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Monday, November 23, 2020

'इन दिनों ज़रूरी है दूसरों के काम आना' (चर्चा अंक-3894)

शीर्षक पंक्ति:आदरणीय ओंकार जी की रचना से.

सादर अभिवादन। 

 सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

सुना है 

एक चीनी ने 

ख़रीदी है कबूतरी 

रुपये 14 करोड़ में

कुछ लोग 

बिता देते हैं जीवन 

बस जोड़-तोड़ में। 

#रवीन्द्र_सिंह_यादव 


आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित कुछ रचनाएँ-

--

बालकविता "बिल्ली मौसी"

 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बिल्ली मौसी बिल्ली मौसी,
क्यों इतना गुस्सा खाती हो।
कान खड़ेकर बिना वजह ही
रूप भयानक दिखलाती हो।।

--

जन्मदिवस पर

तितली सी तू सोन परी है
मेरे घर की राजकुमारी।
फूलों जैसी कोमल कलिका
बाबा की ओ राज दुलारी।
हर करवट पर घुंघरु बजते
पायल झनकार सुनाएगी।।

चाँद चंदनिया झर झर करके
चंदन पलने बिछ जायेगी।।
--
हम तो ठहरते रहे प्रेम के हर आशियाने में  ।
प्रेम को सजाने में  ।।
मकान भी बनाया ।मचान भी सजाया ।।
मंजरियों लताओं से ।बासंती हवाओं से ।।
झूम झूम कर लिपटते रहे ।
उन्हीं में सिमटते रहे ।।
साधते सहेजते प्रेम को, जाने कितनी बार बिखरे भी !
यहाँ बहुत कुछ है प्रेम से परे भी !!
--
ढलती रही रात 
चंद्रिका के हाथों
धरा पर एक काव्य का
सृजन होता रह
ऐसा अलंकृत रस काव्य
जिसे पढने
सुनहरी भास्कर
पर्वतों की उतंग
--
चल
कुछ तो निकाल
बहुत दिन हो गये
अब
कुछ भी सही
आज
फिर से लिख डाल 
आदत
रोज बकने की ना दबा
--

इन दिनों ज़रूरी है 

दूसरों के काम आना,

उनका दर्द महसूस करना 

और यह सब संभव है 

दो गज की दूरी रखकर भी.

--

काश बदल सकता ....

काश!
कि मैं बदल सकता 
ले जा सकता 
समय को वहीं 
उसी जगह 
जहाँ से 
शुरू हुआ था 
ये सफर 
लेकिन 
अपनी द्रुत गति से 
समय के इस चलते जाने में 
थोड़ी भी 
नहीं होती गुंजाइश 
इस जीवन के 
--

वही बिंदु बिंदु जीवन यापन, ईहकाल
और परकाल के मध्य, मानव
खोजता है, अलादीन का
चिराग़, एक छोटा
रास्ता, किन्तु
प्रारब्ध -
अपनी जगह है अडिग, खोलता है वो
दक्षिणी खिड़की और कहता है -
दिगंत तक पहुँचना है
अगर, तो पंख
उगाओ
--
मन में हो विश्वास घना जब 
देखे वह अव्यक्त छिपा जो, 
अपरा-परा शक्तियां उसकी 
 कहा स्पष्ट कान्हा ने जिसको !
--
                                     
 अम्बुज कुछ नहीं बोला 
बस चुप चाप बैठा पैरों से पानी उछालता रहा |
 मीनाक्षी ने ही फिर बोलना शुरू किया -`` अच्छा एक बात बताइये ---
 अगर आपकी कोई बहिन कभी भटक कर खो जाये और काफी दिन  बाद अचानक 
आपको मिले तो क्या आप अपने सम्मान के लिए उसे बिलकुल ठुकरा देंगे 
उससे बोलेंगे तक नहीं 
वह अगर आपके सामने आ जाये तो क्या आप उसे पहचानने से इनकार 
कर देंगे |
--

  जिन्दगी जी ली है भरपूर अब त
 कोई अरमा शेष नहीं

कोई ऐसा मार्ग खोजना है अब तो

जिसमें पहुँच कर ऐसी रमू

 जिन्दगी के शेष दिन भी

जी भर कर  भर पूर जियूं 

--

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी दिसंबर में किसी सोमवार,
तब तक सोमवारीय प्रस्तुति का प्रभार आदरणीया अनीता सैनी जी के पास रहेगा। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

11 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति. मेरी कविता शामिल करने के लिए आभार.

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  2. आभार रवीन्द्र जी चर्चा में जगह देने के लिये।

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  3. आज की लिंक्स पढ़ने के लिए है पर्याप्त |मेरी रचना को शामिल करने के लिए आभार
    रवीन्द्र जी |

    ReplyDelete
  4. आदरणीय रवीन्द्र जी, नमस्कार !
    सुंदर चयन के साथ साथ सुंदर प्रस्तुति..। मेरी कविता को प्रकाशित करने के लिए आपका आभार...।सादर.. जिज्ञासा सिंह..।

    ReplyDelete
  5. सराहनीय रचनाओं के सूत्रों से सजी चर्चा ।। आभार !

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  6. बहुत बहुत आभार नर्तकी को चर्चा स्थान दिन के लिए

    ReplyDelete
  7. बेहतरीन प्रस्तुति। मेरे सृजन को स्थान देने हेतु सादर आभार।

    प्रस्तुति का प्रभार संभालने की पूरी कोशिश करुँगी।बहुत बहुत शुक्रिया सर ।
    सादर

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  8. सुन्दर व सारगर्भित रचनाएँ चर्चा मंच को महत्वपूर्ण साहित्यिक केंद्र बनाता है, मुझे स्थान देने हेतु आभार - - नमन सह।

    ReplyDelete
  9. बहुत सुन्दर और सार्थक चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी।

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  10. शानदार भूमिका शानदार लिंक , सुंदर प्रस्तुति।
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय तल से आभार।

    ReplyDelete

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