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Sunday, May 09, 2010

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो छिटकाय।

 नमस्कार मित्रों!

संस्मरण


डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ सुना रहे हैं कि वे बाबा नगार्जुन के साथ काव्य-पाठ करने वाले सौभाग्यशाली थे। हुआ यों कि महर्षि दयान्द विद्या मन्दिर, टनकपुर के प्रबन्धक/संचालक राम देव आर्य बाबा से मिलने के लिए खटीमा आये। उन्होने बाबा से प्रभावित होकर उनके सम्मान में एक गोष्ठी अपने विद्यालय में रख दी। उन्हें टनकपुर ले जाने का दायित्व शास्त्री जी को दिया गया। खटीमा से टनकपुर की दूरी 25 कि.मी. की थी।  मस्त मौला बाबा को स्कूटर की सवारी करनी थी। बाबा के  जिद्दी स्वभाव के आगे शास्त्री जी की एक न चली। शास्त्री जी को उन्हें स्कूटर पर ही ले जाना पड़ा।   … और काव्य गोष्ठी में बाबा ने सुनाया
‘‘कालिदास, सच-सच बतलाना!
इन्दुमति के मृत्युशोक से,
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास, सच-सच बतलाना!’’
शास्त्री जी कवि गोष्ठी में आपने क्या सुनाया था, ये भी तो बताते।
मेरा फोटोदुनिया में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के इंसान है। हमेशा हर अच्छा दिखने वाला अच्छा और बुरा दिखने वाला बुरा ही हो , यह जरुरी नहीं! हर इंसान अपने भीतर राम और रावण को साथ लेकर जीता है, जो उसे क्रमशः अच्छे और बुरे कर्म करने को प्रेरित करता है। इस आह! और वाह!! के बीच वाणी गीत बता रही हैं कि तमाम बुराईओं के अपने फन उठाये खड़े होने के बावजूद इंसानियत मरी नहीं है।
एक संस्मरण के ज़रिए वो बता रही हैं कि कुछ लोग हैं जो इंसान और इंसानियत पर विश्वास को अविश्वास में बदलने नहीं देते। ईश्वर इन्हें बनाये रखे!
''गुरूजी, यह नोट आपको घूस के रूप में नहीं दे रहा हूँ, बल्कि मेरी कॉपी को ठीक से जांचने के लिए दे रहा हूँ। कृपया मेरी कॉपी ठीक से जांचियेगा"।
मेरा फोटोये चिट पर लिखा था। चिट कॉपी के अंदर से निकली जो शेफाली पांडे जी को बोर्ड परीक्षा की कॉपियां जांचते समय मिला। साथ में ५०० रुपये का नोट था। आपको लगता नहीं कि यह वाकया छात्र - अध्यापक के मध्य बढ़ती अविश्वास की खाई को स्पष्ट करता है। ऐसी नौबत क्यों कर आई होंगी? क्या छात्र जानते हैं कि परीक्षक ज्यादा कॉपियां मिलने के लालच में आँखें बंद करके कॉपियां जांचते हैं?
जो भी हो शेफाली जी ने ठीक से कॉपी जांची। परिणामस्वरूप  उसके पचास में से उन्चास नंबर आए।  यदि छात्र ऐसा नहीं लिखता तो शायद उसके इतने नंबर नहीं आते।  छात्र की आशंका निर्मूल नहीं निकली।
अंग्रेज़ी, अर्थशास्त्र एवं शिक्षा-शास्त्र (एम. एड.) विषयों से स्नातकोत्तर, लेकिन जिसके प्राण हिंदी में बसते हैं, उस शिक्षक की कलम से गणित अंग्रेज़ी दोऊ खड़े शीर्षक संस्मरण के द्वारा जानिए आज की शिक्षा पद्धति पर उनके विचार।
मेरा फोटोकई बार यात्रा में हमें कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं जो हमें काफ़ी सीख और ढ़ेर सारी प्रेरणा दे जाते हैं। कानपुर से जबलपुर जाते वक़्त रेखा श्रीवास्तव जी को ऐसी ही एक महिला से साक्षात्कार हुआ जिनके मातृत्व, धैर्य, संकल्पशक्ति और लगन को नमन करते हुए कहती हैं कि ईश्वर उन्हें सफलता प्रदान करे।  ऐसी माँ जो एक जंग को अकेले ही लड़ने के निकल पड़ी है कौन उसे सलाम नहीं करेगा?  माँ तुम्हें सलाम!! 
बताती हैं कि ट्रेन के सफ़र में वह उनकी सामने वाले सीट पर बैठी थी। उनके साथ उनकी १२-१३ वर्ष की मानसिक विकलांग बेटी भी थे। उनकी बेटी स्तुति आँखें बंद किये बैठी थी और बार बार आने बालों में अँगुलियों से कंघी कर रही थी। पहले रेखा जी समझी की ये नेत्रहीन है लेकिन बाद में पता चला कि वह सिर्फ मानसिक विकलांग है। उसको अकेले संभालना आसन काम नहीं था।
रेखा जी ने बड़े संकोच के साथ उनसे पूछा की क्या आपकी  बेटी को कोई प्रॉब्लम है? 
मां का जवाब था
"हाँ ये नॉर्मल नहीं है, बिना मेरे कहीं जा नहीं सकती , मैंने इसको आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया है और अकेले ही इस रास्ते पर चल रही हूँ."
यूँ तो मां वन्दनीय होती ही हैं रेखा जी - मगर आपने जो कहानी बतायीं ऐसी मां वरेण्य हैं।
Recent Pictureमातृ दिवस के अवसर पर आंखों देखी एक अनोखी घटना लेकर आए हैं अंकित कुमार गौतम। कहते हैं
माँ का रूप ईश्वर का रूप होता है। ये न सिर्फ हम इंसानों पर बल्कि पशुओं पर  भी लागू होता है एवं सभी माएं चाहे वे मनुष्य हों या जीव जंतु अपनी संतान को दुष्टों से बचाना चाहती है। इस बात को प्रमाणित करने के लिए वे कुछ चित्रों के माध्यम से एक माँ का दिल बता रहे हैं। जयपुर में एक बन्दर की एक मोटर साइकिल से टक्कर हो गयी। उसके बाद वो छोटा बन्दर खड़े होने की भी हालत में नहीं था। पर मां बंदर ने उसकी कैसे रक्षा की वह तो आप इस पोस्ट पर देखिए। फिलहाल एक छवि।



आलेख

 

My Photoपी.सी. गोदियाल जी कसाब के बहाने कुछ सवाल उठा रहे हैं। पूछते हैं
उसे सजा-ए-मौत दी जा चुकी है। कसाब को जिन्दा पकडने की २.५ करोड प्रतिमाह के हिसाब से अब तक हमने तत्परता से कीमत चुकाई है, मगर कल जब यह बात समाचारों मे सुनी कि महाराष्ट्र सरकार आगे भी कसाब की सुरक्षा मे कोई कोताही नही बरतेगी और इसी उदारता से उस पर खर्च करती रहेगी, तो निश्चित तौर पर कुछ सवाल जहन मे कौंधने स्वाभाविक थे। मुझे चिंता हुई कि यह जो धन इस दरिन्दे पर दोनो हाथों से लुटाया जा रहा है, वह है किसका ? और उसे अब इसतरह उदारता पूर्वक दोनो हाथो से लुटाने का औचित्य क्या रह गया है?
एक प्रतिक्रिया आई है
हमारा कीमती धन उन उस पर जाया नहीं होना चाहिए और उसे जल्द से जल्द उसे फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए तभी इस सारी न्याय प्रक्रिया का कोई ओचित्य सिद्ध होगा। वर्ना तो सब बेकार है।
आपका क्या कहना है?
My Photoशब्द वह ईंट है जिस से मिल कर रचनाओं की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं बनती हैं। कवियों को अपनी रचना में शब्द-चयन के प्रति सचेष्ट रहना पड़ता है। एक ही शब्द के दूसरे पर्याय से काव्य में चमत्कार आ सकता है तो कभी घोर अनर्थ भी। शब्दों की अर्थ-वाहक क्षमता काव्य-शास्त्र में "शब्द-शक्ति या शब्द-वृति" कहलाती है। शब्द शक्तियां तीन प्रकार की होती हैं :- अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी  समझा रहे हैं कैसे आते हैं शब्दों से अर्थ
किसी भी भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियों का स्थान महत्वपूर्ण है। ये भाषा को रुचिर और संश्लिष्ट तो बनाते ही हैं उनके प्रभाव को भी तीब्रता देते हैं। हिंदी का विशाल मुहावरा कोश वस्तुतः लक्षणा वृति से ही प्रसूत है। कुछ मुहावरों की व्याख्या व्यंजना शक्ति के आधार पर की जाती है। आरम्भ से काव्य में चले आ रहे लक्षक शब्द व्यापक अर्थ ग्रहण कर मुहावरा बन गए और इनके क़ोश में निरंतर वृद्धि होती रही।
मनोज वाणी पर आपके कंप्यूटर के लिए सबसे अच्छे और मुफ्त सॉफ्टवेयरों का संग्रह, जिन्हें इस पोट के लेखक ने लंबे समयतक प्रयोगमें लाया है, प्रस्तुत है। यक़ीन मानिए ये एक संग्रहणीय पोस्ट है। खास कर उनके लिए जिन्हें तकनिकी जानकारी कम है।
My Photoचेतना, चिंतन और अन्तःकरण चतुष्टय व अध्यात्म वृत्तियों का महत्त्व समझा रहे हैं डा. श्याम गुप्त जी। कहते हैं प्रकृति या माया से समस्त तत्वों का निर्माण होता है जिससे जड़ व जीव जगत की उत्पत्ति होती है। परा, पुरुष या चेतन -स्वयं को प्रत्येक तत्त्व में चेतन रूप में स्थापित है तभी तत्व क्रिया योग्य होता है एवम निर्जीव सृष्टि से मानव तक का विकास क्रम बनता है।
योग आदि द्वारा सुद्रड़ व निर्मल अहं में कुसंस्कारों का उन्मूलन व सुसंस्कारों का प्रतिष्ठापन व श्रृद्धा, भक्ति आदि भावों के संचार किये जा सकते हैं। भक्ति द्वारा ईश्वर को आत्म समर्पण में इसी अहं को नष्ट किया जाता है। ईश्वर चिंतन व अध्यात्म, आत्म-ज्ञान द्वारा इसी अहं को सुद्रड़, सन्तुष्ट व सुकृत किया जाता है।
अंतःकरण के इन चारों स्तरों से छन कर ही मानव के विचार कार्य रूप में परिणत होते हैं| ईश्वर,ज्ञान, योग, भक्ति, परहित चिंतन आदि का उद्देश्य चेतना केप्रत्येक स्तर को सुद्रिड, सबल , निर्मल व अमल बनाकर अहं को नियमित करना है ,ताकि कर्म का प्रतिफलन सुकर्म के रूप में ही प्रवाहित व प्रस्फुटित हो, औरमानव का उत्तरोत्तर विकास हो | यही अध्यात्म वृत्तियों की महत्ता है।
मेरा फोटोनिरुपमा मामले में संतोष कुमार सिंह लगातार अपडेट दे रहे हैं। बता रहे हैं कि प्रियभाशु पर सिंकजा कसने लगा हैं औऱ कोडरमा एसपी इस मामले में नये सिरे से अनुसंधान प्रारम्भ कर दिया हैं। निरुपमा के घर जाने वाली गली का नामाकरण हत्यारिण माँ गली कर दी गयी हैं। लेकिन जैसे जैसे मुहल्ले वाले खुलते गये लगा यह मामला तो पूरी तौर पर ओपेन हैं। और इसको लेकर इतने कयास क्यो लगाये जा रहे हैं। मुहल्ले वासी को दुख हैं तो मीडिया की भूमिका को लेकर जिन्होने निरुपमा के परिवार को दोहरी मार दी हैं। बातचीत शुरु हुई तो ….. …. नहीं-नहीं मैं क्यूं बताऊं, आप खुद ही पढ लीजिए।
इसी विषय पर कुछ भी कभी भी कह देने वाले अजय कुमार झा कह रहे हैं निरुपमा तुम्हें इस तरह नहीं मरना चाहिए था। बेहद गंभीर विवेचना जो कहीं दिल को छूती है तो कहीं आंखें नम कर जाती है। और झकझोड़ती तो है ही। यह आलेख तथ्यों के साथ वास्तविक दर्शन देता है। कहते हैं ये हो हल्ला भी ज्यादा सिर्फ़ इसलिए मचाया जा रहा क्योंकि इससे कहीं न कहीं ये पत्रकार, मीडिया कर्मी , प्रशिक्षु पत्रकार और देश की सर्वोच्च संस्थानों में पढ रहे ऐसे सभी छात्र छात्राओं की छवि उनकी जीवन शैली पर भी एक बडा सा प्रश्न चिन्ह लगाता सा दिख रहा है । उसे जस्टीफ़ाई करने के लिए ही ये इतना बावेला मचा हुआ है ।
आज अचानक बीस साल बाद का कोई दिन कल्पना में दौड उठा है ,जब हर महानगरीय घरों में बेटियां कह रही होंगी कि हमने अपनीपसंद का साथी चुन लिया है , न सिर्फ़ चुन लिया है बल्कि उसकेसाथ जीवन के सभी पल बिता लिए हैं , तो ऐसे में खडा उसका बापउसकी मां क्या करेंगे , आखिर कितनी निरूपमाओं को कत्ल कियाजाएगा ? लेकिन बीस साल से पहले तो निरूपमाओं को अपनाजीवन बचाए रखना ही होगा न सिर्फ़ अपने बाप से , अपनी मां सेबल्कि ऐसे सभी प्रियभांशुओं से भी जो उनकी मौत के बास प्रपंचप्रलाप ही कर सकते हैं ॥
My Photoराज भाटिया जी का इस विषय में कहना है
अभी दो चार दिनो से मै "निरुपमा " के बारे मै पढ रहा हुं, कोई उस के मां बाप को दोषी करार दे रहा है, गालिया दे रहा है, कोई उस के दोस्त को दोषी करार दे रहा है, हमारी पुलिस हवा मै हाथ पैर मार रही है, ओर मिडिया ने उस परिवार को उस के दोस्त को कही भी मुंह दिखाने लायक नही छोडा, यह सब कमजोरी हमारी पुलिस की है जो पता नही कैसे पुलिस बन गई... अरे पुलिस हो तो पुलिस की तरह काम करो गुंडो की तरह से क्यो हर किसी को पकड कर वाह वाही लूट रहे है, ओर क्यो मीडिया को बेकार की बकवास करने के लिये मोका देते हो....मीडिया आज ओरो की बाते उछाल रहा है, भगवान ना करे कल हमारे साथ कुछ ऎसा हुआ तो यही मिडिया हमारी भी खिल्ली इसी तरह से उडायेगा,
"निरुपमा" के संग क्या हुआ, क्या नही हुआ किसी को नही पता, तो क्यो हम बेकार मै सभी को दोषी की नजर से देखे, हो सकता है मां बाप ने डांट हो?ओर उस ने आत्महत्या कर ली हो? अगर मेरी या आप की बेटी ऎसी खबर देगी तो क्या आप उसे शावाशी देगे? मै मारुंगा तो नही लेकिन शावाशी भी नही दुंगा... उसे डांटूंगा तो जरुर
मेरी मां मम्मा अगर यह आलेख मुझे पढना होता तो सिर्फ़ इन पंक्तियों के लिए पढता …
एक बार स्वामी विवेकानंद से किसी ने पूछा कि हमेशा माँ को इतना महत्त्व क्यों दिया जाता है तो उन्होंने उस व्यक्ति दे कहा कि ये दो किलो का पत्थर लो और इसे अपने पेट पर बांधकर शाम तक घूमों.जब तुम वापस आओगे तब मैं इसका उत्तर दूँगा.शाम को जब वह व्यक्ति वापस आया तो उसकी हालत खराब थी उसने कहाँ स्वामीजी आपकी शर्त ने तो मेरे प्राण ही निकल दिए तब विवेकानंद ने कहाँ सोचो यदि एस भर के साथ दिन भर में तुम्हारी हालत खराब हो गए तो तुम्हारी माँ ने तो एस भर को पूरे नौ माह तक खुशी –खुशी बर्दाश्त किया है इसलिए माँ कि महानता को सबसे ऊंचा दर्ज़ा हासिल है.

संजीव मीडिया कि दुनिया में बीते दो दशकों से सक्रिय हैं और विश्‍व मातृत्व दिवस पर जुगाली पर पोस्ट लगा कर कहते हैं
माँ के बारे में मशहूर शायर मुनब्बर राणा ने लिखा है:
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे खफा नहीं होती
मेरी ख्वाहिश है कि में फिर से फरिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि फिर से बच्चा बन जाऊँ


कविताएं

My Photoकभी-कभी अपने रिश्तेदार ही प्राण के ग्राहक हो जाते हैं। वर्तमान तो है ही, इतिहास और ग्रंथ-पुराण भी इसके गवाह हैं। आजकल ऐसा अक्सर चर्चा में रहता है कि अमुक को उसके रिश्ते वालों ने ही मार डाला। ऐसे में एक महाकाव्य के प्रसंग से सूत्र उठा कर अदा जी पूछती हैं कि क्या बहन को भाई के लिए काल जनना चाहिए ? या बहन को भाई का कल्याण सोचना चाहिए! इस विचार मंथन में उन्हें आज कंस की बहुत याद आ रही है! कहती हैं
इतिहास ने जिसे बहुत क्रूर और कपटी बताया है
बुराई का अवतार बना, अच्छाइयों को नकारा है
कहते हैं वो दुष्ट था, मैं भी यही समझ पायी हूँ
पर कुछ तो अच्छाई थी उसमें यही कहने आई हूँ
संसार में न कोई भला है न बुरा, केवल विचार ही उसे भला-बुरा बना देते हैं। वैसे इस कविता को पढकर कुछ लोग तो इसे कंस के कृत्य को जस्टीफाई करने वाली बात मनते हैं तो कुछ कहते हैं कि मासूमों का नृशंस हत्यारा कभी प्यारा भाई नहीं हो सकता।
मेरी छोटी सी दुनिया पर पी.डी. ने  बहुत ख़ूबसूरत गीत ओ देश से आने वाले बता “पैग़ाम-ए-मोहब्बत”! पोअट किया है। यह मुजफ्फर अली द्वारा कम्पोज किया हुआ एवं आबिदा परबीन द्वारा गया हुआ, "पैगाम-ए-मुहब्बत एल्बम से लिया गया है।
ओ देश बैल-गाड़ी के सामने बैल - Prashant Priyadarshiसे आने वाले बता
किस हाल में है यार-ए-वतन
वो बाग-ए-वतन, फ़िरदौस-ए-वतन
क्या अब भी वहां के बागों में
मस्तानी हवाऐं आती हैं
क्या अब भी वहां के पर्वत पर
घनघोर घटाऐं छाती हैं
क्या अब भी वहां की बरखाऐं
ऐसे ही दिलों को भाती हैं
ओ देश से आने वाले बता
पढिए और सुनिए भी।
My Photoइस दुनिया का सबसे खुबसूरत लफ्ज़ क्या है? अगर कोई डिम्पल माहेश्वरी जी से ये सवाल करे तो उनका जवाब होगा---माँ! वैसे हम सब का भी यही जवाब होगा क्योंकि इस दुनिया में सबसे अच्छी और प्यारी माँ है। इस दुनिया में सबसे खुबसूरत शब्द है माँ! इस दुनिया में सबसे खुबसूरत जगह है मेरी माँ की गोद!! इस दुनिया में सबसे खुबसूरत चीज है मेरी माँ की मुस्कराहट!!! मेरी माँ......!!! शीर्षक कविता के द्वारा बता रही हैं
वो टोकना वो प्यार से
समझाना तेरा
लड़की हूँ में
ये एहसास दिला कर
मर्यादाएं सिखलाना तेरा
क्यों में तेरे आसुओं का
मर्म न जान पायी
क्यों तेरे दर्द की
गहराई समझ न पायी माँ
लगे कहीं चोट
तो निकले आह
हर आह के साथ
दिल बोले माँ
कब ये काली घटायें बरसे
मेरा रोम रोम
तेरे प्यार को तरसे
इस धरा पर मां ईश्वर की प्रतिनिधि है, कितना भी कहें शब्द कम पढ़ जाते हैं। मदर्स डे को समर्पित इस कविता की भावनाओं की गहराई एवं मां को नमन!
मां को याद करते शिवांगी जी उन्मुक्त पर कहती हैं M for मम्मी!                     
जीवन की धूप कभी पड़ने न दी मुझ पर,
तुम थी हमेशा मौजूद मेरी छाया बनकर,
बचपन के दिन करती हूँ आज भी याद,
पूछ पूछकर की ये क्या और वो क्या,
किया करती थी तुमको परेशान,
याद है पल पल लेती थी, सब्र का इम्तिहान,
हरीश प्रकाश गुप्त की एक भाव-भीनी कविता पढिए विश्व मातृ-दिवस पर - माँ तुझे सलाम !!
माँ
बहुत  अच्छी लगती है
                                                                             
जब
सहलाती  है देह                                                                                
छोटे     सेबड़े होने                                                                                                         
और
बड़े  हो जाने तक                                                                           
अपने  बेटे की,                                                                                       
इस  क्रम में
मां की संवेदना                                                               
उसकी
अंगुलियों के पोरों से                                                                        
होती  हुयी
उतर जाती है
कलेजे में,                                                             और
समा जाती है
धड़कनों में।
मेरा फोटोइसी दिवस के अवसर पर राम कृष्ण गौतम कहते हैं
आपा-धापी, धूप-छाओं हर हाल में खुश रहती माँ।
घर से आंगन, आंगन से घर दिनभर चलती रहती माँ।
सबको दुःख में कान्धा देती अपने दुःख खुद पी लेती,
पत्नी, बेटी, सास, बहु कितने हिस्सों में बटती माँ।
चूल्हा, चक्की, नाते, रिश्ते सारे काज निभाती है,
रोली, केसर, चन्दन, टीका जाने क्या-क्या बन जाती माँ।
                                                             

पूजा, पथ, नियम, धरम सब कुछ औरों की खातिर ही,
हरछट, तीजा, करवा, कजली सारे पर्व मनाती माँ।
ईश्वर जाने कैसा होगा, माँ कहती वह नेक बहुत,
जब-जब वक़्त बुरा आया खुद ही नेकी बन जाती माँ।
My Photoविश्‍व मातृ दिवस पर राकेश मुथा प्रस्तुत कर रहे हैं मां प्यार करेगी।

                                   
आज तक न जान पाया उसका दर्द
जो मेरे सृजन  में भोगा उसने
वो हमेशा ही रही मुस्कुराती
और कराहती थी सिर्फ मेरे दर्द पर
अरविन्द मिश्र जी दुविधा में हैं  -- कौरव कौन कौन पांडव! सौ. श्री अटल विहारी वाजपेई प्रस्तुत करते हैं
कौरव कौन कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|
आतंक का साया हो तो शब्द और निखर जाते हैं। पढिए सधे शब्दों का कमाल नव गीत की पाठशाला में शशि पाधा की रचना कैसी यह हवा चली ?                               
डरी-डरी चौपाल है,
काँपती है हर गली।
कैसी यह हवा चली ?
किस दिशा से आ रही
बारूद की दग्ध गंध,
कब किसी ने तोड़ दी
प्रेम की पावन सौगंध?
भस्म सद्भाव है,
संवेदना घुली-गली।
कैसी यह हवा चली?
मेरा फोटोस्वप्निल कुमार 'आतिश' अपने परिचय में कहते हैं “उधार का एक नाम है ..कई साल हो गए किश्तें भरते हुए..अब तक चुका नहीं पाया!” गुलज़ार से प्रभावित हैं और उनके साथ खिंचवाया फोटो अपने ब्लॉग कोना एक रुबाई का पर लगा रखा है। आज प्रस्तुत कर रहे हैं रात की एक रात।
सिलवट सिलवट चाँद पड़ा है,
हर कोने पे तारे हैं ,
कुछ उल्काएं हैं जो गिरी हैं
बिस्तर के सिरहाने से ,
ओस की बूंदे सुलग रही हैं
बिस्तर के पाए के पास ,
तकिये के नीचे इक
मिल्की वे कि साँसे अटकी हैं...
जाने किसके साथ गुजारी
रात ने अपनी रात यहाँ ...!
मेरा फोटोजब हम गुलज़ार में होते हैं तो मन करता है कि फूलों से निकलने वाली ख़ुशबू को समेट लें, क़ैद कर लें अपने मन-जीवन में। वंदना जी ने ख़ुशबू को क़ैद कर लिया है। पर उन्होंने किस ख़ुशबू को क़ैद किया है मैं नहीं बताऊँगा नहीं तो राज़ ही खुल जायेगा। आप पढ़िए उनकी कविता।
हाँ , मैंने 
खुशबू को 
क़ैद कर लिया 
तेरी सोमरस 
छलकाती बातों को
मीठी -मीठी 
मुस्कानों को
हिरनी से चंचल
नैनों की चितवन को 
बिजली से मचलते 
पैरों की थिरकन को
तेरे मिश्री घुले 
मधुर अल्फाजों को 
मधुर- मधुर
गुंजार करते गीतों को
My Photoअपनत्व जी की पहेली जीवन के गूढ रहस्य को खोलती है
जो भाग्य को
सर्वोपरी मानते है
और हालात से
जूझते नहीं
वे जीवन को
पहेली तो मानते है
पर उसे कदापि
बूझते नहीं ।
 

 


ग़ज़लें

बात-बेबात पर डा. सुभाष राय प्रस्तुत कर रहे हैं अशोक रावत की पांच ग़ज़लें। उनकी गजलों में युगीन दुर्व्यवस्था, दिग्भ्रमित राजनीति और संस्कारहीन मानसिकता को नितांत नवीन, चिंतना-सम्मत सहजात भाषा सौष्ठव के साथ कभी व्यंग्य, कभी विक्षोभ और कभी शुभाशंसा के रूप में पूर्ण परिपक्वता के साथ शब्दायित किया गया है।                                       


1.
दुश्मनों से भी निभाना चाहते हैं
दोस्त मेरे क्या पता क्या चाहते हैं
साँस लेना सीख लें पहले धुएं में
जो हमें जीना सिखाना चाहते हैं
2.
रोज कोई कहीं हादसा देखना
अब तो आदत में है ये फजां देखना
उन दरख्तों की मुरझा गयी कोपलें
जिनको आँखों ने चाहा हरा देखना
3.
सारा आलम बस्ती का जंगल जैसा ही है
बदला क्या है आज, सभी कुछ कल जैसा ही है
गमलों में ही पनप रही है सारी हरियाली
बाकी सारा मंजर तो मरुथल जैसा ही है
4.
थोड़ी मस्ती थोड़ा सा ईमान बचा पाया हूं
ये क्या कम है मैं अपनी पहचान बचा पाया हूं
खुशबू के अहसास सभी रंगों ने छीन लिए हैं
जैसे-तैसे फूलों की मुस्कान बचा पाया हूं
5.
तय तो करना था सफर हमको सवेरों की तरफ
ले गये लेकिन उजाले ही अंधेरों की तरफ
साँप ने काटा जिसे उसकी तरफ कोई नहीं
लोग साँपों की तरफ हैं या सपेरों की तरफ

 


कहानी

My Photoएक बहुत ही अच्छी कहनी प्रस्तुत की है सोचालय पर सागर ने .. वसीयत।
तुम लड़कियां कोई अच्छी बात पूरा क्यों नहीं करने देती ? श्रीकांत सवाल करता है
क्योंकि हम उसके बाद उसमें बंध जाते हैं श्रीकांत
तो क्या तुम्हें बंधना पसंद नहीं ? श्रीकांत की बेसब्री बढ़ जाती है
है ना ! अच्छा चलो पानी में दोनों एक साथ अपनी परछाई देखते हैं....
श्रीकांत ने हामी भरी... दोनों ने पानी में एक साथ झाँका, कुएं का पानी बड़ा साफ़ था. अभावों के दिन थे पर एक ही फ्रेम में दोनों आ गए... परछाई में दोनों ने एक एक-दूसरे को देखा... साक्षी ने अपने तरीके से श्रीकांत को माँगा और श्रीकांत ने अपने जहां का कोना-कोना साक्षी को दे डाला... और इसी पल की तस्वीर दोनों के मन में सदा-सदा के लिए खिंच गए.

बस..!!

इस बार इतना ही…!!!

और अंत में …..

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो छिटकाय।                                  

टूटे तो फिर ना मिले मिले गांठ पड़ जाय।                                            

रहीम कहते हैं कि एक बार प्रेम का जुड़ाव हो जाए तो उसे तोड़ना नहीं चाहिए । जब प्रेम टूट जाता है तो फिर मिलता नहीं । और मिलता है तो गांठ पड़ ही जाती है ।

19 comments:

  1. मनोज कुमार जी !
    सुन्दर चर्चा के लिए बहुत-बहुत बधाई!

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  2. मनोज जी,
    आपने इतनी अच्छी चर्चा कि है कि क्या बताऊँ...
    सही मायने में चर्चा यही है..हमलोग जो करते हैं वो सिर्फ लिंक दे देते हैं ..
    सच में बहुत ही अच्छा लगा...
    आपका आभार...

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  3. शास्त्री जी मदर्स डे पर माँ को अर्पित ढेर सारी रचनाओं को समेटे यह चिट्ठा चर्चा और भी खास लगी...बधाई शास्त्री जी

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  4. बढ़िया और विस्तृत चर्चा के लिए आभार

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  5. behad achhi charcha..maa par dher sari rachnaon ka pata diya hai..bahut bahut shuqriya manoj ji...
    Matri divas ki hardik shubhkamnayen

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  6. मेहनत, लगन और निष्ठा से की गई उत्तम चर्चा।

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  7. मनोज कुमार जी !
    सुन्दर चर्चा के लिए बहुत-बहुत बधाई!

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  8. रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो छिटकाय। (chatkaye)
    टूटे तो फिर ना मिले (jude) मिले (jude) गांठ पड़ जाय।

    lakin ye panktiyan sahi nahin hai.

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  9. bahut hi sundar aur sahi tarike se charcha ki hai aapne jaise karni chahiye..........aabhar aapka........kafi links to yahin mil gaye.

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  10. बहुत विस्तृत और सुरुचिपुर्ण चर्चा, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  11. विस्त्रित और सुसज्जित चर्चा ।

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  12. बहुत ही बढिया चर्चा मनोज जी!
    आभार्!

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  13. सुन्दर चर्चा के लिए बहुत-बहुत बधाई!

    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

    वन्दे मातरम !!

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  14. मनोज जी , सुन्दर प्रस्तुति, बधाई---हां एक सुधार----
    ---अशोक रावत की ये ५ गज़लें नहीं हैं अपितु "कतए" हैं।

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"रंग जिंदगी के" (चर्चा अंक-2818)

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