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Monday, October 19, 2015

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘नाइटहुड’ सम्मान लौटते हुए क्या कहा था-----चर्चा 2034...

जय मां हाटेश्वरी... 
 कुछ समस्या के चलते आज  काफी दिनों बाद  चर्चा कर सका...
आज की चर्चा का आरंभ अवतार सिंह ‘पाश’  की एक अमर रचना से...
यह भी सिद्ध हो चुका है कि
इंसानी शक्ल सिर्फ चमचे-जैसी ही नहीं होती
बल्कि दोनों तलवारें पकड़े लाल आंखोंवाली
कुछ मूर्तियां भी मोम की होती हैं
जिन्हें हल्का-सा सेंक देकर भी कोई
जैसे सांचे में चाहे ढाल सकता है
लेकिन गद्दारी की सजा तो सिर्फ एक ही होती है
मैं रोने वाला नहीं, कवि हूं
किस तरह चुप रह सकता हूं
मैं कब मुकरता हूं कि मैं कत्ल नहीं करता
मैं कातिल हूं उनका जो इंसानियत को कत्ल करते हैं
हक को कत्ल करते हैं
सच को कत्ल करते हैं
देखो, इंजीनियरो! डॉक्टरो! अध्यापको!
अपने छिले हुए घुटनों को देखो
जो कुछ सफेद या नीली दहलीजों पर
टेकने से छिले हैं
अपने चेहरे की ओर देखो
जो केवल एक याचना का बिंब है
हर छिमाही दफ़्तरों में रोटी के लिए
गिड़गिड़ाता बिंब!
हम भिखारियों की कोई सुधरी हुई किस्म हैं
लेकिन फिर भी हर दर से हमें दुत्कार दिया जाता है
अपनी ही नजरों को अपनी आंखों से मिलाओ
और देखो, क्या यह सामना कर सकती हैं?
मुझे देशद्रोही भी कहा जा सकता है
लेकिन मैं सच कहता हूं, यह देश अभी मेरा नहीं है
यहां के जवानों या किसानों का नहीं है
यह तो केवल कुछ ही ‘आदमियों’ का है
और हम अभी आदमी नहीं हैं, बड़े निरीह पशु हैं
हमारे जिस्म में जोंकों ने नहीं
पालतू मगरमच्छों ने गहरे दांत गड़ाए हैं
उठो, अपने घर के धुओं!
खाली चूल्हों की ओर देखकर उठो
उठो काम करनेवाले मजदूरो, उठो!
खेमों पर लाल झंडे लहराकर
बैठने से कुछ न होगा
इन्हें अपने रक्त की रंगत दो
(हड़तालें तो मोर्चे के लिए सिर्फ कसरत होती हैं)
उठो मेरे बच्चो, विद्यार्थियो, जवानो, उठो!
देखो मैं अभी मरा नहीं हूं
यह एक अलग बात है कि मुझे और मेरे एक बच्चे को
जो आपका भी भाई था
हक के एवज में एक जरनैली सड़क के किनारे
गोलियों के पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है
आपने भी यह ‘बड़ी भारी
पुलिस मुठभेड़’ पढ़ी होगी
और आपने देखा है कि राजनीतिक दल
दूर-दूर से मरियल कुत्ते की तरह
पल दो पल न्यायिक जांच के लिए भौंके
और यहां का कानून सिक्के का है
जो सिर्फ आग से ही ढल सकता है
भौंकने से नहीं
क्यों झिझकते हो, आओ उठें…
मेरी ओर देखो, मैं अभी जिंदा हूं
लहरों की तरह बढ़ें
इन मगरमच्छों के दांत तोड़ डालें
लौट जाएं
फिर उठें, और जो इन मगरमच्छों की रक्षा करता है
हुक्म देने के लिए
उस पिलपिले चेहरे का मुंह खुलने से पहले
  उसमें बन्दूक की नाली ठोंक दें।--- 
अवतार सिंह ‘पाश’ 
--
दौलत के मद में कभी, होना मत मग़रूर।
खुद को वाद-विवाद से, रखना हरदम दूर।।
मानव ही तो जगत में, करता प्रकट विचार।
भगवन ने इन्सान को, दी है शक्ति अपार।।
पर रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
--
परMadan Mohan Saxena
-- 
परJyoti Dehliwal
-- 
परVirendra Kumar Sharma
--
लोग हरे सोच हरी
आत्मा हरी और
क्या बताऊँ
जो हरा नहीं भी था
वो सब कुछ हरा हो गया
इस सारे हरे के बीच में
जब ढूँढने की कोशिश
की सावन के बाद
बस जो नहीं बचा था
वो ‘उलूक’ का हरा था
परसुशील कुमार जोशी
-- 
परUpasna Siag
--
तभी अचानक
उनके लियें दावतें सजने लगी ; स्वर्ग की तरह,
और अचानक सभी ने
कुछ न कुछ पकाना सीख लिया
ताकि
उम्मीदों को खुश रखा जा सके ||

पर vinars dawane
--
‘हिंदुत्व की परिभाषा’ —  
उच्चतम न्यायालय का साल 1995 का वह निर्णय जिसके अनुसार हिन्दुत्व या हिन्दुइज़्म किसी धर्म का नहीं, भारतीय लोगों की सामान्य जीवन
शैली का नाम है.

 Ashok Pande 
------s1600/images<br>---

पैसे मांगते हैं
जैसे सहना हल्कू से
बर्बाद करते हैं समय
घंटों बैठकर
कॉलेज में,
उड़ाते हैं पैसे
पाते हैं खुशियाँ
लेकिन घर जाते ही
कहते है सबसे
पढ़ने दो मुझे
--
परAshutosh Dubey
--
चिंता भारत की स्त्रियों की ही नहीं विदेशों की स्त्रियों की भी है
 वो भी सामाजिक उत्पीडन की मारी है ....... 
खुले बाजार में बिक रही हैं ..कोई कुछ नहीं बोलता
चुप हैं ..बिलकुल चुप ... 
क्या पुरुष अपने वर्चस्व के लिए
 युद्धरत है मगर किसके प्रति ...?
वाह क्या खूब यहाँ पर पुलिसिया अंदाज है
छेड़छाड़ की पूछताछ .हत्या पर जुगाली है
घरानों और निशानों के अंतर भी देखिये
पैसे वालो की चली गरीब न्याय से खाली है
पर विजयलक्ष्मी 
--
-----s400/134949-004-CFEC70B2<br>----
इन्ही कारणों ने मुझे कष्टपूर्वक महामहिम से 
यथोचित सन्दर्भ और खेद के साथ 
यह कहने पर मजबूर किया है कि 
आप मुझे  नाइट की पदवी से भारमुक्त  कर दीजिये, 
जिसे मैंने  आपके पूर्वजों के हाथों 
कभी स्वीकार किया था 
और जिनकी सज्जनता की  अ
भी भी मैं सत्कारपूर्वक प्रशंसा करता हूँ.
आपका
रवीन्द्रनाथ टैगोर
--
पर arun dev
हम जब जब मिलें
धरती महक जाये
यौवन से इतरा उठे
बीज फूट पड़ें
पेड़ नृत्य करें
प्रेमीजन हमारी ओर देखें
और प्रेम करने को अधीर हो उठें
प्रभु मुस्कुराये और कहे की
दुनिया न देख सकेगी ये मिटटी 
--
पर Prabhat Ranjan
मंदिर के चौखट तक
चले जाते हैं कदम
हौले-हौले बजती हैं घंटियां
लोबान के धुएं में
छा जाती है मदहोशी
हो जाता है हल्का मन
नई सुबह आई है चुपके से !
--
पर राजीव कुमार झा
पर श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
---
धन्यवाद...

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