चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Friday, December 02, 2011

"गृहस्वामी सब एक से, जोड़-गाँठ में दक्ष" (चर्चा-मंच :716 )

चर्चा-मंच :716
(1)

गृहस्वामी सब एक से, जोड़-गाँठ में दक्ष |
मिले आर्थिक लाभ तो, समझें सम्मुख पक्ष ||

धरम-भीरु होते कई, कई देखते स्वार्थ |
जर जमीन जोरू सकल, इच्छित मिलें पदार्थ ||

भारतीय नारी

सभी सम्मानित सदस्यों को सूचनार्थ- अक्टूबर व् नवम्बर माह में ''भारतीय नारी '' ब्लॉग पर चर्चा के मुख्य विषय रहेंगें - *तनाव का शिकार होती महिलाएं -कारण व् समाधान *कैसे सामंजस्य बैठाएं आधुनिक सास-बहू ? *अधिक पढ़ी-लिखी पत्नी को क्या वास्तव में पति वैसा सम्मान दे पाता है जिसकी वो हक़दार है ? शुभकामनाओं के साथ ! शिखा कौशिक

स्वस्थ बदन ही सह सके, सांसारिक सब भार |
बुद्धी भी निर्मल रहे, बढ़े सकल परिवार ||

(2)
Friends18.com Orkut Scraps

प्रतिस्पर्धा......

२१ वीं सदी का जमाना है
प्रतिस्पर्धा की इस अंधी दोड में,
अब्बल जो आना है-
बात शिक्षा की हो,
या नम्बरों की

बात टी.वी.की हो,
या खबरों की
बात माया की हो,
या ममता की
पक्ष की हो या बिपक्ष की
सभी क्षेत्रो का यही हाल है,
आगे निकलने की
सिर्फ यही एक चाल है
(3)
दीदार गरीब नवाज की मज़ार का


- श्रुति अग्रवाल
दरगाह अजमेर शरीफ...एक ऐसा पाक-शफ्फाक नाम है जिसे सुनने मात्र से ही रूहानी सुकून मिलता है...अभी रमजान का माह चल रहा है...इस माह-ए-मुबारक में हर एक नेकी पर 70 गुना सवाब होता है। रमजानुल मुबारक में अजमेर शरीफ में हजरत ख्वाजा मोईनुद्‍दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह की मजार की जियारत कर दरूर-ओ-फातेहा पढ़ने की चाहत हर ख्वाजा के चाहने वाले की होती है,लेकिन रमजान की मसरूफियत और कुछ दीगर कारणों से सभी के लिए इस माह में अजमेर शरीफ जाना मुमकिन नहीं है। ऐसे सभी लोगों के लिए धर्मयात्रा में हमारी यह प्रस्तुति खास तोहफा है।

(4)

तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहें न रहें.... राजीव भाई को श्रृद्धांजलि

भाई राजीव दीक्षित जी के नाम स्वदेशी और आजादी बचाओ आन्दोलन से हम सभी परिचित हैं.. एक
अमर हुतात्मा, जिसने अपना पूरा जीवन मातृभाषा मातृभूमि को समर्पित कर दिया..आज उनका जन्मदिवस और पहली पुण्यतिथि भी है..आज ही के दिन ये अमर देशभक्त हमारे बिच आया था और पिछले साल हमारे बिच से आज ही के दिन राजीव भाई चले गए..अगर राजीव भाई के प्रारम्भिक जीवन में झांके तो जैसा की हम सब जानते हैं ,राजीव भाई एक मेधावी छात्र एवं वैज्ञानिक भी थे..आज के इस भौतिकतावादी दौर में जब इस देश के युवा तात्क्षणिक हितों एवं भौतिकवादी साधनों के पीछे भाग रहा है, राजीव भाई ने राष्ट्र स्वाभिमान एवं स्वदेशी की परिकल्पना की नीव रखने के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन को राष्ट्र के लिए समर्पित कर त्याग एवं राष्ट्रप्रेम का एक अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत किया..सार्वजनिक जीवन में आजादी बचाओ आन्दोलन से सक्रीय हुए राजीव भाई ने स्वदेशी की अवधारणा एवं इसकी वैज्ञानिक प्रमाणिकता को को आन्दोलन का आधार बनाया..
स्वदेशी शब्द हिंदी के " स्व" और "देशी" से मिलकर बना है."स्व" का अर्थ है अपना और "देशी" का अर्थ है जो देश का हो.. मतलब स्वदेशी वो है "जो अपने देश का हो अपने देश के लिए हो"

(5)

'अनजाना' और 'पार' (मम्मी की दो कविताएं)

आज प्रस्तुत हैं मम्मी की लिखी दो नयी कविताएं --
(श्रीमती पूनम माथुर )
अनजाना
पुराना था एक सपना
उसमे झलका अपना
कब होगा उसका आना
कब होगा मेरा जाना

आयेगा एक मस्ताना
उसको बना देगा दीवाना
यह है उसका अफसाना
कौन है वह अनजाना
(6)
आदरणीय पाठक वृन्द को अनामिका का नमस्कार. आज आप सब के सहयोग से हम महादेवी जी की इस श्रृंखला के अंतिम पड़ाव पर आ चुके हैं और अब इस सिन्धु में अंतिम गोता लगाते हुए अंतिम छिपे माणिकों को दृष्टि गोचर करते हैं ....
उत्कृष्ट मौलिक सृजन के साथ इन्होने अनुवाद का भी बहुत बड़ा कार्य किया है. काव्यमयी वैदिक ऋचाओं से लेकर वाल्मीकि, थेरगाथा, अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव सदृश उद्दात-सरस काव्य विभूतियों का काव्यमय हिंदी रूपांतर 'सप्तपर्णा' में प्रकाशित हुआ है, परन्तु अभी तक अनुवाद का अधिकांश अप्रकाशित ही है. कालिदास के महाकाव्य 'कुमार संभव' तथा 'रघुवंश' और अश्वघोष के महाकाव्य 'बुद्धचरित' का सम्पूर्ण अनुवाद भी इन्होने काव्यमय रूप में ही किया है. अनुवाद में मूलकवि की अनुभूतियों और संवेदनाओं के साथ महादेवीजी का--------------------------------------------------------------------------

(7)

द्वेश का बीज ....

मुझे बीज बहुत अच्‍छे लगते हैं,
बचपन में कभी
कोई बीज हांथ लगता तो
उसे घर के आंगन में
उत्‍साह के साथ बो देती थी
नियम से सींचना
और उसे अंकुरित होते
देखने की उत्‍सुकता में
भोर में उठ जाना
मां मेरी उत्‍सुकता देख कहती
तुम्‍हें पता है ...
जैसे ये बीज हैं न
वैसे ही होते हैं संस्‍कार के बीज
बस फर्क इतना होता है
उन्‍हें धरती पर नहीं

(8)

स्त्री महज़ बलात्कार की खबर है क्या ?

अभी एक खबर आई है कि सन्यासी से राजनेता और फिर सन्यासी बने स्वामी चिन्मयानन्द महाराज पर एक स्त्री के साथ बलात्कार का आरोपी बनाया गया है.ऐसा आरोप चस्पा करने वाली उनकी ही पूर्व शिष्या और स्वनामधन्या चिदार्पिता जी हैं जो हाल-फिलहाल तक स्वामीजी के साथ तन,मन,धन अर्पित किये रहीं .
यहाँ यह बात गौर करने वाली है कि स्वामीजी उनके लिए अब बलात्कारी और आततायी हो गए जब स्वामीजी सत्ता-सुख से रहित हैं और न आगे इसकी कोई सम्भावना दिखती है.उन महोदया की तहरीर ,बतौर एक स्त्री , दर्ज करने में राज्य सरकार को गज़ब की सहूलियत दिखाई दी और उसने फुर्ती से वह काम कर लिया ,जिसके लिए आम आदमी महीनों धक्के खाता है.

(9)

ग़ज़ल (जंजाल आते हैं)

सभी सम्माननीय सुधि मित्रों को सादर नमस्कार कर एक ग़ज़ल महफिले दानां में पेशे खिदमत है...
***************************************
बहर :- बहरे हजज मुसम्मन सालिम |
मफाईलुन | मफाईलुन | मफाईलुन | मफाईलुन
****************************************
विदेशी बेचने हमको हमारा माल आते हैं ।
हमारी जान की खातिर बड़े जंजाल आते हैं ।1।
रहो खामोश अपने देश की बातें न करना तुम,
जुबां खोली अगर, माजी तिरा खंगाल आते हैं ।2।

(10)

स्‍वाधीनता

बैरिस्‍टर ठाकुर छेदीलाल
अकलतरा के 28 वर्षीय युवा द्वारा रचित सन 1919 में प्रकाशित पुस्‍तक का अंश
हालैंड की स्वाधीनता का इतिहास
ठाकुर छेदीलाल एम.ए. (आक्सफोर्ड)
बैरिस्टर-एट-ला
(परमात्‍मने नमः)
बीसवीं सदी स्वतंत्रता की सदी है। संसार के जिस हिस्से पर ध्यान दिया जाये, चारों ओर से स्वतंत्रता ही की आवाज आती है। यहां तक कि वर्तमान विश्वव्यापी समर भी स्वतंत्रता ही के नाम पर प्रत्येक देश में मान पा रहा है। भारत वर्ष भी स्वतंत्रता के इस भारी नाद में अपना क्षीण स्वर अलाप रहा है।

(11)

"आभासी दुनिया वास्तविक जगत से अच्छी है " (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") लगभग एक सप्ताह पुरानी बात है। मैं उस समय बाज़ार में किसी के पास बैठा था कि मेरे मोबाइल पर एक कॉल आयी "मैं महेन्द्र श्रीवास्तव बोल रहा हूँ! शास्त्री जी आप खटीमा में ही रहते हैं क्या?"

(12)

ये मेरी रुक्मिणी हरदम मुझे बूढा बताती है --मयंक अवस्थी

ग़ज़ल-1
उन्ही का इब्तिदा से जहिरो –बातिन रहा हूँ मैं
जो कहते हैं कि गुजरे वक़्त का पल –छिन रहा हूँ मैं
मेरे किरदार को यूँ तो ज़माना श्याम कहता है
मगर तारीख का सबसे सुनहला दिन रहा हूँ मै
(13)
जीवन के एकांत पलों में
जब अकेली हो जाती हूँ
तब यादों के पन्नों में
बस यूँ ही खो जाती हूँ
न जाने कितनी यादें
बसी है, मन के भीतर
कुछ खामोश कुछ गुमसुम

(14)

आओ चलो पार्क में खेलें

पढ़ते समय ध्यान से पढ़ते,
होम वर्क हम मन से करते.
तन मन में ताज़गी जगाने,
आओ चलो पार्क में खेलें.
*Foreign direct investment --FDI * *आखिर FDI है क्या बला ?* ** विद्वान् पाठकों को FDI के बारे में अवश्य ही पता होगा फिर भी सामान्य पाठकों की जानकारी के लिए सरल शब्दों में -- FDI अर्थात किसी देश का अन्य देश...

(16)

‘तस्‍लीम’ का एक और महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम: क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन (Science Fiction Writing in Regional Languages)


http://www.vigyanprasar.gov.in/images/vpanim.gifआप सबको बताते हुए हमें अत्‍यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है कि ब्‍लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार कार्यशाला तथा बाल साहित्‍य में नवलेखन संगोष्‍ठी जैसे दो वृहद एवं सफल कार्यक्रम आयोजित करने के बाद तस्‍लीम दिनांक 26 एवं 27 दिसम्‍बर, 2011 को लखनऊ में विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के साथ मिलकर क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन विषयक कार्यशिविर का आयोजन करने जा रहा है। यह कार्यक्रम महाराणा प्रताप मार्ग पर स्थित नेशनल पी0जी0 कॉलेज में सम्‍पन्‍न होगा।
भारत में विज्ञान कथाओं का इतिहास काफी पुराना है। हिन्‍दी में प्रारम्भिक विज्ञान कथाओं के रूप में आश्‍चर्य वृत्‍तांत तथा चंद्रलोक की यात्रा के नाम आते हैं। लेकिन इन दोनों रचनाओं पर जूल्‍स बर्न के प्रभाव के कारण सरस्‍वती के अप्रैल-जुलाई, 1908 में प्रकाशित सत्‍यदेव परिव्राजक की कहानी आश्‍चर्यजनक घंटी को हिन्‍दी की पहली मौलिक विज्ञान कथा का दर्जा दिया जाता है।
(17)
आंच–98
अंक - 1

कविता की संरचना – मेरी दृष्टि में

आंच पर इस बार हमारे अतिथि लेखक सलिल वर्मा पेश कर रहे हैं कविता की भाषा पर अपने विचार!
salilसलिल वर्मा
साहित्य के साथ वैज्ञानिक बुद्धि का मिश्रण मत कीजियेगा, क्योंकि इसके भयंकर परिणाम देखे हैं मैंने.
आचार्य परशुराम राय जी ने जब यह आलेख मुझे लिखने का उत्तरदायित्व सौंपा तो एक गर्व की अनुभूति के साथ-साथ निर्वाह का बोझ भी कंधे पर महसूस हुआ. एक लंबे अंतराल के पश्चात जब लिखने का साहस जुटा पाया तो सबसे पहले स्मरण हो आया पिछले साल हुई एक घटना का. वाराणसी के एक महात्मा जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया तुलसीकृत रामचरित मानस की वर्तनी के सुधार में. उनके अनुसार उसमें कई दोष थे जिनका सुधार उन्होंने किया है. यह समाचार हास्यास्पद भी है और विचारोत्तेजक भी. मेरे हिन्दी के प्राध्यापक श्री जगदीश नारायण चौबे कहा करते थे कि आप सभी विज्ञान के विद्यार्थी हैं, किन्तु साहित्य के साथ वैज्ञानिक बुद्धि का मिश्रण मत कीजियेगा, क्योंकि इसके भयंकर परिणाम देखे हैं मैंने. और, उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि किसी छात्र को प्रेमचंद नाम अटपटा लगा तो उसने सुधार कर “प्रेम चंद्र” बना दिया और राहुल सांकृत्यायन को “राहुल सांस्कृतायन”.
तुकांत कविता का स्थान तुकबंदी ने ले लिया, जिससे कविता की बड़ी क्षति हुई. जिसने भी तुक मिलाकर शब्दों को जोड़ लिया वही कवि बन गया.
कविता की पैदावार पिछले कुछ वर्षों में बहुत बढ़ी है. इसके लिए उत्प्रेरक का काम कविता के शिल्प ने ही किया है. स्पष्ट करूँ तो कविता यदि ‘तुकान्त’ हो तो लयात्मक होगी, ऐसी मान्यता रही है. इसका परिणाम यह हुआ कि तुकांत कविता का स्थान तुकबंदी ने ले लिया, जिससे कविता की बड़ी क्षति हुई. जिसने भी तुक मिलाकर शब्दों को जोड़ लिया वही कवि बन गया.
यदि ‘प्रसाद’ की निम्नलिखित रचना कविता की श्रेणी में आती है -
हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतन्त्रता पुकारती!
तो इस रचना ने भी कविता की दावेदारी दाखिल कर दी -
आप यहाँ आये - किसलिए, आपने बुलाया - इसलिए,
आए हैं तो काम भी बताइये, पहले ज़रा आप मुस्कुराइये.
कई ऐसे कवि भी रातों-रात उग आए जिन्होंने छन्द-मुक्त कविता की इस विधा को ‘फोटोजेनिक’ रूप में आत्मसात किया. कविता शब्दों का भण्डार हो गई जिसे इस प्रकार की सज्जा प्रदान की गयी है कि वह ‘देखने’ में ‘कविता-सी’ लगे.
नई कविता के नए मानदण्ड में तुकांतता और छन्द का प्रचलन समाप्त होने से भी अराजकता बढ़ी. छन्दमुक्त स्वतंत्र कविता की इस अबाध कलकल धारा ने निराला, बच्चन से लेकर अज्ञेय, कन्हैया लाल नंदन, धूमिल और अनेकानेक कवि हमें दिये, जिनसे हिन्दी साहित्य का मान बढ़ा. किन्तु इसी स्वतन्त्रता ने सबसे बड़ी क्षति भी पहुचाई. कई ऐसे कवि भी रातों-रात उग आए जिन्होंने छन्द-मुक्त कविता की इस विधा को ‘फोटोजेनिक’ रूप में आत्मसात किया. इसे इस तरह स्पष्ट करना चाहिए - इस रूप में कविता (छन्दमुक्त) शब्दों का वह भण्डार है जिसे इस प्रकार की सज्जा प्रदान की गयी है कि वह देखने’ में ‘कविता-सी’ लगे.
“मैं सड़क पर जा रहा था. एक केले का छिलका वहीं पड़ा था. मैं फिसल गया. मेरे विचारों के सिलसिले टूट गए.”
इस वक्तव्य को शब्दक्रम बदलकर सुसज्जित करने पर जो बना वह प्रस्तुत है. शायद इसे कविता कहा जा सके, क्योंकि देखने में कविता जैसी है -
मैं सड़क पर जा रहा था
एक छिलका
केले का
वहीं पड़ा था.
फिसल गया मैं
और टूट गए
मेरे विचारों के सिलसिले!!
इस तरह के समस्त प्रयास कविता के स्वरूप की अनभिज्ञता के कारण ही होते रहे. इसमें थोड़ा सा कल्पना का पुट दे दिया जाय, तो इन्हीं शब्दों के माध्यम से कविता लिखी जा सकती है-
उन्हें देखकर कुछ ऐसा हुआ,
केले के छिलके पर
पड़ते ही पैर होता जो
विचारों के सिलसिले का.
पहली वाली कविता में 23 शब्द हैं और चमत्कार का अभाव भी है. जबकि दूसरी में 18 शब्द हैं और थोड़ा सा कल्पना तत्व के आ जाने से कुछ चमत्कार भी आ गया है.

(18)

डिग्री ही नहीं शिक्षा भी जरुरी.


मैं जब भी भारत जाती हूँ लगभग हर जगह बातों का
एक विषय जरुर निकल आता है. वैसे उसे विषय से अधिक
ताना कहना ज्यादा उचित होगा.
वह यह कि "अरे वहां तो स्कूलों में पढाई ही कहाँ होती है.
बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रहे हो. यहाँ देखो कितना पढ़ते हैं बच्चे".
पहले पहल उनकी इस बात पर मुझे गुस्सा आता था,
मैं बहस भी करती थी और समझाने की कोशिश भी करती थी.
पर अब मुझे हंसी आती है और मैं कह देती हूँ
"हाँ वहां एकदम मस्ती है कुछ पढाई नहीं होती".
बात तो हालाँकि मैं हंसी में उड़ा देती हूँ
परन्तु दिमाग में सवाल कुलबुलाते रहते हैं कि
आखिर किस पढाई पर गर्व करते हैं हम ? किस मुगालते में रहते हैं ?
और वहां से निकलना क्यों नहीं चाहते ?
(19)
आज मैं आपको बाजार में बहुतायत से मिलने वाले मेथी के साग को बनाने की विधि बता रही हैं-श्रीमती अमर भारती
(20)
अंकित पृष्ठों में करो, निज मन के उद्गार।
संचित कर रख लीजिए, ये अनुपम उपहार।।
वन्दन माता का करो, पा जाओगे ज्ञान।
खुश होकर देंगी वही, प्रज्ञा का शुभदान।।

19 comments:

  1. बहुत बढ़िया चर्चा .... आभार

    ReplyDelete
  2. मेहनत से तैयार/तलाश किये गये लिंक

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर चर्चा...अच्छे लिंक्स|

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर चर्चा !!!

    ReplyDelete
  5. बड़े ही सुन्दर सूत्रों से सजी चर्चा।

    ReplyDelete
  6. परिश्रम से तैयार की गई उत्कृष्ट चर्चा के लिए आभार!
    --
    कार्टून का लिंक नहीं आ रहा था। अब सही कर दिया गया है!

    ReplyDelete
  7. प्रबुद्धता की कड़ी में फिर एक सुन्दर प्रयास ,अच्छा लगता है आपका कव्य व संकलन अनुशीलन .....बधाईयाँ जी

    ReplyDelete
  8. बहुत बढ़िया चर्चा .

    ReplyDelete
  9. सुन्दर चर्चा .

    ReplyDelete
  10. अच्छी चर्चा है।
    आद. शास्त्री जी के साथ हुई मुलाकात को भी यहां शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार

    ReplyDelete
  11. बहुत सुन्दर लिंक संयोजन्।

    ReplyDelete
  12. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स का संयोजन किया है आपने जिनके साथ मेरी रचना को स्‍थान देने के लिए आभार ।

    ReplyDelete
  13. सुंदर लिंक्स से सजी रोचक चर्चा..आभार

    ReplyDelete
  14. चुने हुए उम्दा लिंक्स !

    ReplyDelete
  15. बहुत आभार आपका....आपका चयन सर्वथा उपयुक्त होता है.

    ReplyDelete
  16. सार्थक चर्चा... सुन्दर लिंक्स...
    कुछ लिंक्स पर कमेन्ट नहीं पोस्ट हो रहा है... पता नहीं क्या गड़बड़ है...
    सादर आभार...

    ReplyDelete
  17. bahut badhiya charcha. upyogi posts padhne ko mili.

    rajbhasha blog se meri post MAHADEVI Shrinkhla ko yaha sthan dene ke liye aabhar.

    ReplyDelete
  18. रविकर जी,
    मेरे पोस्ट -प्रतिस्पर्धा- को चर्चामंच में शामिल करने
    के लिए आभार,.!!!!!!!
    सुंदर लिंक्स चर्चामंच में सजाने केलिये बधाई,....

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin