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शनिवार, जुलाई 14, 2018

"सहमे हुए कपोत" (चर्चा अंक-3032)

मित्रों! 
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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बाल कविता  

"पंछी"  

( राधा तिवारी "राधेगोपाल " ) 

नभ में सूरज है आता।
जाने कहाँ चन्द्र छिप जाता।

 पंछी छोड़ घोसलें आते।
 नभ में उड़ कर खुश हो जाते... 
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भले लोग संगीत की माधुरी के अलावा परम्परा की हूक भी है इस परम्परागत हरियाणवी बंदिश में। लेकिन आज के बदले हुए सन्दर्भों में जब मांग जांच को लेकर सनातन धर्मी भारत धर्मी समाज में पर्याप्त हंगामा है ,किसी लड़की का यूं मुंह खोलके मांगना -पीड़िया (यहां पीलिया में ल और ड़ के बीच की ध्वनि है ,ल के नीचे बिंदी जड़िये )या कोई और नेग थोड़ा अटपटा सा ज़रूर लगता है। हरियाणा जैसे राज्यों में तो लड़की के आने पे ही गर्भ पे पहरा है। लड़किया कमतर होती जातीं हैं। जहाज हवाई ही नहीं सात समुन्द्र की यात्रा कर रहीं हैं आज भारतीय नेवल फोर्सिज की युवतियां। मांग जांच कैसी। बदलो इन लोकगीतों को ढालों आधुनिक हालातों में इनकी शब्दावलियों को यही श्रेय का मार्ग है प्रेय के मार्ग में बहुत बाधाएं हैं सब माया ही माया बंधन ही बंधन हैं यहां। 

Virendra Kumar Sharma 
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----- ॥ दोहा-पद २० ॥ ----- 

  ----- ॥ गीतिका ॥ -----
हरिहरि हरिअ पौढ़इयो, जी मोरे ललना को पलन में.,

बल बल भुज बलि जइयो, जी मोरे ललना को पलन में., 



बिढ़वन मंजुल मंजि मंजीरी, 

कुञ्ज निकुंजनु जइयो, जइयो जी मधुकरी केरे बन में.....  
NEET-NEET पर Neetu Singhal 
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शिकायत थी जिंदगी से ...... 

शिकायत थी जिंदगी से कभी कोई हमनवां नहीं मिलता ....  
आज सोचती हूँ ( तो ) समझती हूँ कि मिलता है ,  
और अक्सर ही मिलता है ....  
बस कभी उनको तो कभी हमको समझ नही आता ....  
दोनों समझ सकें बस वो लम्हा नहीं मिलता .....  
निवेदिता 
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव 
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बर्लिन में भी  

‘नमूने’  

मिल ही गए 

*‘बर्लिन से बब्बू को’ -  
चौथा पत्र:  
चौथा हिस्सा*  
आज दिन में हम लोग खरीददारी के लिये बाजार में गए। खरीददारी क्या करनी थी, एक रस्म अदाई मात्र थी। जो कुछ थोड़े पैसे हमारी जेबों में थे, उनसे क्या लिया जा सकता था? कुछ भी तो नहीं। पर टी. वी. टॉवर के पास बना हुआ बर्लिन का मुख्य बाजार “सेन्ट्रम” अपने आप में एक विशालतम बाजार है। मेरा ऐसा अनुमान है कि इस बाजार में प्रतिदिन नहीं नहीं तो भी एक या डेढ़ करोड़ रुपयों का सौदा बिकता होता। अलग-अलग मंजिलों पर चित्रों द्वारा उन सभी चीजों के संकेत कर दिये गये हैं जो कि आप वहाँ खरीद सकते हैं। काउण्टरों पर सारा काम लड़कियाँ देखती हैं.... 
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 
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ग़ाफ़िल हूँ मुझको देखा ओ भाला करे कोई 

गर कर सके तो क्यूँ न उजाला करे कोई
लेकिन ये क्या के ख़ुद का रू काला करे कोई

ले ले कहाँ है यार किसी भी लुगत में अब
सो चाहिए के अब तो न ला ला करे कोई... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’  
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4 टिप्‍पणियां:

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