा जब लोग और मीडिया समस्या को समझेंगे, फ़िल्हाल नफ़रतें बेचते खरीदते हम हर दिन गुजार रहे ही हैं।
अगली चर्चा में फ़िर मुलाकात होगी ...!

14 comments:

  1. सार्थक चर्चा... बहुमूल्य लिंक्स...
    सादर आभार...

    ReplyDelete
  2. सुंदर चर्चा...अच्छे लिंक दिये हैं आपने
    ...........धन्यवाद अरूणेश सी दवे

    ReplyDelete
  3. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स दिये हैं आपने ..आभार ।

    ReplyDelete
  4. सार्थक चर्चा --
    सादर आभार ||

    ReplyDelete
  5. सुन्दर चर्चा , धन्यवाद दवे जी , मेरी रचना "आरक्षण और जातिवाद " को चर्चा में शामिल करने के लिए , :) आभार !

    ReplyDelete
  6. बढ़िया चर्चा.....अच्छे लिंक्स

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर और सारगर्भित चर्चा की है……………शानदार लिंक संयोजन्।

    ReplyDelete
  8. चर्चा के लिंक बहुत अच्छे हैं।

    ReplyDelete
  9. अच्‍छी चर्चा
    आभार....

    ReplyDelete
  10. लोटे में समन्दर समा दिया है आज की चर्चा में आपने!

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

विदेशी आक्रमणकारी बड़े निष्ठुर बड़े बर्बर; चर्चामंच 2816

जिन्हें थी जिंदगी प्यारी, बदल पुरखे जिए रविकर-   रविकर     "कुछ कहना है"   (1) विदेशी आक्रमणकारी बड़े निष्ठुर बड़े बर्...