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Sunday, November 22, 2020

"अन्नदाता हूँ मेहनत की रोटी खाता हूँ" (चर्चा अंक-3893)

 मित्रों।
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

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बालगीत  "जोकर खूब हँसाये" 
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जो काम नही कर पायें दूसरे,
वो जोकर कर जाये।
सरकस मे जोकर ही,
दर्शक-गण को खूब रिझाये।
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नाक नुकीली, चड्ढी ढीली,
लम्बी टोपी पहने,
उछल-कूद कर जोकर राजा,
सबको खूब हँसाये।
 उच्चारण  
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दिलबागसिंह विर्क, Sahitya Surbhi  
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  • आशा 
  • अचानक तेज़ हवा बही
    नदी का जल
    लहरों की शक्ल में
    किनारे की ओर उमड़ा
    पल भर में नज़ारा बदल गया
    मुरझा गये सुकोमल मासूम चेहरे
    श्रम ने जो शब्द सृजित किये थे
    वे ख़ामोश  हो गये थे....... !
    माता-पिता आशावाद का पाठ पढ़ाते हुए
    नन्हें छौनों के आँसू पौंछते घर लौट आये... 

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 मेहनत  ही  रहा  ईमान  मेरा
 मेहनत की रोटी खाता हूँ। 
आन-बान-शान, 
मान जीवन के साथी
  सीने से इन्हें लगाता, 
किसान   हूँ, 
अन्नदाता  कहलाता हूँ। 
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महिमा लॉक डाउन की  ( खेल करोड़पति का )  डॉ लोक सेतियामहानायक कहलाते हैं कोई किसी को कॉल करता है तो उपदेश दे रहे हैं अभी आप घर बैठे खेलिए जब तक उपचार नहीं कोई तकरार नहीं। आप खुद घर बैठ ठाठ से रह सकते थे कोई दाल रोटी की चिंता नहीं थी हिसाब नहीं लगाया कितना धन बैंक खाते में जमा है। आयु भी वरिष्ठ नागरिक वाली है लोग भले कहते रहें आपकी जवानी का क्या राज़ है। बड़े और महान लोग जो आपको समझाते हैं खुद नहीं समझते कभी 
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शृंगार चिन्ह शृंगार चिन्ह के औचित्य पर मनन करने से भी प्रबल प्रश्न मेरे मन में यही उठता है कि शृंगार है क्या ... क्या मात्र तन को नानाविध सज्ज करना ही शृंगार है या मन को सज्ज करना भी ! बहुधा हम मन को भूल ही जाते हैं और विविध सामाजिक और पारिवारिक परम्पराओं की ही टीका करते रह जाते हैं । बस इसीलिये जो बात सामान्यतः बाद के लिये छोड़ देते हैं ,मैं उसको सबसे पहले ले कर आना चाहूँगी । चेतना का बोध होते ही सबसे पहले मन को शृंगारित करना चाहिए । मनन की धारा सन्तुलित कर के आत्मबल को दृढ़ करना चाहिए ,साथ ही वाणी पर संयम भी हो । वाणी पर संयम का अर्थ मात्र इतना ही है शब्दों का चयन और बोलने का तरीका कटु न हो । मन के इस सौंदर्य के साथ हम शृंगार चिन्ह की तार्किकता पर मनन करें तो औरों के लिये भी स्वीकार्य होगा 
निवेदिता श्रीवास्तव, झरोख़ा  
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यदि तुम मुझ से मित्रता करना.. 

यदि तुम मुझ से मित्रता करना,

तो केवल  मित्रता के लिए करना। 

मुझे मेरी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ अपनाना,

हाँ, बाद में तुम मेरी बुराइयाँ  सुधार देना।  

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प्रेमी 
चलते चलते अचानक
रास्ता बदल लोगे
तो भुलक्कड़ लगोगे।

दोस्तों को देखोगे
और मुँह फेर लोगे
हर पल तन्हा रहोगे। 
Amit Mishra 'मौन', अनकहे किस्से  
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नोबेल पुरस्कार के ल‍िए  नाम‍ित हुए थे उर्दू के मशहूर शायर  फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 
सेना, जेल तथा निर्वासन में जीवन व्यतीत करने वाले फ़ैज़ ने कई नज़्म, ग़ज़ल लिखी तथा उर्दू शायरी में आधुनिक प्रगतिवादी (तरक्कीपसंद) दौर की रचनाओं को सबल किया। उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए भी मनोनीत किया गया था। फ़ैज़ पर कई बार कम्युनिस्ट (साम्यवादी) होने और इस्लाम से इतर रहने के आरोप लगे थे पर उनकी रचनाओं में ग़ैर-इस्लामी रंग नहीं मिलते। जेल के दौरान लिखी गई उनकी कविता ‘ज़िन्दान-नामा’ को बहुत पसंद किया गया था। उनके द्वारा लिखी गई कुछ पंक्तियाँ अब भारत-पाकिस्तान की आम-भाषा का हिस्सा बन चुकी हैं, जैसे कि ‘और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’। 13 फ़रवरी 1911 को अविभाजित भारत के सियालकोट शहर में जन्‍मे मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का इंतकाल 73 साल की उम्र में 20 नवंबर 1984 के दिन पाकिस्‍तान के लाहौर में हुआ था। 
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आज के लिए बस इतना ही...।
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9 comments:

  1. वन्दन
    –सभी रचनाकार बेमिसाल हीरे हैं
    –श्रमसाध्य कार्य हेतु साधुवाद

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  2. बहुत सुंदर चर्चा अंक । सभी सूत्र पठनीय और आकर्षक
    सभी रचनाकारों को बधाई।

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  3. बेहतरीन प्रस्तुति।

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  4. आदरणीय सर,
    मेरी रचना को यहाँ स्थान देने के लिए हृदय से अत्यंत अत्यंत आभार। आप सभी बड़ों का प्रोत्साहन और आशीष पाना मेरे लिए बहुत बड़ा सौभाग्य है। प्रस्तुति अत्यंत सुंदर है,सभी रचनाएँ बहुत ही आनंदकर, प्रेरणादयक और ज्ञानवर्धक हैं। आप सबों को पुनः प्रणाम।

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  5. प्रणाम शास्त्री जी, आपके दोहे में रचे गए ''बालगीत और जोकर'' सह‍ित सभी रचनायें बेहतरीन हैं, इन्हें इस चर्चामंच के माध्यम से हम तक पहुंचाने के ल‍िए धन्यवाद ....पूरा संग्रह बेहद जानदार

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  6. बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति

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  7. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति आदरणीय सर।
    सादर

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  8. बेहतरीन प्रस्तुति

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