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Monday, January 13, 2020

"उड़ने लगीं पतंग" (चर्चा अंक - 3579)

सादर अभिवादन। 
सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 
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शब्द-सृजन-5 के लिये विषय है-
'पिपासा'
इस विषय पर आप अपनी रचनाओं का लिंक चर्चामंच की सोमवार से शुक्रवार (शाम 5बजे तक ) की किसी भी प्रस्तुति के कॉमेंट बॉक्स में प्रकाशित कर सकते हैं. 
आइए पढ़िए मेरी पसंद की कुछ रचनाएँ-
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गौरतलब है कि मातृभारती डॉट कॉम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जो 30 हज़ार से अधिक लेखकों की रचनाएं 1.5 लाख से अधिक पाठकों से साझा करने में सफल रहा है। यह एक वेबसाइट और एप के माध्यम से लोगों को जोड़ता है और साहित्य प्रेमियों के एक बड़े समूह को निशुल्क सेवा प्रधान करता है।
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मुठ्ठियाँ इन्क़लाबी उठीं जब कभी
ताज सबके मिले ख़ाक में क्या नहीं ?

जुल्म पर आज ’आनन’ अगर चुप रहा
फिर तेरे हक़ में कोई उठेगा नहीं
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हमने तो चाहा था दिल से, समझा न तुमने कभी हमें
रूठी है किस्मत हमसे आज, जीते तुम औ हम गए हार
बहुत हुआ अब आओ सनम, न लो अब इम्तिहान साजन
मर जायेगे बिन तेरे हम कर दो पिया बगिया गुलजार

मेरी फ़ोटो
इधर कुछ समय से फिल्मों के प्रचार के लिए एक नया तरीका चलन में है जिसके तहत फिल्म के कलाकार टी.वी. पर या विभिन्न जगहों पर जा अपनी आने वाली फिल्म का प्रचार करते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि जहां वे जा रहे हैं वह जगह ख्यात है या कुख्यात ! उनके लिए वह जगह सिर्फ चर्चित, ख़बरों में या लोकप्रिय होनी चाहिए, बस!
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My photo
देश अपना है लोग अपने है


फिर क्यों गिला है आपको

हम डिजिटल युग में कदम बढ़ा रहे है

हमें भी अपनी अलग पहचान बनानी है

नीत नए मिलने वाले ठेकेदारों को

अपनी पहचान बनानी है
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ढूंढो पहचानो उस मदारी को
देश युवावों के जुवारी को
समझो समझाओ उस विचार को
कु बुद्धि विवेक विकार को
फिर टुकडे भारत का करने का
कौन भरा रहा कुकृत्य धम्भ
बोलो ढपली वाले कौन हो तुम
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मारीना- विमोचन 5 जनवरी 2020

जेएनयू के फूल भरे रास्तों पर भागते हुए वरयाम जी से मारीना के किस्से सुनना, वहां की दीवारों पर लिखी इबारतों को देखना महसूस करना कि किस तरह दीवारें दीवारें नहीं रहतीं, इन्कलाब बन जाती हैं इश्क़ बन जाती हैं...
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Image may contain: flower and plant
●अब लाल मिर्च, हल्दी, सौंफ, खूब सारी कलौंजी, राई की दाल, नमक, काली मिर्च स्वादानुसार मिलाकर अचार मसाला तैयार कर लीजिए, यदि ये सब झंझट नही करना तो बाज़ार से तैयार अचार मसाला ले आईये
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आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले सोमवार. 

10 comments:

  1. किसका जाल किसका है भ्रम
    बोलो ढपली वाले कौन हो तुम...

    विविध रचनाओं से भरी आज की प्रस्तुति में यह रचना भी गजब का संदेश दे रही है । सत्य कहा आपने, ऐसे ढपलीवालों को पहचानने की आवश्यकता है, देश की एकता एवं अखंडता की रक्षा के लिए, सद्भावना के लिए ...।

    .सभी को प्रणाम।

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  2. बहुत सुन्दर और पठनीय लिंक।
    आपका आभार आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी।

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  3. बहुत सुन्दर चर्चा अंक।

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  4. हार्दिक आभार रविन्द्र यादव जी, मेरे मन की हूक को चर्चा मंच पहुंचाने का। चर्चा मंच के आज का अंक रोचक और सन्देशनात्मक है। आभार सभी मनिषयों का।

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  5. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  6. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति, लोहिड़ी,मकरसंक्रांति,
    पोंगलऔर उत्तरायण की हार्दिक शुभकामनाएं

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  7. बहुत ही सुन्दर सराहनीय प्रस्तुति.
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई.
    सादर

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  8. शानदार प्रस्तुति

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