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Wednesday, November 25, 2020

"कैसा जीवन जंजाल प्रिये" (चर्चा अंक- 3896)

 मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

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बालकविता  "कौआ होता अच्छा मेहतर"  

कौआ बहुत सयाना होता।
कर्कश इसका गाना होता।।


पेड़ों की डाली पर रहता।
सर्दीगर्मीवर्षा सहता।।

उच्चारण 
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  • तुम्हारे मीठे-तीखे शब्दों की एक
    खेप को बड़ा संभाल के रखा था।
    सोचाकभी मिलेंगे तो
    मय सूद तुम्हें लौटा दूंगी।
    अचानक कल तुम मिले भी
    अचेतन मन ने धरोहर टटोली भी।
    मगर तुम्हारी धरोहर लौटाने से पहले ही
    भावनाओं के दरिया की बाढ़ बह निकली।
    और मैं  चाहते हुए अनचाहे में ही सही
    फिर से तुम्हारी कर्ज़दार ही ठहरी। 
  • मंथन पर मीना भारद्वाज 
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प्रसिद्ध गायिका, संगीतकार एवं वरिष्ठ ब्लॉगर आदरणीया शुभा मेहता दीदी ने मेरे नवगीत 'मूरत मन की ' को अपना मधुर स्वर देकर संगीतबद्ध किया है। आदरणीया दीदी के स्वर में अपना नवगीत सुनकर मन भावविभोर हो गया।
आदरणीया शुभा दीदी का स्नेह और आशीर्वाद सदैव मेरे साथ बना रहे।
आप भी सुनिए मेरा नवगीत आदरणीया शुभा दीदी के सुमधुर कंठ से निसृत कर्णप्रिय स्वरलहरी-
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  •     आज कल के दौड के टूटते बिखरते रिश्तो को देख दिल बहुत व्यथित हो जाता है और सोचने पे मज़बूर हो जाता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? आखिर क्या थी पहले के रिश्तो की खुबियां और क्या है आज के टूटते बिखरते रिश्तो की वज़ह ? आज के इस व्यवसायिकता के दौड में रिश्ते- नातो को भी लाभ हानि के तराज़ू में ही तोला जाने लगा है. ज़िंदगी छोटी होती जा रही है और ख्वाइशे बड़ी होती जा रही है. मैं ये नही कहूँगी कि मैं आप को रिश्तो को संभालना सिखाऊंगी,उसको निभाने की कोई टिप्स बताऊँगी .मैं ऐसा बिलकुल नहीं करुँगी क्युकि " रिश्ते" समझाने का बिषय बस्तु नहीं है . रिश्तो को निभाने के लिए समझ से ज्यादा  भावनाओ की जरुरत होती है. रिश्तो के प्रति आप का खूबसूरत एहसास ,आप की भावनायें ही आप को रिश्ते निभाना सिखाता है और आज के दौड में इंसान भावनाहीन ही तो होता जा रहा है. मैं तो बस रिश्तो के बिखरने की बजह ढूढ़ना चाहती हूँ .   मेरी नज़र से-कामिनी सिन्हा 
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स्वामी-दास 

कोई स्वामी है कोई दास

 है अपनी-अपनी फितरत की बात

किसका ? यह है वक्त का तकाजा  

स्वामी माया का चैन की नींद सोता

 क्षीर सागर में भी

सर्पों की शैया पर ! 

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स्व - अनावरण 
देह पड़ी रहती
है पृथ्वी पर 
और
प्राण करता है 
नभ पथ
का विचरण, 
शांतनु सान्याल, अग्निशिखा  
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उपन्यास क्या लघुकथा तो होती ( तरकश )  सुबह भाषण दे रहे थे सरकार जनाब उनकी सरकार ने कमाल कर दिया है। ख़ास लोगों के रहने को ऊंचे ऊंचे महल बनवा दिए हैं। और कई नाम वाले भवन बनवा दिए हैं जाने किस किस को मरने के बाद कितना कुछ दिया है जो उनको जीते हुए शायद नहीं मिला शायद सोचा नहीं चाहा नहीं। बाद मरने के कितना कुछ उनके नाम है। ये खबर उस वास्तविक हालात को ढकने में सफल होती नहीं कि आज भी जीने की सुविधा का अभाव है लोग स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली से परेशान हैं सही समय पर ईलाज मिलता नहीं देश अंतरिक्ष में पहुंच गया धरती पर जीने की चाहत किसलिए 
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आज के लिए बस इतना ही...।
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10 comments:

  1. विविधरंगी विषयों पर आधारित रचनाओं से सजी सुन्दर सराहनीय प्रस्तुति मे मेरी रचना को सम्मिलित करने हेतु हार्दिक आभार सर !

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  2. बेहतरीन प्रस्तुति।

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  3. सजीव प्रस्तुतीकरण

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  4. बेहतरीन संकलन
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार

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  5. उम्दा चर्चा। मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  6. सुंदर बाल रचना के साथ पठनीय रचनाओं का संकलन, मेरी रचना को आज के अंक में शामिल करने हेतु आभार !

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  7. बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति

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  8. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति आदरणीय सर।
    मेरे सृजन को स्थान देने हेतु सादर आभार आदरणीय सर।
    सादर

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  9. सभी रचनाएँ अपने आप में असाधारण हैं सुन्दर संकलन व प्रस्तुति, मेरी रचना को स्थान देने हेतु आभार।

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  10. सुंदर चर्चा संकलन

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