Followers

Sunday, February 24, 2013

"कैसी है ये आवाजाही" - चर्चा मंच-1165

"जय माता दी" रु की ओर से आप सभी को सादर प्रणाम. 

जम जाता है लहू जहाँ पर,
पहरा देते वहाँ सिपाही।
मातृभूमि के लिए शहादत,
देते हैं जाँबाज सिपाही ।।
कैसे सुधरे दशा देश की,
शासन की चलती मनचाही ।
सुरसा सी बढ़ती महँगाई,
मचा रही है यहाँ तबाही ।
सुनीता शानू
सेल की दुकान देखते देखते
एक आदमी
नरक के दरवाजे आ गया
यमराज को देख घबरा गया
बोला हे महाराज
इतनी जल्दी क्यों मुझे बुलाया
अभी तो मेरा समय नही आया
चेतन रामकिशन "देव"
बारूद से लफ्जों का बदन, जलने लगा है!
लगता है रवि प्रेम का, अब ढ़लने लगा है!
एक पल में ही लग जाती हैं, लाशों की कतारें,
फिर रंज का एहसास यहाँ, पलने लगा है!
लगता है बड़ा गहरा है, ये दहशत का दौर है!
जिस ओर भी देखो वहीँ, नफरत का शोर है!
इन्सान ही इन्सान को अब, छलने लगा है!
बारूद से लफ्जों का बदन, जलने लगा है!"
अजय मलिक (c)
सचमुच मैंने
दिल दिया ही नहीं था
दिलफेंक नहीं था...
कोई जबरदस्ती
चुराकर भागा और
लापता हो गया ।
बोलो क्या करूँ अब
इस बेदिली का
प्रवीन मलिक
अपने सब बेगाने हो गए , न किसी का साथ मिला !
सब सपने टूट गए , गम का कुछ ऐसा साथ मिला !!
तनहाइयों ने दी पनाह , तो सोचने का अवसर मिला !
अब सोच को देना था रूप , पर न कोई मंच मिला !!
अपने में ही खोये रहे , ना मन का कोई मीत मिला !
अपना बनके जो भी मिला , उसने जी भर के ठगा !!
इंसानों की इस बस्ती में , ना कोई ऐसा इंसान मिला
इंसानियत की तो बात क्या , बस शैतान का ही रूप मिला !!
मनोज नौटियाल
राजनीति के सिलबट्टे पर घिसता पिसता आम आदमी
मजहब के मंदिर मस्जिद पर बलि का बकरा आम आदमी ||
राजतंत्र के भ्रष्ट कुएं में पनपे ये आतंकी विषधर
विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||
क्या है हिन्दू, क्या है मुस्लिम क्या हैं सिक्ख इसाई प्यारे
लहू एक हैं - एक जिगर है एक धरा पर बसते सारे
एक सूर्य से रौशन यह जग , एक चाँद की मस्त चांदनी
विस्फोटों से विचलित करते सबको ये बेनाम आदमी ||
सुशीला शिवराण ‘शील’
वहाँ..........
वो लाश जो खून से लथपथ पड़ी है
बम के छर्रों ने नहीं छोड़ा पहचान के काबिल
उड़ा दिए हैं शरीर के पर्खच्चे
बाँया हाथ कहीं दूर जा गिरा है
शेष झुलसे, खून से सने अवयव
देते हैं तुम्हें चुनौती
पहचान सको तो पहचानो
कौन था मैं
हिन्दू, मुसलमान या क्रिस्तान
नहीं पहचान सके ना?
आज मेरा ये ब्लॉग एक साल का हो गया.....
अनुलता राज नायर
काश !
सरस
मास्टर टैक टिप्स
आमिर अली दुबई
सदा
अरुण जी की कुंडली
अनगढ़ मिट्टी पा रही , शनै: - शनै: आकार
दायीं - बायीं तर्जनी , देती उसे निखार
देती उसे निखार , मध्यमा संग कनिष्का
अनामिका अंगुष्ठ , नाम छोड़ूँ मैं किसका
मिलकर रहे सँवार , रहे ना कोई घट - बढ़
शनै: - शनै: आकार , पा रही मिट्टी अनगढ़ ||
-- 
रविकर की टिप्पणी
भगदड़ दुनिया में दिखे, समय चाक चल तेज |
कुम्भकार की हड़बड़ी, कृति अनगढ़ दे भेज |
कृति अनगढ़ दे भेज, बराबर नहीं अंगुलियाँ |
दिल दिमाग में भेद, मसलते नाजुक कलियाँ |
ठीक करा ले चाक, हटा मिटटी की गड़बड़ |
जल नभ पावक वायु, मचा ना पावें भगदड़ ||
  Shalini Rastogi
मशविरा कोई तो दो यारों कि सर को झुकाऊं
कहाँ इधर कूचा - ए - यार है, उधर मस्जिद खड़ी है
पी के जो ज़रा बहके कि सबक पढ़ाने लगी दुनिया
होश में रहने को यारों, ज़िंदगी बहुत ही बड़ी है
रात की खुमारी ही उतरी न थी अब तक कि
सुबह तल्ख़ सच्चाई फिर रु-ब-रु खड़ी है
दो घूँट ही चढ़ाई थी कि छिपते फिर रहे थे हम
क्या करें जनाब-ए-शेख की, नाक बहुत बड़ी है .
अशोक सलूजा
मैंने अपनी आँख का आप्रेशन करवाया था
डाक्टर साहब ने दस दिन का रेस्ट बताया था
मेरी आँखों पे काला चश्मा लगवाया था
मुझे लैपटॉप से दूर रहने को जताया था
बस इस लिए आप की पोस्ट न पढ़ पाया था ....
गृह मंत्रीजी कहिन
वीरेंद्र कुमार शर्मा
सजदे में उसके जाऊं क्यूँ
तुषार राज रस्तोगी
आराधना का ब्लॉग
आराधना चतुर्वेदी ’मुक्ति’
Ocean of Bliss
रेखा जोशी
प्रतिभा वर्मा
फिर बसन्त आयो रे ...
बहार भरा मौसम लायो रे
खेतों में फूली है
सरसों पीली - पीली
जैसे मानो लगी है
दिल को हरसाने
फिर बसन्त आयो रे ...
विभा रानी श्रीवास्तव
(1) पीली चुनर
ओढ़े हठी धरणी
मधुऋतु में
*************
(2) षट रागिनी
कुहू लगे मन पे
कुसुमागम
*************
अर्चना
सुना था मैंने
वो जो बहती है न!
नदी होती है
लेकिन जाना मैंने
वो जो बहती है न!
जिंदगी होती है...
सुना था मैंने
वो जो कठोर होता है
पत्थर होता है
 
एम.आर.अयंगर.
--------------
उम्मीद
--------------
मन गा रहा है,
चमन गा रहा है,
तुमसे मिलेंगें,
ये चेहरे खिलेंगे,
फिर चार दिन की मुलाकात होगी,
बीते दिनों की कुछ बात होगी,
अरुन साथी
जिंदगी जी जाती है अपने हिसाब है।
गुमराह लोग जीते है नजरे किताब से।।
सोहबत से जान जाओगे फितरत सभी का।
एक दिन झांक ही लेगा चेहरा नक़ाब से।।
शाकी को क्यों ढूढ़ते हो मयखाने में साथी।
रहती है यह संगदिल हसीनों के हिजाब में।।
वंदना गुप्ता
मैने तो सीखा ही नही
मैने तो जाना ही नहीं
क्या होता है प्रेम
मैने तो पहचाना ही नहीं
क्योंकि
मेरा प्रेम तुम्हारा होना माँगता है
तुमसे मिलन माँगता है
तुम्हारा श्रंगार मांगता है
तुमसे व्यवहार माँगता है
मेरा प्रेम भिखारी है
मेरा प्रेम दीनहीन है
अन्त में देखिए..  
कार्टून:-आतंकी हमले की गारंटीशुदा सूचना
 मित्रों इसी के साथ मुझे विदा दीजिये, अगले रविवार फिर मिलेंगे एक नई चर्चा के साथ तब तक के लिए प्रणाम. आप सब चर्चामंच पर गुरुजनों एवं मित्रों के साथ बने रहें.
 आगे देखिये ------- मयंक का कोना
(१)

ख्वाब

बुरे स्वप्न पाकर सदा, मन हो जाता खिन्न।
ख्याल सताते सुमन में, मिटन न उसके चिन्ह।।
(२)
इर्द-गिर्द मत झाँकिये, अपनी थाली देख।
उसकी चुपड़ी देख के, मत सूखी को फेंक।।

29 comments:

  1. अरुण भाई बहुत सुन्दर लिंक्स | मेरी पोस्ट को शामिल करने हेतु आभार |

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति अरुण जी!
    आभार!

    ReplyDelete

  3. बढ़िया लिंक्स ने अच्छे ब्लॉग्स पढवाए !

    ReplyDelete
  4. सार्थक प्रयास ....अभिव्यक्तियों को स्वर देता ....

    ReplyDelete
  5. सार्थक लिंकों का सुंदर संयोजन,,,अरुण जी बधाई,,,

    Recent post: गरीबी रेखा की खोज

    ReplyDelete
  6. वाह अरुण जी.....
    सारे दिन का सुन्दर इंतजाम है...
    लिंक्स धीरे धीरे देखती हूँ.
    हमारी पोस्ट को शामिल करने का शुक्रिया.

    अनु

    ReplyDelete
  7. काफी मेहनत की है अरुण। चर्चा काफी सुसज्जित लग रही है।

    ReplyDelete
  8. बहुत उम्दा
    मेरी नई रचना
    खुशबू
    प्रेमविरह

    ReplyDelete
  9. बहुत बहुत आभार अरुण कुमार अनंत जी , की आपने मेरी रचना को मंच पर चर्चा एवं अवलोकन हेतु लगाया | चर्चा मंच एक सार्थक प्रयोग है , युवा कवियों को पढने का और आपस में सीखने का अनुभव बड़ा ही मनोहर है | शुभकामनाएं |

    ReplyDelete
  10. वाह वाह बहुत सुंदर चर्चा सजाई है प्रिय अरुण बहुत-बहुत बधाई

    ReplyDelete
  11. सुन्दर और पठनीय चर्चा लिंक !!

    ReplyDelete
  12. अरुण,बहुत ही रोचक एवं पठनीय सूत्र जोड़े हैं आपने ,खुश रहिये

    ReplyDelete
  13. मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार...बहुत ही सुन्दर, सार्थक , सरस लिंक्स...

    ReplyDelete
  14. बढ़िया और सुव्यवस्थित चर्चा |

    ReplyDelete
  15. आभार शास्त्री जी ,अरुण जी बधाई !

    ReplyDelete
  16. उम्र ढल गई चलते-चलते,
    लक्ष्य नहीं पाता है राही।
    बढ़िया चित्रण कुराज का .शासकी य अव्यवस्था का .

    ReplyDelete
  17. क्या मारा है कनपटी पे सूचना प्रदाता मंत्रालय की .सूचना देकर ये निश्चित हो जाते हैं जैसे ये ही इनका मुख्य काम हो .

    अन्त में देखिए..
    Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून

    कार्टून:-आतंकी हमले की गारंटीशुदा सूचना

    ReplyDelete
  18. अरुण जी की कुंडली
    अनगढ़ मिट्टी पा रही , शनै: - शनै: आकार
    दायीं - बायीं तर्जनी , देती उसे निखार
    देती उसे निखार , मध्यमा संग कनिष्का
    अनामिका अंगुष्ठ , नाम छोड़ूँ मैं किसका
    मिलकर रहे सँवार , रहे ना कोई घट - बढ़
    शनै: - शनै: आकार , पा रही मिट्टी अनगढ़ |
    जितनी बढ़िया कुंडली ,उतनी ही रही अनुकुंडली .

    ReplyDelete
  19. पिलपिलाया गूदा है ।
    छी बड़ा बेहूदा है । ।

    मर रही पब्लिक तो क्या -
    आँख दोनों मूँदा है ॥

    जा कफ़न ले आ पुरकस
    इक फिदाइन कूदा है । |

    कल गुरू को मूँदा था
    आज चेलों ने रूँदा है ॥

    पाक में करता अनशन-
    मुल्क भेजा फालूदा है ॥


    जो कहते हैं ,करके दिखाते हैं ,

    ये सूचना प्रदाता ,देखो फिर भी इठलाते हैं .

    ReplyDelete

  20. बधाई .सफर ये तुम्हारा बढे यूं ही आगे से आगे .....और आगे

    ReplyDelete

  21. बधाई .सफर ये तुम्हारा बढे यूं ही आगे से आगे .....और आगे

    my dreams 'n' expressions
    आज मेरा ये ब्लॉग एक साल का हो गया.....
    अनुलता राज नायर

    ReplyDelete

  22. अरुण अनंत शर्मा भाई शुक्रिया हमने चर्चा मंच में बिठाने का .बढ़िया सेतु सजाने नयो को आजमाने का .

    ReplyDelete
  23. बहुत सुन्दर लिंक्स

    ReplyDelete
  24. अरुण जी सभी लिंक्स अछे हैं .....
    मेरी रचना को भी आज की चर्चा में शामिल करने के लिए आभार ...

    ReplyDelete
  25. अच्छे लिंक्स से सजा आज का चर्चा मंच |आपकी महानत का क्या कहना |
    आशा

    ReplyDelete
  26. बहुत सुन्दर लिंक संयोजन.... पूरे सप्ताह के लिए अच्छी खुराक पेश की है अरुण जी... धीरे धीरे इस पोस्ट का रसास्वादन करने में ही आनंद आएगा ... इस मंच पर बुलाने का शुक्रिया !

    ReplyDelete
  27. कल मोबाइल पर देखा , टिप्पणी नहीं कर पाया -
    बाहर था-
    शुभकामनायें प्रिय अरुण ||

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।