साहित्यकार समागम

मित्रों।
दिनांक 4 फरवरी, 2018 (रविवार) को खटीमा में मेरे निवास पर साहित्यकार समागम का आयोजन किया जा रहा है।

जिसमें हिन्दी साहित्य और ब्लॉग से जुड़े सभी महानुभावों का स्वागत है।

कार्यक्रम विवरण निम्नवत् है-
दिनांक 4 फरवरी, 2018 (रविवार)
प्रातः 8 से 9 बजे तक यज्ञ
प्रातः 9 से 9-30 बजे तक जलपान (अल्पाहार)
प्रातः 10 से अपराह्न 1 बजे तक - पुस्तक विमोचन, स्वागत-सम्मान, परिचर्चा (विषय-हिन्दी भाषा के उन्नयन में
ब्लॉग और मुखपोथी (फेसबुक) का योगदान।
अपराह्न 1 बजे से 2 बजे तक भोजन।
अपराह्न 2 बजे से 4 बजे तक कविगोष्ठी
अपराह्न 5 बजे चाय के साथ सूक्ष्म अल्पाहार तत्पश्चात कार्यक्रम का समापन।
(
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री का निवास, टनकपुर-रोड, खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड)
अपने आने की स्वीकृति अवश्य दें।
सम्पर्क-9368499921, 7906360576

roopchandrashastri@gmail.com

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Tuesday, January 12, 2010

“सिर्फ अँधेरे नहीं उजाले भी हैं” (चर्चा मंच)

"चर्चा मंच" अंक-27
चर्चाकारः
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
आइए अब आज का "चर्चा मंच" सजाते हैं-

VYOM KE PAAR...व्योम के पार

-सिर्फ अँधेरे नहीं उजाले भी हैं

'फसाना-ए-शब-ए-ग़म'


'फसाना-ए-शब-ए-ग़म'
----------------------
ज़ुर्म-ए-तमन्ना की सज़ा
यूँ मिला करती है मुझे ,
खिंचती हैं रंगे पलकों की,
जब दर्द कफस में अंगड़ाईयाँ लेता है,
सर्द आहों में दम तोड़ती हैं उम्मीदें,
नक्श ज़हन में उभरने लगते हैं,………

“व्योम के पार, अँधेरे नहीं उजाले भी हैं

घरा पर, प्यार करने वाले भी हैं।”

युवा सोच युवा खयालात

बदलेगा इंडिया...

जिन्दादिली

रोते हुए चेहरे बिकते नहीं

दुनिया के बाज़ार में

क्योंकि जिन्दादिली जीने का नाम है………

“मर्दों की बस्तियों में जिन्दगी तलाश करते हो!
काँटों से क्यों वफा की आस करते हो!!”

"वक़्त की कोख में नहीं..."

शाम ढले ही
ख़ामोशी के तहखानों में
कुछ वादों के उड़ते से गुब्बार
समेट लेते हैं मेरे अस्तित्व को
फिर अनजानी ख्वाइशों की आंखे
कतरा कतरा सिहरने लगती हैं

…….

"वक़्त की कोख में

उदासी है,
अब समन्दर में मीन प्यासी है!


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Rakesh Khandelwal
हर पल साथ रहे तुम मेरे

ओस में डूब कर फूल की पंखुड़ी भोर की इक किरण को लगी चूमने
गंध फिर तितलियों सी हवा में उड़ी, द्वार कलियों के आकर लगी घूमने
बात इतनी हुई एक पत्ता कहीं आपके नाम का स्पर्श कर आ गया
यों लगा आप चलने लगे हैं इधर, सारा उपवन खुशी से लगा झूमने
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
पतझड़ के पहले पत्ते के गिरने की आहट से लेक
अंकुर नये फ़ूटने के स्वर तक तुम साथ रहे हो मेरे……

“भ्रमर को तो सुमन की एक ही बस गन्ध है काफी!
पवन को तो चमन का एक ही अनुबन्ध है काफी!!

दिशायें“

कुछ क्षणिकाएं
ठंड बहुत है.... इसी लिए सरकार ने गरीबों के लिए ठंड से बचाने के लिए यह जुगत लगाई है - महँगाई की आग जलाई है। ******************* जब कोई गलत आदमी सही बात बोलता है.... आदमी को नहीं उस की बात को मान देना चाहिए। यदि यह तुम्हें स्वीकार नही... अपने को – पहचान

“बढ़ी मँहगाई लेकिन विश्व में छाई हुई मन्दी!
यहाँ पर भेड़ियों ने चाल अपनाई हुई गन्दी!!”

नीरज

शायरी मेरी तुम्हारे जिक्र से, मोगरे की यार डाली हो गयी

आप गिनाते क्यूँ हो

तुम नहीं साथ तो फिर याद भी आते क्यूँ हो

इस कमी का मुझे एहसास दिलाते क्यूँ हो

डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर

रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो……( गुरुदेव पंकज सुबीर जी की भट्टी में तप कर कुंदन बनी ग़ज़ल )

“लपट-अंगार में तपकर निखरता है खरा कुन्दन!
रगड़ने पर महकता है हमेशा ही खरा चन्दन!!”

अर्थात

यह रेखा ग़रीबों की गर्दन से गुज़रती है...

आजकल दिल्ली में है जे़रे बहस ये मुद्दुआ

उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर ने शायद सबसे पहली बार आधिकारिक तौर पर सामाजिक परिक्षेत्र में योग्यतम की उत्तरजीविता के मुहावरे का प्रयोग किया था। उनका मानना था कि ‘‘गरीब लोग आलसी होते हैं,काम नहीं करना चाहते और जो काम नहीं करना चाहते उन्हें खाने का भी कोई अधिकार नहीं है।‘‘ इसी आधार पर उनका तर्क था कि ‘‘गरीबी उन्मूलन जैसी योजनाओं के जरिये सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिये।‘‘दरअसल, स्पेन्सर पूंजीवादी दुनिया के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं।

…..

“बनी अभिशाप आजादी, गरीबी के चमन देखो!
भरे मधुमास में उजड़े हुए अपने सुमन देखो!!

धान के देश में!

पोस्ट लिखना कौन सा कठिन काम है, कोई भी लिख सकता है

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"
"नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"
"सुनाइये क्या चल रहा है?"
"चलना क्या है? अभी अभी एक पोस्ट लिखकर डाला है अपने ब्लॉग में और अब हम ब्लागवाणी पर अन्य मित्रों के पोस्टों को देख रहे हैं।"
"अच्छा यह बताइये लिख्खाड़ानन्द जी, आप इतने सारे पोस्ट लिख कैसे लेते हैं? भइ हम तो बड़ी मुश्किल से सिर्फ टिप्पणी ही लिख पाते हैं, कई बार तो कुछ सूझता ही नहीं तो सिर्फ nice , बहुत अच्छा, सुन्दर, बढ़िया लिखा है जैसा ही कुछ भी लिख देते हैं। पोस्ट लिखना तो सूझ ही नहीं पाता हमें।"
"अरे टिप्पण्यानन्द जी! पोस्ट लिखना कौन सा कठिन काम है, कोई भी लिख सकता है।"……..

“धुआँधार ब्लॉगिंग करो, रहो हमेशा मस्त!
लिखना ही है जिन्दगी, क्यों होते हो पस्त!!

उड़न तश्तरी ....

हिन्दी ब्लॉगिंग- कौवा महन्ती!!!!बूंद बूंद पानी को तरसते ऐसे इन्सान को भी मैने देखा है जो समुन्द्र की यात्रा पर निकला तो ’सी सिकनेस’ का मरीज हो गया. पानी ही पानी देख उसे उबकाई आने लगी, जी मचलता था. भाग कर वापस जमीन पर चले जाने का मन करता था. शुद्ध मायने में शायद यह अतिशयता का परिणाम था और शुद्ध भाषा में शायद इसी को अघाना कहते होंगे.

याद है मुझे, कुछ बरस पहले डायरी के पन्ने दर पन्ने काले करना. न कोई पढ़ने वाला और न कोई सुनने वाला. बहुत खोजने पर अगर कोई सुनने वाला मिल भी जाये तो यकीन जानिये कि वो बेवजह नहीं सुन रहा होगा. निश्चित ही या तो उसे आपसे कुछ काम होगा या वो भी अपने खीसे में डायरी दबाये सुनाने का लोभ पाले सुन रहा होगा.

चैन तो कहीं नहीं..

punch

ब्लॉग

मुझे

सुविधा देता है..

मैं मन में उठते भाव

जस का तस

लिख देता हूँ..


"भाव उठें जब हृदय में, आयें नवल विचार।
ब्लॉग खोल अंकित करो,मन के सब उदगार।।"

साल २०१०: साहित्यकारों से मोहभंग हो चुका- निलय

निलय उपाध्याय (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'कटौती’):
इन दिनों मैं बहुत निजी किस्म का जीवन जी रहा हूँ. मेरा कोई सामाजिक जीवन नहीं है. अभी जिन संकटों के दौर से गुज़र रहा हूँ उसमें सार्वजनिक जीवन के लिए कोई जगह नहीं है. पिछला साल जो बीता है उससे मेरी यही अपेक्षा थी कि मेरे परिवार को दो जून का भोजन मिलता रहे. मेरे बच्चों की पढ़ाई चलती रहे...और २००९ में यह पूरा हुआ. आने वाले साल में मैं यह चाहता हूँ कि इन जिम्मेदारियों से अलग होने का वक्त मिले, जिसमें मैं अपने मन के भीतर बसी दुनिया के बारे में लोगों को बता सकूं...कुछ कवितायें लिख सकूं... और जो विकास-क्रम अथवा परिवर्त्तन मेरे भीतर आया है, उसको बता सकूं….

सिद्धेश्वर सिंह (कवि, समीक्षक, अनुवादक, ब्लॉगर): कैलेन्डर बदलने से उम्मीदें नहीं बदलतीं. बड़ी उम्मीदें बड़ी जगह, समय के बड़े हिस्से, बड़ी और लगातार कोशिशों तथा बड़े विचार से ही पूरी होती हैं. यह समय छोटी चीजों का है. हमारे गिर्द 'लघु-लघु लोल लहरें' उठती हैं और उनकी फेनिल आभा हमें समन्दर में गहरे उतरने से रोकती है, बहकाती है, बरजती है. फिर भी साहित्य की दुनिया में हाथ-पाँव मारते हुए यह यकीन कायम है कि शब्द में दम है और उम्मीद पर जहाँ कायम है…..


आज कल पंकज मिश्रा को तो फुरसत है नहीं तो सोचा क्यों न मै ही अलख जगा दू ..बस ज्यादा समय नहीं लूगा .दो चार जोक मारुगा ,उतने में अप मर गए तो ठीक नहीं तो नमस्ते बोलकर खिसक जाउगा :)
चलिए बताते है पप्पू के कारनामे

कालेज में पप्पू को एक मैडम से प्यार हो गया
सारे कालेज में हाहाकार मच गया

कक्षा के सारे बच्चे उदास हो गए ...क्यूकी कालेज के सारे बच्चे फेल. पप्पू अकेला पास हो गया !! ...

हितोपदेश 18- चूहे ने मारी
बिल्ली

एक बार बिल्ली

थी एक
चूहे खा जाती अनेक
दुःखी थे उससे चूहे सारे
इक दिन सारे मिल के विचारे
सोचा मिलकर एक उपाय
बिल्ली को जा दिया बताय
बोले अपने मन में विचारो
रोज क्यों इतने चूहे मारो
इतने चूहे रोज मारोगी
कितने दिन तक पेट भरोगी
खत्म हो जाएंगे चूहे जब
बोलो क्या करोगी तब
इक चूहा जब तेरा खाना
बाकी सबको क्यों सताना
मानो जो हमारा कहना
अपने घर आराम से रहना...........

यदि हम किसी धार्मिककृ्त्य, रीति रिवाज, परम्पराइत्यादि को बिना अर्थअथवा उसके महत्व कोजाने हुए निभाते चले जाएंतो निश्चय ही यह हमाराअंधविश्वास माना जाएगा।मेरा मानना है कि जब तकधार्मिक प्रतीकों एवंमांगलिक कृ्त्यों तथा उनकेविज्ञान को हम समझ न लें,तब तक केवल अंधविश्वासीहोकर धर्म से जुडी इन सबबातों को मानने का कोईऔचित्य नहीं है। हमाराधर्म, हमारी संस्कृति,वैदिकऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराणउपनिषद आदि इन सभीग्रन्थों के पीछे एक बहुतबड़ा विज्ञान है। हमारेऋषियों ने जिन वैदिकऋचाओं और पुराणों कीकल्पना की, उपनिषदों केबारे में सोचा ओर फिरप्रतीकों का आश्रय लेते हुएमांगलिक कार्यो के लिएजैसी व्यवस्था नियत की,वह हमारे विज्ञान से किसीभी तरह से अलग नहीं है।उनके द्वारा सोची और कीजाने वाली हर एक पहलहमेशा से ही विज्ञान के साथरही है। इनमें से यदि एकभी बात अवैज्ञानिक होजाती है तो हमारा जोचिंतन है, हमारी संस्कृतिकी जो पुकार है, वह बतादेगी कि यह बात गलत हैऔर इसे हमें नहीं माननाचाहिए।.........

रोक सको तो रोक लो: - महफूज़



अभी थोड़े दिन पहले कि हीबात है. मैं जिम सेएक्सरसाइज़ कर के अपनेदोस्त पंकज के साथ घर लौटरहा था. कडाके कि ठण्ड मेंभी मुझे बहुत गर्मी लग रहीथी. उस दिन कार्डियो औरबेंच प्रेस बहुत ज्यादा करलिया था. मुझे बॉडी बिल्डिंगका बहुत शौक़ है, मैं आज भीदो सौ पुश अप्स के साथ डेढ़सौ पुल अप्स कर लेता हूँ. मेरेबयालीस इंच के बाइसेप्सऔर V-shaped बॉडी पर टी-शर्ट खूब फब्ती है औरइसीलिए मैं टी-शर्ट ज्यादापहनता हूँ. इससे दो फायदेहोते हैं एक तो सामने वालापंगा लेने में थोडा घबराता हैऔर खुद का सेल्फ-कॉन्फिडेंस भी अप रहता है.हमारे ज़ाकिर भाई कहते हैंकि वैसे भी आप बहुत हैंडसमहैं फिर काहे को इतनी बॉडीबिल्डिंग करते हैं?


चलती चक्की देख कर.........घुघूती बासूती - गेहूँकी पिसाई तीन रुपया!सरकार गरीबी की रेखा सेनीचे की आबादी को राशन मेंशायद २ रुपए किलो गेहूँउपलब्ध करवाती है। सबसेपहले तो समस्या यह है किबहुत से लोगों...
याद करते हो तुम अपने प्रेमी को
फिर क्यूँ लांछन हम पर लगाते हो
हम बेजुबान
तुम्हारे लांछनों का जवाब नही देसकते
किसी की याद में
जी तुम जलाते हो
मगर दोष हमारा इ..

दर्द ... - दर्द आज बयांकरना चाहता था अपनीपीड़ा को जो उसे असहाय करचली थी जब से वह उसकेभीतर पली थी चिंता के साथघुल रही थी उसकी हड्डियांभीं उसके रोम छिद्...
*क्या मालुम था मेरा शोणित ,,
* *केवल पानी कहलायेगा ,,, *
*क्या मालुम था जीवन अर्पण ,,
* *ओछा आँका जाएगा ,,,
* *क्या मालुम था मरने पर भी ,,
* *अपमानित होकर रो...

जब लाखों व्यक्ति तुम्हारी"वाह - वाह" करें
तो गंभीर हो कर सोचो -
"तुमसे क्या अपराध हो गया?"
और जब निंदा करें तो - "क्याभलाई" ....
*राजीव तनेजा* * * बड़े दिन हो गएथे खाली बैठे बैठे...
कोई काम-धाम तो था नहीं अपनेपास..
बस कभी-कभार कंप्यूटर खोला औरथोडी-बहुत 'चैट-वैट' ही कर ली।
सच पूछ..
आप को अपने सिस्टम को सुरक्षितकरने और फिर से ठीक करने के लिए
एक आसान और उपयोगी सॉफ्टवेरबहुत सारी समस्यायों का एक हीउपाए....................
मुफ्त पोर्टे..

कुछ शब्दों को कोश मेंवर्णक्रम के अनुसारसजाने का प्रयास

प्रिय मित्रो,

आज नीचे दिए गए कुछ शब्दों को
कोश में निहित वर्णक्रम के अनुसार
सजाने में मेरी मदद कीजिए -
1. पंच
2. पद
3. पाँव
4. पाक
5. पिंड ......

और अब आज का कार्टून..

कार्टून :- थ्विट्टर-थ्विट्टर

अब दीजिए इजाजत!

15 comments:

  1. शास्त्री जी-नये रंग मे सुंदर चर्चा के लिए-आभार

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  2. बेहतरीन शास्त्री जी !

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  3. बहुत सुंदर चर्चा.

    रामराम.

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  4. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, आभार ।

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  5. बहुत बढ़िया साहब !

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  6. वाह! शास्त्री जी, एकदम मनमोहक चर्चा!!!
    आभार्!

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  7. पसंद पर चटका नहीं लग पा रहा....जरा देख लीजिएगा कि क्या कारण है!

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  8. अच्छी लगी चर्चा कई समाचार मिल गए!!!

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  9. सुन्दर चर्चा ! आभार ।

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  10. बहुत उम्द और सुन्दर चर्चा..बढ़िया लिंक मिले.

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  11. मुझे तो उजाले ही उजाले नज़र आ रहे हैं - इस नवोदित चर्चा में!

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"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

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"जीवित हुआ बसन्त" (चर्चा अंक-2857)

मित्रों! मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- &...