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Monday, August 15, 2016

"तिरंगे को सलामी" (चर्चा अंक-2435)

मित्रों 
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
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जिस उपवन में पढ़े-लिखे हों रोजी को लाचार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

जिनके बंगलों के ऊपर,
निर्लज्ज ध्वजा लहराती,
रैन-दिवस चरणों को जिनके,
निर्धन सुता दबाती,
जिस आँगन में खुलकर होता सत्ता का व्यापार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार... 
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आज़ादी लेकिन एक वर्जित शब्द हो गया... 

Pratibha Katiyar  
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GST के शुद्ध राजनीतिक मायने 

(GST पर ऑस्ट्रेलिया के SBS RADIO से बातचीत भी आप सुन सकते हैं।) 
आर्थिक सुधारों की बुनियाद पर कर सुधार के साथ देश की एक शानदार आर्थिक इमारत तैयार करने की कहानी को आगे बढ़ाने का नाम है गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स... 
HARSHVARDHAN TRIPATHI 
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आज़ादी : 

क्या खोया, क्या पाया? 

...सही मायने में आज़ादी का लुफ्त उठाने के लिए हमें अपना दायित्व समझना होगा। हमें सरकार को कोसना बंद कर, वोट देने जाना होगा। सर्वेक्षण बताते है कि पढ़े-लिखें और अमीर लोग वोट कम देते है। जब पढ़े-लिखें लोग अपना दायित्व समझकर बराबर वोट देंगे, तो संसद में अच्छे लोगों के जाने से देश की हालत सुधरेंगी। हमें सिविक सेंस का ध्यान रखकर निष्ठावान एवं स्वाभिमानी बनना होगा। जिस दिन हम सवा सौ करोड़ भारतीयों के दिल में अपना दायित्व बोध जागेगा, हम क्षेत्रियवाद एवं जातिवाद से उपर उठ कर सोचेंगे, उस दिन हमें विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकेगा... 
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जज्बातों की बात 

सब जज्बातों की बात है 
कही प्रेम तो कही कपटी चाल है 
उड़ाता मख़ौल बचपन की वो बात है 
वक़्त के साथ बदल गयी 
जज्बातों की बारात है... 
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL 
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मिली आज़ादी 

मंहगी पड़ी बड़ा मोल चुका के मिली आज़ादी ! 
टुकड़े हुए बँट गया वतन रोया भारत ! 
आज़ादी आई ढेर सा अवसाद साथ में लाई... 
Sudhinama पर sadhana vaid 
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उदय अजेय है, और वह वध्य नहीं है, 

वह अपनी आत्मा में अस्सी से अधिक घाव लिए हुए है 

और हरदम हंसता ही मिलता है 

हमारी आवाज़परशशिभूषण  
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नमामि भूमि वत्सले 

आजादी के शुभ-दिवस पर
केसरिया रंगों में सजकर
वादे के गुच्छों को सजाकर
मर मिटने की कसमें खाकर
हर्षित होते अतिथि विशेष
कहते कुछ दयनीय परिवेश... 
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वार्षिक साहित्यिक सम्मानों के लिए 

प्रविष्टियाँ आमंत्रित 

रायपुर । 
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और हिंदी-संस्कृति को प्रतिष्ठित करने के लिए साहित्यिक वेब पत्रिका ‘सृजनगाथा डॉट कॉम’ द्वारा पिछले 12 वर्षों से प्रतिवर्ष दिए जाने वाले सम्मानों व पुरस्कारों के लिए पाठकों, रचनाकारों, प्रशंसकों, समीक्षकों, संस्थाओं और प्रकाशकों से अनुशंसात्मक प्रविष्टियाँ 30 नवंबर 2016 तक आमंत्रित हैं। इन सम्मानों का निर्णय वरिष्ठ साहित्यकारों के निर्णायक मंडल द्वारा किया जाएगा । ये सम्मान 13 वें अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, बाली/इंडोनेशिया (2 फरवरी से 9 फरवरी, 2017) में प्रदान किए जाएँगे... 
Shabdankan पर Bharat Tiwari  
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...अब आपको बताते हुए बहुत ख़ुशी मिल रही है कि आपका यह अपना यूपीवीआईपी न्यूज़ का पोर्टल भी इस भागमभाग में शामिल हो रहा है और आपको विश्वास दिलाता है कि यह पोर्टल आपके और अपने पत्रकार साथियों के सहयोग से खबरों की तह तक पहुचकर आमजन को सच्चाई से रूबरू करायेगा... 
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कहानी जारी है 

 ट्रेन तो छूट गयी मगर लखनऊ पहुंचने का आत्मविश्वास कायम था । जबकि यह छूटने वाली ट्रेन उस रुट पर जाने के लिए अंतिम ट्रेन थी दिल्ली से जाने के लिए। एक ट्रेन और थी मगर लखनऊ ऐसी स्पेशल उसे केवल 11 बजे रात को जाने के लिए दिखाया जाता है ऑनलाइन मगर ऑफलाइन कभी जाते हुए देखा नहीं । फिर भी इसमें भी ट्राई किया ही जा सकता है ऐसा सोंचकर थोड़ा पसीना पोंछते हुए पूछताछ काउंटर की और हम दोनों प्रस्थान करने लगते है......  
प्रभात 
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दोहे 

भारत में हर मास में, होता इक त्यौहार 
केवल सावन मास है, पर्वों से भरमार... 
कालीपद "प्रसाद" 
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जड़ से उखड़े लोग 

विस्थापन लोगों को जड़ो से उखाड़ता है। देश भर में और शायद दुनिया भर में भी विकास बनाम पर्यावरण, वन्य जीव बनाम इंसान जैसी बहसें चल रही हैं और शायद बुद्धिजीवी तबके से लेकर सरकारें और संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं तक पर्यावरण, विकास, वन्यजीवों के संरक्षण और मानव के कल्याण और उनके रहवास जैसे विषयों की प्राथमिकता पर एकमत होने की कोशिशों में लगे हैं। आज मैं वन्य जीवों के संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं में से एक के बारे में बात करना चाहता हूँ... 
गुस्ताख़ पर Manjit Thakur 
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पहले हम जो गाली देते ,तो जुबान गन्दी होती थी 
खुलेआम,अंटशंट कहने पर ,थोड़ी पाबन्दी होती थी...  
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भागते भूत की लंगोटी भली!’ यह कहावत बहुत ही कही-सुनी जाती है पर वह लंगोट पहना भूत अभी तक मुझे नहीं दिखा। काफी दिनों से इस फेरा में हूँ कि कहीं वह भूत दिख जाए और वह भी भागते हुएऔर वह भी अपनी लंगोटी को छोड़कर। कब ऐसा होगाखैर अभी तो मन मेंइस कहावत के अर्थ सेमतलब से नहीं अपितु इस बात से कौतुहल उत्पन्न हो रही हैशंका उत्पन्न हो रही है कि अगर यह लंगोट किसी भूत की थी तो वह पहना क्यों नहीं था, क्या किसी दरजी से अभी नया-नया सिलवाया था और हाथ में लिए जा रहा था, तभी किसी कारण बस भागने लगा और लंगोट हाथ से छूटकर गिर गई?क्या है इस लंगोट का माजरा? आखिर क्यों बनी ऐसी कहावत,.. 
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एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया। उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!! ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे... 
सुज्ञ
सुज्ञ 
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"सब कुछ अभी ही लिख देगा क्या" (चर्चा अंक-2819)

मित्रों! शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...