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Friday, October 02, 2015

"दूसरों की खुशी में खुश होना" (चर्चा अंक-2116)

आज की चर्चा में आपका हार्दिक अभिनन्दन है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तथा देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को श्रद्धापूर्वक नमन।
समाज में यह सामान्य प्रथा प्रचलित है कि समाज में, परिवार में अथवा विश्व में मानव के दुःख से हम विचलित होते हैं, दुःखी या पीड़ितजनों के लिए सहानुभूति रखते है और यथा सम्भव उनका दुःख दूर करने का प्रयास करते हैं। यह बात अलग है कि जितना करीब का रिश्ता उस व्यक्ति के साथ होता है उतनी ही सहानुभूति एवं सहायता हम उस व्यक्ति को देते हैं। एक कहावत भी प्रचलित है कि एक बार किसी के सुख में शामिल न हों परन्तु दुःख की घड़ी में अवश्य साथ देना चाहिये। एक अन्य कहावत है दुखी के साथ सहानुभूति करते समय मित्र या शत्रु की पहचान नहीं करनी चाहिये अर्थात् दुःख में सबके साथ शामिल होना चाहिये।
अब प्रस्तुत है आज की चर्चा में कुछ चुनिन्दा ब्लॉग लिंक्स। 
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!! श्रद्धापूर्वक नमन !! 
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सत्य,अहिंसा का पथ जिसने, दुनिया को दिखलाया।
सारे जग से न्यारा गांधी, सबका बापू कहलाया।। 

भाले-बरछी, तोप-तमञ्चे, हथियारों को छोड़ दिया,
देश-भक्ति के नारों से, जनता का मानस जोड़ दिया,
स्वतन्त्रता का मन्त्र अनोखा, तुमने ही बतलाया।
सारे जग से न्यारा गांधी, सबका बापू कहलाया।।
कविता रावत 
चल पड़े जिधर दो डग, मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि, पड़ गये कोटि दृग उसी ओर;
जिसके सिर पर निज धरा हाथ, उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गये उसी पर कोटि माथ।
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यशवंत यश
 
स्वनाम धन्य
 कुछ लोग
 जो कहने को
 पत्रकार
 कलाकार 
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जेन्नी शबनम
मेरा फोटो
मेरा शहर अब मुझे आवाज़ नहीं देता 
नहीं पूछता मेरा हाल 
नहीं जानना चाहता 
मेरी अनुपस्थित की वजह 
वक़्त के साथ शहर भी
डॉ जाकिर अली रजनीश
छोटी-छोटी बातें भी जीवन की गहराई को बयां कर देती हैं। ऐसी ही 06 छोटी-छोटी कहानियां यहां पर प्रस्तुत हैं, जो जीवन को खूबसूरत बनाने में बेहद मददगार हैं। ये कहानियां मुझे मेरे एक मित्र ने व्हाटअप पर भेजी हैं। आशा, ये आपको भी पसंद आएंगीं।
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डॉ निशा महाराणा 
सांध्यकालीन निशा ने 
अपनी धुन में मस्त 
निर्झरणी से पूछा ---- लोग आते हैं 
डुबकी लगाते हैं और 
चले जाते हैं ---
[निष्कम्प दीपक जलता रहा रात भर.... ]
दूसरे दिन का दफ्तर का वक़्त मुश्किल से कटा। इतने-इतने प्रश्न, शंकाएं, जिज्ञासाएँ कि बस, राम कहिये ! मैं लगातार यही सोचता रहा कि क्या आज रात मेरी माता से सचमुच बातें हो सकेंगी?
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रश्मि शर्मा
रात
पूरे आकाश में
अकेला था चांद
जैसे
पूरी का़यनात में
मैं
तुम बि‍न.....
ड़ा श्याम गुप्त
Drshyam Gupta's photo.
फिर आज माँ की याद आई सुबह सुबह |
शीतल पवन सी घर में आयी सुबह सुबह |

वो लोरियां, वो मस्तियाँ, वो खेलना खाना, 
ममता की छाँह की सुरभि छाई सुबह सुबह |
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साधना वैद
(१) 
दाता तेरे दान का, कोई ओर न छोर !
फिर भी डूबा लोभ में, पापी मन का चोर ! 
(२)
मालिक इतना दीजिये, जितनी है दरकार ! 
संचय के अपराध से, लीजे मुझे उबार !
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फ़िरदौस खान 
कभी किसी को बुरा नहीं कहना चाहिए... क्योंकि कई नास्तिक ख़ुदा के बंदों के लिए वो महान काम कर गए हैं, जो आस्तिक भी न कर पाए...
आज हमारी ज़िन्दगी बहुत आसान है... बिजली है, बिजली और तेल से चलने वाली तमाम सहूलियात की चीज़ें हमें मयस्सर हैं...
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वन्दना गुप्ता 
रोता है मेरा रब बुक्का फाड़ कर 
आह ! ये किस तराजू में तुल गया 
जहाँ अन्याय ठहाकें लगाता मिला 
बेबस न्याय ही कसमसाता मिला 
ये किन शरीफों की बस्ती में आ गया 
सुशील कुमार जोशी 
आयेंगे 
उजले दिन 
जरुर आएँगे 
उदासी दूर 
कर खुशी
निहार रंजन 
पिछले कुछ दिनों से सतपुरा के जंगलों में घूम रहा हूँ. प्रकृति के मध्य से सूर्य, चन्द्रमा और मौसम की मादकता पा रहा हूँ. कभी कभी उनकी तस्वीरें भी ले रहा हूँ. आज की कविता उन्हीं तस्वीरों की बानगी है.

ले लिया मौसम ने करवट
व्योम से बादल गए हट
कनक-नभ से विहग बोले
‘तल्प-प्रेमी' उठो झटपट
ले लिया मौसम ने करवट
वर्षा जी `
कल बापू की 147वीं सालगिरह मनाई जाएगी। बापू हमारे जीवन में इस कदर रचे-बसे हैं कि यूं तो हमारा हर काम उन्हीं पर जाकर खत्म और शुरू होता है। वे हमारी मुद्रा यानी नोटो पर हैं। हमारे अस्पताल के नाम उन्हीं पर हैं।
अनुपमा पाठक 
तारीखें लौटती हैं...
पर वो बीता पल नहीं लौटता... ! 
लम्हा जो बीत गया
वो,
बस स्मृतियों में,
बच जाता है...
मदन मोहन सक्सेना 
कल गाँधी जयन्ती है यानि २ अक्टूबर . शत शत नमन बापू आपको एक सवाल कि हम सब कितने बापू के कहे रास्तों पर चल रहे है या फिर रस्म अदायगी करके ही अपना फ़र्ज़ निभाते रहेंगें।
कल शाम जब हम घूमने जा रह रहे थे
देखा सामने से गांधीजी आ रहे थे
नमस्कार लेकर बोले, आखिर बात क्या है?
पहिले थी सुबह अब रात क्या है!
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महेश कुशवंश
गंगा में तैरेते हुये पार करना 
और उसमे निहित बाल सुलभ चेस्ठा ने 
तुम्हें महान बना दिया 
तुम्हारे मन मंदिर मे था साफ सफ़फाक हृदय 
कलम दवात से पट्टी पर लिखे 
मास्टर जी के शब्द
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धन्यबाद, फिर मिलेंगे। 

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