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Monday, May 03, 2010

कुछ कड्वे सच -------------(चर्चा मंच-141)

चर्चाकारा -------------वन्दना गुप्ता
  Amit Sharma ओ माँ क्या तुम झूंठ बोलती थी
ओ माँ क्या तुम झूंठ बोलती थी तुमने  कहा था दुनिया बड़ी प्यारी है कहा था यहाँ खिली प्रेम की क्यारी है पर मुझे तो हर बात दिखती न्यारी है हर और फैली नफरत और गद्दारी है ओ माँ क्या तुम झूठ बोलती थी तुमने कहा था प्रेम की नदी
(कविता) - वसीयत
Share लिख दी है वसीयत मेंने बेटे बेटी के नाम आज बढ़ा चढ़ा के क्या लिखूं अभी तलक का कमाया ही साफ़ लिख दिया है करीने से खुद ही सफेद पाठे पर नीली स्याही सेबँटवारा बराबरी का किया है मैंने लड़ने की बात रखी ना बाकीबड़े को ब्लॉगर,बेटी को ऑरकुटपत्नी


अपनी माटी

मैं मर्द हूं .... तुम औरत..!!


मैं भेड़िया, गीदड़, कुत्ता जो भी कह लो, हूं. मुझे नोचना अच्छा लगता है. खसोटना अच्छा लगता है. मुझसे तुम्हारा मांसल शरीर बर्दाश्त नहीं होता. तुम्हारे उभरे हुए वक्ष.. देखकर मेरा खून रफ़्तार पकड़ लेता हूं. मैं कुत्ता हूं. तो क्या, अगर तुमने मुझे जनम दिया है. तो क्या, अगर तुम मुझे हर साल राखी बांधती हो. तो क्या, अगर तुम मेरी बेटी हो. तो क्या, अगर तुम मेरी बीबी हो. तुम चाहे जो भी हो मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरी क्या ग़लती है? घर में बहन की गदरायी जवानी देखता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. तो तुमपर अपनी हवस उतार लेता हूं. घोड़ा घास से दोस्ती करे, तो खायेगा क्या? मुझे तुमपर कोई रहम नहीं आता. कोई तरस नहीं आता. मैं भूखा हूं. या तो प्यार से लुट जाओ, या अपनी ताक़त से मैं लूट लूंगा.


AnbhigyA

सोचकर तो देखें
कभी सोचते हैं हमफाइव-स्टार होटलों मेंछप्पन-भोग खाने से पहलेकि कितने ही लोगएक जून रोटी के बगैरतड़प-तड़प के मरते हैं ।कभी सोचते हैं हमआलीशान मालों मेंकीमती कपड़े खरीदने से पहलेकि कितने बच्चे और बूढेफटे -चीथड़े लपेटेगर्मी में झुलसतेसर्दी में ठिठुरते हैं
feminist poems
खूंटियों पर टंगी श्लीलता .......
 कविता अगर आपके मानसपटल पर बज्रपात नहीं करती तो महज आपके विचारों का तहखाना बनकर रह जाती है ....पिछले दिनों ब्लॉग जगत के कुछ युवा रचनाकारों ने सर्जना के प्रांगण में नए धरातलों को छूने का प्रयास किया है .... मुद्दत बाद पिछले दिनों चेतना - मंथन वाली कुछ ऐसी…………
Harkirat Heer
मात्र एक डोर
कल्पना की पतंग सोच की डोर  से बाँधउड़ा  दी थी  मैंनेअनंत में | पर  तुम्हारीसोच के मांझे नेकाट दी थीमेरी डोरधराशायी  होते हुएपतंग मेरीअटक गयी थीसमाज रुपीबिजली के तारों में       
      गीत...............
अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-5-----(विनोद कुमार पांडेय)
ग्रह,नक्षत्र अनुकूल हो,मंदिर जाते रोज|घर में माँ भूखी रहे,बाँट रहे वो भोज||सब अपने में लीन है,अजब -गजब हालात|ऐसे तैसे काटते,बाबू जी दिन रात||बस रोटी दो जून की, हिस्से दादी के |कंप्यूटर ने छीन ली,किस्से दादी के||नाती पोते समझते,हैं उनको अब भार| | अंधे॥………।
मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने
औरत : आज 01-मई की सुबह, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की 30 अप्रैल की पोस्ट से प्रेरित, आभार सहित
यह श्रम दिवस पर श्रम को समर्पित एक पोस्ट है, जो ख़ासकर महिला श्रम के नाम है। सुबह-सुबह ज्ञानदत्त जी की गंगा तट की घुमक्कड़ी से जन्मी 30 अप्रैल की पोस्ट को देखा, यह रचना तैयार हो गयी, मगर दिन भर बिजली की आँखमिचौली से पोस्ट करने का सुअवसर नहीं मिला। जो अच्छा….।
SANGAM TEERE
उदगार नहीं यह प्रश्नपत्र है
उदगार नहीं यह प्रश्नपत्र है पढ़िए जरा संभलकर प्रतिदिन की तरह समाचारपत्र आया,प्रमुख खबरों पर नजर दौड़ाया;परन्तु पढ़ते ही सिर चकराया.अरे! यह क्या हुआ? क्यों हुआ?ऐसा हादसा सावित्री के साथ. हाँ भाई! उसी सत्यवान की सावित्री के साथजिसे समाज भारतीय संस्कृति का……..
उदगार नहीं यह प्रश्नपत्र है
उदगार नहीं यह प्रश्नपत्र है पढ़िए जरा संभलकर प्रतिदिन की तरह समाचारपत्र आया,प्रमुख खबरों पर नजर दौड़ाया;परन्तु पढ़ते ही सिर चकराया.अरे! यह क्या हुआ? क्यों हुआ?ऐसा हादसा सावित्री के साथ. हाँ भाई! उसी सत्यवान की सावित्री के साथजिसे समाज भारतीय संस्कृति का
pragyan-vigyan
स्त्री पर ही क्यों किये गांधी ने प्रयोग?

बात मेरे मन की   नुक्कड़
* (उपदेश सक्सेना)* महात्मा के नाम से संबोधित किये जाने वाले गांधीजी की स्त्री के प्रति आसक्ति को लेकर उनकी शहादत के कई दशकों के बाद अब एक बार फिर बहस चल रही है।यह ग...
नारी जीवन - तेरी यही कहानी!
posted by रेखा श्रीवास्तव at नारी का कविता ब्लॉग
जीवन जिया, मंजिलें भी मिली, एक के बाद एक बस नहीं मिला तो समय नहीं मिला। कुछ ऐसे क्षण खोजती ही रही , जो अपने और सिर्फ अपने लिए जिए होते तो अच्छा होता। जब समझा अपने को कुछ बड़े मिले कुछ छोटे मिले कुछ आदेश और क...
दोस्तों,
आज की चर्चा को यहीँ विराम देती हूँ।
अपनी तरफ़ से कुछ हट्कर देने की कोशिश कर रही हूँ हर बार्……………आपकी कसौटी पर खरी उतरने की कोशिश कर रही हूँ फिर भी किसी भूल-चूक के लिये क्षमाप्रार्थिनी हूँ।

7 comments:

  1. वन्दना जी को इस उम्दा चर्चा के लिए बहुत बधाई.

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  2. सारगर्भित चर्चा के लिए वन्दना जी को बधाई!

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  3. सुंदर चिट्ठा चर्चा..वंदना जी बधाई

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  4. बहुत सुंदर.

    रामराम.

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  5. सुंदर चिट्ठा चर्चा..
    वंदना जी बधाई....

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  6. महत्त्वपूर्ण लिंक्स देने के लिए शुक्रिया...अच्छी चर्चा के लिए वंदना जी को बधाई

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  7. बहुत मेहनत से की है आपने चर्चा

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