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Saturday, March 12, 2011

"बंदे बस बंदगी की रवायत में मिला करते हैं" (चर्चा मंच-453)


मित्रों!
आज इं.सत्यम् शिवम जी बंगलुरु  गये हैं 
और शनिवार की चर्चा का जिम्मा मुझ पर है।
देखते हैं कि आज क्या हलचल रही ब्लॉगिस्तान में!
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सबसे पहले देखिए

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अह देखिए इन simte lamhen सिमटे लम्हों को-


ना खुदाने सताया
ना मौतने रुलाया
रुलाया तो ज़िन्दगीने
मारा भी उसीने..
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विषय पर ब्लॉगिंग के पुरोधाओं के विचार
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लो क सं घ र्ष  पर छपी है इस पुस्तक की समीक्षा-
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Unmanaa पर लेकर आईं है
श्रीमती साधना वैद्य अपनी माता जी की
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विचारों की शृंखला में आज है यह आलेख-

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और माधव तो हमारे ही इलाके में घूम रहे हैं-
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३० अप्रैल को हिंदी भवन दिल्ली में ब्लॉगर कुंभ 
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कोलकाता से मनोज कुमार जी प्रस्तुत कर रहे हैं
*आचार्य परशुराम राय* जी का

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नीरज जाट जी
प्रस्तुत कर रहे हैं
एक कुमाऊंनी गाँव- भागादयूनी का यात्रा वृत्तांत

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आप बी गुनगुनाइए न!
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दीपक मशाल जी कह रहे हैं-
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मानो परिंदे निकले हैं तिनको कि तलाश में 
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जाने-माने ब्लॉगर --- ललित शर्मा बता रहे हैं-
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पता नही क्या हो रहा था? 
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*उजाले आजकल तुम* *कहां खो गये हो* 
*मुंह छुपा कर अपना* *किन वादियों में सो गये हो।

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बंद नयनों से भी - दृष्टिगोचर होता है अब ...!! 
बिना आहट के भी - श्रुतिपूर्ण है सब ..!! 
अनाहत नाद सा या - भीतर चिर शोभायमान - ज्योति पुंज सा ..!
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आज के लिए बस इतना ही!

2 comments:

  1. अरे ! यह चर्चा इतनी सुन्दर .... और उपयोगी.. नजरों से ओझल कैसे रह गयी...

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