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Sunday, November 24, 2013

बुझ ना जाए आशाओं की डिभरी ........चर्चामंच के 1440 अंक में आपका स्वागत है …

ये जो जंगल में दिख रहे हैं
खिले हुऐ दर्दीले फूल
अनगिनत आँख से टपके
कतरों से खिले हैं
फाड़कर चली गईं थी तुम
आहटों के रेशमी पर्दे
यादों की जंग लगी सुई से
आज ही सिले हैं
सरसराती हवाओं से कहीं
बुझ ना जाऐ
आशाओं कि डिभरी
दरवाजे अधखुले रखे हैं -------
           
                       "ज्योति खरे"

मैं ज्योति खरे आज पहली बार चर्चामंच में कुछ चुनिंदा लिंक्स
सहेजकर लाया हूँ----आप सभी का अभिनन्दन करता हूँ
आग्रह इन्हें पढ़कर अपने विचार दें ---
आभार
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http://lifeteacheseverything.blogspot.in/
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http://guzarish6688.blogspot.in/2013/11/blog-post_23.html
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http://dineshkidillagi.blogspot.in/
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http://amritatanmay.blogspot.in/2013/11/blog-post_21.html
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http://nishakidisha.blogspot.in/2013/10/blog-post_21.html
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http://allexpression.blogspot.in/
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http://rekhajoshi.blogspot.in/2013/11/blog-post_23.html
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http://sadalikhna.blogspot.in/2013/11/blog-post_867.html
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http://sapne-shashi.blogspot.in/2013/11/blog-post_7.html
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http://meri-parwaz.blogspot.in/2013/11/blog-post_22.html
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http://merehissekidhoop-saras.blogspot.in/
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http://www.praveenpandeypp.com/
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http://rooparoop.blogspot.in/2013/11/blog-post_20.html
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http://shikhakriti.blogspot.in/2013/11/blog-post_18.html
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आगे देखिए "मयंक का कोना"
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दुख की बदली में घिरा, तेजपाल का तेज।
रास न आयी तरुण को, सोमा जी की सेज।।
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अब जगजाहिर हो गया, तेजपाल का कृत्य।
पुलिस जाँच-पड़ताल से, साबित होगा सत्य।।

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रविकर की कुण्डलियाँ

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Akanksha पर Asha Saxena

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काम कुछ करते नही बातें बनाना जानते हैं।
हम तो नेता हैं फकत जूते ही खाना जानते हैं।।

मुफ्त का खाया है अब तक और खायेंगे सदा,
जोंक हैं हम तो बदन का खून पीना जानते हैं।
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मु़मुकिन हो के न हो !!!!

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अपनी बात...पर वन्दना अवस्थी दुबे 

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बावरा मन पर  सु..मन(Suman Kapoor) 

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My Expression पर  Dr.NISHA MAHARANA

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Sudhinama पर sadhana vaid 

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आखेटक !! 
क्या तुम्हें आभास है ? 
कि तुम! 
मृगमरीचिका की जिजीविषा में 
किसी का आखेट कर 
जीवन यापन की मृगया मे 
भटकते हुये मदहोश हो...
नूतन ( उद्गार) पर Annapurna Bajpai 

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झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव 
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हवाओं,
मेरे बुझने पर मत इतराओ,
अभी मेरा अंत नहीं हुआ है.
अभी मुझमें थोड़ा तेल बाकी है,
अधजली बाती अभी शेष है,
मुझे इंतज़ार है किसी लौ का
जो मुझे फिर से प्रज्जवलित करे.
कविताएँ पर Onkar

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हंसती हुई डगर पर मन रोता होगा... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक

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बालकृति 
"हँसता गाता बचपन" से
 
चिमटे जैसी भुजा बनी हैं,
प्यारी सी दुम धनुष-कमान।
विष से भरा दंश है घातक है,
जैसे हो जहरीला बाण।।

कमर मंथरा जैसी टेढ़ी,
परसराम जैसी आदत है।
प्रीत-रीत यह नहीं जानता,
इसको छूना ही आफत है।।
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(पहली किस्त )
चिकित्सा क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है। खून में चर्बी सबके घुली रहती है। एक सीमा से आगे ये दिल के लिए ठीक नहीं रहती है लेकिन चर्बी भी दो तरह की है। अच्छी और बुरी। कुल चर्बी कितनी है खून के प्रति १०० डेसीलीटर में यह तो अहम है ही इसके अलावा अच्छी और बुरी चर्बी का परस्पर अनुपात कितना है यह विधाई भूमिका निभाता है आपके दिल की सेहत के निर्धारण में...
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समंदर किनारे रेत पर
चलते चलते यूं ही

अचानक मन किया
चलो बनाए
सपनों का सुंदर एक घरौंदा
वहीं रेत पर बैठ
समेट कर कुछ रेत
कोमल अहसास के साथ
बनते बिगड़ते राज के साथ
बनाया था प्यारा सा सुंदर 
एक घरौंदा................
सृजन मंच ऑनलाइन  पर  Annapurna Bajpai 
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लो जी फिर आ गया नुस्खे वाला 
(१)खनिजों (खनिज लवणों )minerals का बेहतरीन  स्रोत है गुड़  
(Jaggery)अलावा इसके ये खून को साफ़ रखने तथा हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाने में बड़े काम की चीज़ है । चीनी के स्थान पर गुड़ का प्रयोग करके देखो तीन महीने में नतीज़े आ जायेंगे आपके अनुकूल...
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'आहुति' पर sushma 'आहुति'

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तरुण तेजपाल या आशाराम जैसे लोग समाज और कानून को इतना कमजोर और गधा क्यों समझते हैं? आशाराम कहते थे कि मैडम और उन के सुपुत्र के इशारे पर मुझे फंसाया जा रहा है। अब यही राग तरुण तेजपाल भी आलाप रहे हैं कि राजनीतिक कारणों से मुझे फंसाया जा रहा है। तो क्या जो पश्चाताप के वह माफ़ी के स्वर थे, एडीटरी ६ महीने के लिए छोड़ने का जो शहीदाना ज़ज़्बा था, वह फ़र्ज़ी था? कि कानून की एक नज़र पड़ते ही सब धूल चाट गया...

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29 comments:

  1. उम्दा लिंक्स और विभिन्न विषयों पर सार्थक चर्चा |
    मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |
    आशा

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  2. आपका स्वागत है आदरणीय ज्योति खरे जी।
    पहली चर्चा आखिरकार आपने लगा ही दी।
    आशा है कि आगामी रविवार को चर्चा लगाने में
    आपको ज्यादा कठिनाई नहीं आयेगी।
    --
    शुभकामनाएँ।

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  3. वैसे तो चर्चा मंच के हमारे सभी सहयोगी चर्चाकार लिंक लगाने में पारंगत हैं।
    लेकिन फिर भी चर्चा लगाने के कुछ गुर आज किसी समय "उच्चारण" पर
    एक पोस्ट बना कर लगा दूँगा।
    जिससे चर्चा एक समान दिखाई देगी और बहुत लोगों को
    इससे कुछ न कुछ लाभ जरूर मिलेगा।

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  4. बहुत सुन्दर लिंक्स संयोजन किया है .. बधाई पहली चर्चा के लिए...

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  5. सुन्दर चर्चा!
    आभार!

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  6. सांसद छुट्टा सांड है जनता निरीह गाय ,

    सांसद मूषक राज है लोकतंत्र को खाय ,

    लोकतंत्र -स्तम्भ

    निसिदिन कुतर कुतर के खाय ,

    भैया कुतर कुतर के खाय ,

    बिन खाय रहा न जाय ,

    खुट्टल दांत होई जाय।

    एक प्रतिक्रिया ब्लॉग पोस्ट :

    http://kpk-vichar.blogspot.in/2013/11/blog-post_14.html?showComment=1385272051713#c6055353225272327019

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  7. मतलब साफ़ है कि
    अगर समय खुद ही आगे बढ़कर
    ट्विस्ट करना चाहे तो
    उसका सरप्राइज


    कुछ भी हो सकता है
    और रही बात अपने प्राइज की तो
    वो भले ही अपना वैल्यू खो दे
    पर अपना कॉन्ट्रोवर्सि
    कभी भी नहीं खो सकता है .

    यही है बॉटम लाइन इस रचना की।

    कुछ भी हो सकता है ...

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  8. मोदी के इस दौर में दुश्मन हुए अनेक ,

    देवासुर संग्राम वाही बचे जो नेक।

    सुन्दर है चुनावी दोहावली उस दौर में जब चारों और से मोदी को डेमोनाइज़ करने की कोशिशें बकरी मेमना की और से ज़ारी हैं।

    वोट , वोटर [दोहावली]

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  9. सुन्दर है भावाभिव्यक्ति।

    याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन...

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  10. सुन्दर है भावाभिव्यक्ति।

    वर्तमान को जीना ही होता है, हम उससे भाग नहीं सकते हैं। वर्तमान का जो क्षण हमारे सामने उपस्थित है, उसे हमें पूर्ण करना है, उसका पालन करना है। ऐसा नहीं करने से वह हमारे ऊपर ऋण सा बना रहेगा, कल कभी न कभी हमें उसे जीना ही होगा, स्मृति के रूप में, समस्या के रूप में, विकृति के रूप में, और तब हम उस समय के वर्तमान को नहीं जी रहे होंगे। वर्तमान को वर्तमान में न जीने के इस व्यवहार के कारण हम जन्मों का बोझ उठाये फिरते रहते हैं, अतृप्त, अपूर्ण, उलझे।

    मेरे लिये यही सात जन्मों का सिद्धान्त है, यही कर्मफल का सिद्धान्त है, यही अपरिग्रह के सिद्धान्त की पूर्णता है, यही आनन्द और मुक्त भाव से जीने का सिद्ध मार्ग है। चलिये वर्तमान में ही जीते हैं, पूर्णता से जीते हैं।

    और इस कलियुगी वर्त्तमान का मूल मन्त्र है -हरे रामा ,हरे रामा ,रामा हरे हरे ,हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे ,....

    --
    अपरिग्रह - जन्मों का

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  11. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार चर्चा मंच-

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  12. शोषण करता देह का, इज्जतदार समाज।
    सम्पादक खुद लूटते, महिलाओं की लाज।।
    --
    धर्म वहाँ कैसे टिके, जहाँ घृणित हों काम।
    काम-पिपासा बढ़ रही, देख “रूप” का घाम।।

    पेज थ्री की लूट है लूट सके तो लूट ,

    बाहर बेहद शोर भाई अंदर से है मूट।

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  13. सार्थक एवँ सशक्त सूत्रों से सुसज्जित आज का चर्चामंच ! मेरी रचना को आप दोनों महानुभावों ने चयनित किया इसके लिये आभारी हूँ ! ज्योति जी आपका तथा शास्त्री जी आपका भी अनेकानेक धन्यवाद !

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  14. दिनभर बैठ निकालते, ये नरेश गर बाल |
    बनत बाल की खाल से, कम से कम इक नाल |

    कम से कम इक नाल, लगा घोड़े को देते |
    यू पी दुर्गति-काल, प्रगति पथ पर ले लेते |

    व्यापारी पर व्यंग, मिलावट करता जमकर |
    रहा चाय को कोस, बैठ बन्दा यह दिनभर ||

    (व्यंग्य )

    सुन्दर रचना कही है रविकर भाई ने .

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  15. चित्र व्यंग्य में कुमार काजल का कोई सानी नहीं।

    कार्टून :- तेजपाल, आसाराम और एक दुःस्वप्न

    काजल कुमार के कार्टून

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  16. बेहतरीन बेहतरीन बेहतरीन। सेकुलर किस्म के प्राणियों की आपने अच्छी खबर ली है।अपने आपको सेकुलर घोषित करने वाली यह होमोसेपियन्स की एक खतरनाक नस्ल है।

    --
    तो क्या तरुण तेजपाल की झांसेबाज़ी रंग लाएगी,
    कि जेल की हवा खिलाएगी ?
    तरुण तेजपाल या आशाराम जैसे लोग समाज और कानून को इतना कमजोर और गधा क्यों समझते हैं? आशाराम कहते थे कि मैडम और उन के सुपुत्र के इशारे पर मुझे फंसाया जा रहा है। अब यही राग तरुण तेजपाल भी आलाप रहे हैं कि राजनीतिक कारणों से मुझे फंसाया जा रहा है। तो क्या जो पश्चाताप के वह माफ़ी के स्वर थे, एडीटरी ६ महीने के लिए छोड़ने का जो शहीदाना ज़ज़्बा था, वह फ़र्ज़ी था? कि कानून की एक नज़र पड़ते ही सब धूल चाट गया...
    सरोकारनामा

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  17. सुन्दर है बाल कविता। खूब फले हैं राजनीति में सेकुलर बिच्छु

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  18. सुन्दर रचनात्मक लेखन।

    बाल साहित्य

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  19. अति सुन्दर प्रस्तुति है.. आप सबों को आभार..

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  20. सुंदर चर्चा ! बधाई ! आ. ज्योति जी.

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  21. अति सुन्दर प्रासंगिक स्ट्रिंग आपरेशन सी धारदार रचना। शुक्रिया ज़नाब की सद्य टिप्पणियों का।


    "बातें बनाना जानते हैं"

    काम कुछ करते नही बातें बनाना जानते हैं।
    हम तो नेता हैं फकत जूते ही खाना जानते हैं।।

    मुफ्त का खाया है अब तक और खायेंगे सदा,
    जोंक हैं हम तो बदन का खून पीना जानते हैं।
    उच्चारण

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  22. सुंदर चर्चा मंच , सभी कृतियाँ एक से बढ़कर एक है मेरी रचना इस मंच पर शामिल करने के लिए आपका हार्दिक आभार । मुझे आशा है आपके मंच के माध्यम से मेरे ब्लग को व मेरी रचनाओं को भी लोग पहचान सकेंगे ।

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  23. एक नये अंदाज की नयी चर्चा सुंदर !

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"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

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