चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Friday, September 30, 2011

पाठक-गण ही पञ्च : चर्चा - मंच-653

मुम्बा  की  मासूमियत,  महा-हिमालय रूप,
दक्षिणेश्वर  की  विद्या,  चर्चा - मंच   अनूप |
चर्चा - मंच अनूप,  दिखें  चन्द्रा गाफिल सा  |
मनु मनोज दिलबाग़, मिला अरुणेश सलिल सा |
  File:Delhi Montage.jpg
लेकिन  चर्चा - मंच,  लगे  पाठक बिन तुम्बा, 
रविकर  दे  आशीष,  बढ़ें  पाठक  माँ  मुम्बा !!
 
 http://tompietrasikphotographer.files.wordpress.com/2010/03/pietrasik-coal-mining-00e.jpg 
झरिया कोल-फील्ड 
(1)
लाल फूलों की माला से सजा माँ का दरबार,
पुलकित हुआ मन, उतावला हुआ संसार,
माँ अपने क़दमों से आयी है आपके द्वार,
मुबारक हो आपको नवरात्रि का ये पावन त्यौहार !
[DSC00578.JPG]

(2)

मैय्या की भेंट, मैय्या को भेंट 

लीला तिवानी

लीला तिवानी

शिक्षा हिंदी में स्नातकोत्तर, बी.एड., एम.एड., कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड । दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत । हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित ‌। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

  मैSय्या वरदाSतीSS मुझे अपना बना लेना             
  जन्मों से तरस रही मुझे गले से लगा लेना-
1.छाए चारों ओर अन्धेरे
  भटकाते चौरासी के फेरे
  मैSय्या वरदाSतीSS मुझे इनसे बचा लेना-
2.ध्यानू जैसी भक्ति दे दो
  तारा जैसी मस्ती दे दो
  मैSय्या वरदाSतीSS मुझे सबल बना लेना-
3.तूने सबकी बिगड़ी बनाई
  सोई हुई किस्मत भी जगाई
  मैSय्या वरदाSतीSS मेरे भाग जगा लेना-
4.कैसे तेरा ध्यान लगाऊं
  कैसे तुझको अपना बनाऊं
  मैSय्या वरदाSतीSS ज़रा इतना बता देना-

 (3)

रंगमंच पर उतरे 'मुखौटे'



मुखौटों की दुनिया मे रहता है आदमी,
मुखौटों पर मुखौटे लगता है आदमी;
बार बार बदलकर देखता है मुखौटा,
फिर नया मुखौटा लगाता है आदमी..... - (डा. ए. कीर्तिवर्द्धन अग्रवाल)
कुछ विशेष नहीं है जो कुछ अपने बारे में बताऊँ... मन के भावों को कैसे सब तक पहुँचाऊँ कुछ लिखूं या फिर कुछ गाऊँ । चिंतन हो जब किसी बात पर और मन में मंथन चलता हो उन भावों को लिख कर मैं शब्दों में तिरोहित कर जाऊं । सोच - विचारों की शक्ति जब कुछ उथल -पुथल सा करती हो उन भावों को गढ़ कर मैं अपनी बात सुना जाऊँ जो दिखता है आस - पास मन उससे उद्वेलित होता है उन भावों को साक्ष्य रूप दे मैं कविता सी कह जाऊं.



जब मंद पवन के झोंके से 

तरु की डाली हिलती है 
पंछी  के  कलरव से 
कानों में मिश्री घुलती है 
तब लगता है कि तुम 
यहीं - कहीं हो
(4)
कुछ दूर हमारे साथ चलो --इब्राहीम अश्क


डा. मेराज अहमद

पति  की  अनुनय  को  धता, कुपित होय तत्काल |
बरछी - बोल  कटार - गम,  सहे  चोट  मन - ढाल ||

(6)

मनमोहन बनाम अफजल गुरु..... 

( कौन कहता है कि पीते समय गंभीर बातें नहीं होतीं )

झटका लगा ना आपको, हैरत में पड़ गए होंगे, ये क्या बात है। अरे इन दोनों में भला क्या तुलना हो सकती है। मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हैं और अफजल गुरु देश की संसद पर हमले का मास्टर माइंड।

उसका जीवन..

रोज़ पीठ पर बोझा लादे
वो दिख जाता है
किसी दुकान पर
पसीने से तर बतर
उसके चौदह बरस के शरीर पर
बदलते वक़्त की खरोचें
अक्सर दिख जाती हैं
कभी बालू ,सीमेंट ,गिट्टी
और कभी अनाज के बोरों
से निकलने वाली धूल
उसके जिस्म से चिपकती है
त्नी  ग-ग  र  रे, ल-ल  ति  तियाय |
श्रीमन का मन मन्मथा, श्रीमति मति मटियाय ||

 (8)

कनुप्रिया - तुम मेरे कौन हो

मेरे सपने

तुम मेरे कौन हो कनु
मैं तो आज तक नहीं जान पाई

बार-बार मुझ से मेरे मन ने
आग्रह से, विस्मय से, तन्मयता से पूछा है-
‘यह कनु तेरा है कौन? बूझ तो !’
(9)

खेती का आविष्कार और सामंती समाज व्यवस्था का उदय : बेहतर जीवन की तलाश-3[4.JPG]

हार गले की फांस है, किया विरह-आहार |
हारहूर  से  तेज  है,  हार   हूर  अभिसार ||
हारहूर=मद्य  
आहार-विरह=रोटी के लाले

(10)

दुपट्टा आसमानी शाल नीली ...

------दिगम्बर नासवा
गिरे है आसमां से धूप पीली
पसीने से हुयी हर चीज़ गीली

खबर सहरा को दे दो फिर मिली है
हवा के हाथ में माचिस की तीली

(11)

ख़जाना

 [DSC_0065.jpg]

कल्पनाओं के पंख लग गये
मैं देखती रह गयी उन्हें
असीम फलक पर उड़ते हुए...
सपनों में रंग भरने लगे
मैं देखती रह गयी उन्हें
स्याह सिक्त होते हुए.......
आशाओं की कोख उजड़ गयी
मैं देखती रह गयी उन्हें
बेबस बाँझ होते हुए......
सोच को मार गया लकवा
मैं देखती रह गयी उन्हें



clip_image002हरीश प्रकाश गुप्त
मेरा फोटोआज से लगभग एक वर्ष पहले इसी ब्लाग पर एक बालगीत प्रकाशित हुआ था शैशव। यह एकमात्र बालगीत है जो अभी तक इस ब्लाग पर प्रकाशित हुआ है। पाँच पदों में रचे गए इस गीत में बालवृत्तियों का और उसके मनोभावों का सूक्ष्म चित्रण हुआ है। आचार्य़ परशुराम राय द्वारा रचित यह बालगीत बहुत ही सरस, सहज और मनमोहक है। इसकी शब्द योजना आकर्षक है। आँच के इस स्थायी स्तम्भ पर अभी तक किसी भी बाल गीत पर चर्चा नहीं हुई है। अतः सोचा कि इस रचना के माध्यम से इस रिक्ति को भरने का कुछ प्रयास किया जाए।
चमकी चपला-चंचला , छींटा छेड़ छपाक |
 तेज तड़ित तन तोड़ती,  तददिन तमक तड़ाक |

(13)

हार-जीत : निज़ार कब्बानी

 
आजकल निज़ार कब्बानी जी की कविताओं में डूबा हुआ हूँ. अब उर्दू-अरबी तो आती नहीं है, सो उनकी अनुवादित कविताओं का ही लुत्फ़ उठा रहा हूँ जो यहाँ-वहाँ अंतरजाल पर बिखरी हुई है.
मुमुक्षता मुँहबाय के, माया मोह मिटाय |
 मुमुक्षता=मुक्ति की अभिलाषा का भाव 

(14)

माँ! अबकी सन्मार्ग दिखा देना

pragyan-vigyan
विकास विकास की करते बात
हम पहुच गए हैं भ्रष्टाचार तक.
आचार विचार सब भूल गए
छूट गया है शिष्टाचार तक.

(15)

"होठों को फिर भी, सिये जा रहें हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

घुटन और सड़न में जिए जा रहे हैं,
जहर वेदना के पिये जा रहे हैं।

(16)

कलकत्ता यात्रा- दिल्ली से हावडा

पिछले महीने कुछ ऐसा योग बना कि अपन को बिना छुट्टी लगाये ही चार दिन की छुट्टी मिल गई। इतनी छुट्टी और बरसात का महीना- घूमना तय था। हां, बरसात में अपना लक्ष्य गैर-हिमालयी इलाके होते हैं। दो साल पहले मध्य प्रदेश गया था जबकि पिछले साल उदयपुर। फिर दूसरी बात ये कि इन चार दिनों में कम से कम दो दिन रेल एडवेंचर में लगाने थे और बाकी दो दिन उसी ‘एडवेंचर’ वाले इलाके में कहीं घूमने में।

(विशेष-२) 

कबीरा खडा़ बाज़ार में

HAPPY BIRTHDAY DEAR HEART

HAPPY BIRTHDAY DEAR HEART
Your heart has an age ,and this World Heart Day I decided to wish it a Happy Birthday।
दिल की सलामती के लिए कुछ छोटी छोटी बातें बड़े काम की सिद्ध हो सकतीं हैं :-
(१)शोपिंग से पहले घर से ही कुछ हलका फुलका स्वास्थ्यकर भोजन खाके निकलिए आम प्रवृत्ति है हम भारतीयों की शोपिंग के बाद बाज़ार में कुछ चाट पकौड़ी ,पानी पूरी गोलगप्पे खाने की ।
(२)पसंदीदा संगीत एक सक्षम तनाव -रोधी है .अच्छे संगीत के साथ आपका दिल भी मस्ती में झूमता गाता इतराता है .रोज़ सुनिए अपने दिल की थिरकन ।
(३)खाना पकाते वक्त खाना टेस्ट मत करिए .खाने के मेज पर अच्छी भूख लेकर जाइए .दिल से खाइए ।
(४)एक अंडे में २१० मिलीग्राम कोलेस्ट्रोल होता है .३०० मिलीग्राम से ज्यादा खुराकी कोलेस्ट्रोल दिल के लिए अच्छा नहीं है .(वैसे एग यलो यानी सन साइड ऑफ़ दी एग को लेकर विवाद है कुछ लोग इसे निकाल देते हैं ,खाते नहीं हैं ,कुछ खुराक के माहिर इसे सेहत के लिए अच्छा बताते हैं आप अपने माहिर की बात मानिए .हमारा ओर्थोपीडिशियाँ अस्थि रोग माहिर एक अंडा रोज़ खाने की सलाह देता है हृद विज्ञानी मनाही करता है

(17)

मंत्र कर्मों का

मिट रहा है वह तो केवल रूप है
लेख कर्मों का कभी मिटता नहीं.

निज सुखों को वार, जग से प्यार कर
यश कमा, यह धन कभी लुटता नहीं.

मत समझ अपना-पराया, बाँट दे
सुख लुटाने से कभी घटता नहीं.

स्वार्थ-मद में मत कभी हुंकार भर
गर्जना से आसमां फटता नहीं.

तंत्र तन का एक दिन खो जायेगा
मंत्र कर्मों का कभी कटता नहीं. 

(मेरे छत्तीसगढ़ी ब्लॉग मितानी-गोठ में नव-रात्रि के अवसर पर दुर्गा जी के दोहों की श्रृंखला पोस्ट की जा रही है,मेरा विश्वास है कि हमारी आंचलिक भाषा छतीसगढ़ी को हिंदी के बहुत करीब पायेंगे. कृपया अवश्य ही पधारें
http://mitanigoth.blogspot.com)

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग
छत्तीसगढ़.

(विशेष-३ )

कुँवर कुसुमेश 

कभी घर से बाहर निकलकर तो देखो.
पलटकर ज़माने के तेवर तो देखो.

जिसे फ़ख्र से आदमी कह रहे हो,
मियाँ झाँककर उसके अन्दर तो देखो.

वो ओढ़े हुए है शराफ़त की चादर,
ज़रा उसकी चादर हटा कर तो देखो.

दबे रह गये हैं किताबों में शायद,
कहाँ तीन गाँधी के बन्दर तो देखो.

बहुत चैन फुटपाथ पर भी मिलेगा,
ग़रीबों की मानिंद सो कर तो देखो.

बड़ी कशमकश है 'कुँवर' फिर भी यारों,
ज़माने से रिश्ता बनाकर तो देखो.

(18)

न कहीं तुम्हे कभी भी चक्रेश ही मिलेगा

ये नमी ही क्या कुछ कम थी
जो रुलाया मुझको ऐसे
इक हंसी मेरे लबों की
क्यूँ तुमको न रास आई .

 (19)

तुम ना आए


तुम ना आए इस उपवन में
आते तभी जान पाते
कितने जतन किये
स्वागत की तैयारी में |
अमराई में कुंजन में
जमुना जल के स्पंदन में
कहाँ नहीं खोजा तुमको
इस छोटे से जीवन में |
My Photo

आशा


मैंने साइंस विषयों के साथ बी.एस.सी.किया है ! उसके बाद अर्थशास्त्र तथा अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.तथा बी.एड.किया है !शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल में लेक्चरर के पद पर मैंने कई वर्षों तक अध्यापन का कार्य किया है ! साहित्य के प्रति अभिरुचि एवं रुझान मुझे विरासत में मिले हैं ! अपने जीवन के आस पास बिखरी छोटी-छोटी घटनाएं, सामान्य से चरित्र तथा इनसे मिले अनुभव मेरे लिये बड़ी प्रेरणा बन जाते हैं जिन्हें मैं अपनी रचना के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास करती हूँ !

 खोजा गलियों में
कदम के पेड़ तले
तुम दूर नज़र आए
मगन मुरली की धुन में
पलक पावडे बिछाए थे
उस पल के इन्तजार में
वह होता अनमोल
अगर तुम आ जाते |
आते यदि अच्छा होता
सारा स्नेह वार देती
प्यारी सी छबी तुम्हारी
मन में उतार लेती |

(20)

दुनिया को हँसाया जाए

वक़्त !  मोहलत किसे खबर दे न दे फिर कल,
 आज हँस लें ज़रा  दुनिया  को हंसाया जाए / 
दर्द-ए -दिल, ले ले गम-ए-जिन्दगी जो गीत ग़ज़ल,
 बस तरन्नुम में वही यार सुनाया जाए /

मेरी टिप्पणियां और लिंक ||

श्रम - सीकर अनमोल है, चुका सकें न मोल |
नत - मस्तक गुरुदेव है,  सारा यह भू-गोल ||



घोर निराशा से भरा,  कुम्हलाया  है  रूप  |
जिजिविषा प्रणम्य पर, मुखड़ा आज कुरूप|
मुखड़ा आज कुरूप , सुबह से बहुत कचोटे |
गुरुजन का अवसाद, बताता  चेले  खोटे |
रविकर हों आश्वस्त,  लिखे क्यूँ  ऐसी भाषा ?
देखा  मुखड़ा-रूप,  हुई  है  घोर निराशा ||

मन और झील कभी नहीं भरती---- 

दीपक की बक-बक 

मन-का  मनमथ-मनचला, मनका पावै ढेर |
मनसायन वो झील ही,  करती रती  कुबेर |
करती रती  कुबेर,  झील  लब-लबा  उठी  है |
हुई  नहीं  अंधेर,  नायिका  सुगढ़  सुठी  है |
दीपक  की बकवाद, सुना  तो  माथा  ठनका |
कीचड़ सा उपमान,  रोप कर  तोडा  मनका ||

कभी-कभी....


ध्वनन, ध्वन और ध्वन्य से   --   प्रभावी अव्यक्ति |
ध्वंसक के लिए असहनीय -----मौनित्व की शक्ति ||
ध्वनन=अव्यक्त शब्द ,,,,ध्वन= शब्द ,,,,,ध्वन्य=व्यंगार्थ 


कालू गरीब हाजिर हो-  

अष्टावक्र

थर्ड-क्लास को ट्रेन से, हटा चुके थे लोग |
फोर्थ क्लास भुखमरी का, मिटा श्रेष्ठ संजोग ||
अब लास्ट क्लास थर्ड क्लास ||
भुखमरी ही आज के सरकार की गरीबी है |

जय सम्मोहन जय मनमोहन ,, जय नग्नोहन जय रक्त्दोहन |

बिगत चर्चा मंच की दो विशिष्ट टिप्पणियां  

DR. ANWER JAMAL said...

रविकर चर्चा मंच की प्रस्तुति अति अनूप |

ज्यों बरखा के संग में लुक-छुप खेले धूप ||


बढ़िया चर्चा के लिए- शुक्रिया.
बहुत ही श्रम से सजाई गयी पोस्‍ट।
September 23, 2011 9:13 AM

Vishaal Charchchit said..
.बहुतै अच्छा लिख गए हे रविकर कविराय
अब कुछ ऐसा सूत्र बताओ भाग गरीबी जाय....
September 23, 2011 3:08 PM

BloggerBlogger रविकर said...
रेखा-फीगर शून्य हो,
बने करीना कैट |
गौण गरीबी गुमे गम,
बोलो हाउज-दैट ||


Vishaal Charchchit said...
पर ये अमीरी में लिपी पुती सारी की सारी अंकल
यहाँ प्याज का नहीं ठिकाना, कहते हो पकोड़े तल|


Ravikar said---
बड़ी   हरेरी   है  चढ़ी,  बत्तिस   रूपया   पाय |
फोटो देखो प्याज का, सुन बचुआ चितलाय ||




26 comments:

  1. रविकर जी!
    आज तो आपने बहुत परिश्रम करके चर्चा मंच को सजाया है!
    लिंक भी बहुत बढ़िया दिये हैं।
    आभार।।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर तरीके से सजा आज का चर्चा मंच
    मन प्रसन्न हो रहा देख नए रंग |
    आपका आभार मेरी रचना शामिल करने के लिए |
    आशा

    ReplyDelete
  3. मेहनत से सुन्दर सजाया है चर्चा मंच आपने.
    मेरी ग़ज़ल को स्थान दिया,कृतज्ञ हूँ.

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  4. आशुकवि रविकर जी और अपना चर्चा मंच
    लिंक सजे हैं कीमती - कहीं-कहीं पर पंच.
    कहीं -कहीं पर पंच , हमें भी पंच बनाया
    सब लगते सरपंच ,मंच इस तरह सजाया.
    आनंदित सब हुये, लिंक सुंदर- से पढ़कर
    जय हो दिनेशकुमार गुप्ता,आशुकवि रविकर.

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  5. धन्य-धन्य यह मंच है, मधुर टिप्पणी पाय |
    भाषा के उत्थान की, आशा रही जगाय ||

    ReplyDelete
  6. फिर वही त्रुटि रविकर.....
    --मंच पुल्लिंग है...आशा रहा जगाय होना चाहिए...

    ReplyDelete
  7. धन्य-धन्य यह मंच है, मधुर टिप्पणी पाय |
    भाषा के उत्थान की, आशा रहा जगाय ||

    ReplyDelete
  8. वाह बेहतरीन चर्चा रही आज की सजी धजी आपकी तो खैर बात ही निराली है

    ReplyDelete
  9. बहुत बहुत धन्यवाद रविकर जी मेरे ब्लॉग को यहाँ स्थान देने के लिए।

    सादर

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  10. बहुत ही अद्भुत ढंग से सजाई गई बेहतरीन चर्चा | आपको बहुत-बहुत बधाई रविकर जी साथ ही धन्यवाद भी, इतने सारे उम्दा रचनाओ के लिंक्स एक जगह उपलब्ध कराने के लिए |जी साथ ही धन्यवाद भी, इतने सारे उम्दा रचनाओ के लिंक्स एक जगह उपलब्ध कराने के लिए |

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  11. अच्छे लिंक्स, अच्छी चर्चा..चर्चा की शुरुआत में लगी तस्वीरें ना सिर्फ खूबसूरत हैं बल्कि देश की एक झलक दिखाती हैं।
    बहुत बढिया..

    ReplyDelete
  12. रविकर जी!
    आज तो आपने बहुत परिश्रम करके चर्चा मंच को सजाया है!
    लिंक भी बहुत बढ़िया दिये हैं।
    आभार।।

    ReplyDelete
  13. मनमोहन सिंह बराबर गांधीजी के तीन बन्दर इससे सुन्दर चयन चर्चा मंच में और क्या हो सकता है .सार्थक हो गया आजका दिन .

    ReplyDelete
  14. रविकर जी ,बहुत बढ़िया लिंक हैं । बहुत बढिया..आभार।

    ReplyDelete
  15. बहुत ही अच्छी प्रस्तुति,बेहतरीन पोस्ट्स

    ReplyDelete
  16. लिंकों पर जाने से पूर्व उदगार व्यक्त कर देने को मन आतुर है...

    इतनी सुन्दर चर्चा पता नही कितने दिनों बाद पढ़ रही हूँ...

    सबकुछ ऐसे सजाया गया है कि एक ही बार में सम्पूर्ण पढ़े बिना मन नहीं मानने वाला है...

    बहुत बहुत आभार काव्यमयी मनोहारी श्रमसाध्य इस वृहत चर्चा के लिए ....

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  17. सर्वप्रथम नवरात्रि पर्व पर माँ आदि शक्ति नव-दुर्गा से सबकी खुशहाली की प्रार्थना करते हुए इस पावन पर्व की बहुत बहुत बधाई व हार्दिक शुभकामनायें। चर्चा मंच सुसज्जित ऐसा हटने का मन करे नही धीमी चाल से चला कंप्यूटर समय पूरो परे नही……रविकर जी को पुन: बहुत बहुत बधाई व आभार……करीब तीन बजे से बैठा हूं बज रहा है छ: पढ़ पाया बमुश्किल से रचनायें तेरह्……

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  18. बहुत सुन्दर लिंक सहेजे हैं।

    ReplyDelete
  19. रविकर चर्चा मंच की प्रस्तुति अति अनूप |
    ज्यों बरखा के संग में लुक-छुप खेले धूप ||

    बढ़िया चर्चा के लिए- शुक्रिया.
    बहुत ही श्रम से सजाई गयी पोस्‍ट।

    Again .

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  20. बड़े ही सुन्दर सूत्र।

    ReplyDelete
  21. अच्छे सुन्दर लिंक्स .

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  22. कमाल की चर्चा है आज ... लाजवाब लिंक हैं सभी ... शुक्रिया मुझे भी शामिल करने का ...

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  23. सभी बढ़िया लिंक्स देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

    मेरी पोस्ट को चर्चा मंच में शामिल करके आपने जो सम्मान दिया है और उत्साहवर्द्धन किया है, उस के लिए मैं आपकी बेहद आभारी हूं.
    व्यस्ततावश आने में विलम्ब हुआ....क्षमाप्रार्थिनी हूं.

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