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Saturday, August 20, 2016

"आदत में अब चाय समायी" (चर्चा अंक-2440)

मित्रों 
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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Mukesh Kumar Sinha 

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पावर कट अच्छा है ...... 

बूढ़ी दादी उकताई सी टी वी देख रही है। " कोई सारे दिन टी वी देखकर या पूजा पाठ कर कितना समय काट सकता है !" कहने को तो परिवार का हर सदस्य उनकी इज्जत, प्यार करता है ।पोते-पोती भी थोड़ा समय देते भी हैं पर ...., सोचते हुए दादी उदास हो गई । तभी हलचल भरे घर में शांति छा गई । " ओ हो ! लाइट ने अभी जाना था... 
नयी दुनिया+ पर Upasna Siag 

धागे सुनहरे रह गए 

भूल गए अनुबंन्धों को 
धागे सुनहरे रह गए - 
सुनने वाले कत्ल हुए  
ले तमगे बहरे रह गए... 
udaya veer singh 
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मति का धीर : 

गुरदयाल सिंह 

*गुरदयाल सिंह राही* 
(10 January 1933 – 16 August 2016) 
अमृता प्रीतम के बाद पंजाबी भाषा के ऐसे दूसरे रचनाकार हैं जिन्हें भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान प्राप्त हुआ था. उनके उपन्यासों के देश– विदेश में अनुवाद हुए और उनपर फिल्में बनीं. उन्हें रूस से सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार भी मिला. इनकी तुलना रूस के महान उपन्यासकार मक्सिम गोर्की से की जाती है... 
समालोचन पर arun dev 
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तार राखी में भर नेह बहना 

जब करूँ याद तुम चले आना  
छोड़ बहना कभी नहीं जाना ..  
Ocean of Bliss पर 
Rekha Joshi  
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तुम्हारे एहसास को... 

रात बेवक़्त जब नींद खुलती है,  
मैं तुम्हारे ख्यालो की स्याही से,  
 आँखों के रत-जगे लिख देती हूँ..  
हवा का कोई झोंका, 
जब दरवाज़े का सांकल खटखटाती है 
मैं तुम्हारे आने की आहट लिख देती हूँ... 
'आहुति' पर Sushma Verma 
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चहकती है राखी  

(राखी पर 15 हाइकु) 

1.   
प्यारी बहना   
फूट-फूट के रोई   
भैया न आया !   
2.   
राखी है रोई   
सुने न अफ़साना   
कैसा ज़माना !   
3.   
रिश्तों की क्यारी   
चहकती है राखी   
प्यार जो शेष !   
4.... 
लम्हों का सफ़र पर डॉ. जेन्नी शबनम 
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खुशबू 

खुशबू अनोखी के लिए चित्र परिणाम
भीनी भीनी सी सुगंध
जैसे ही यहाँ आई
तुम्हारे आने की खबर
यहाँ तक ले आई
हम जान लेते हैं
तुम्हें पहचान लेते है... 
Akanksha पर Asha Saxena 
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कैसे भूलूँ और कैसे याद करूँ .. 

Yeh Mera Jahaan पर 
गिरिजा कुलश्रेष्ठ 
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“आ गईं महारानी ! सिंगार पटार से फुर्सत मिले तो काम की सुध आये ना ! घड़ी देखी है क्या टाइम हुआ है ? और क्यों री, ये कैसे बेढंगे कपड़े पहन कर आई है ! आग लगे इस फैशन को ! ढंग के कपड़े नहीं हैं तेरे पास... 
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 परदेशों से चलकर आई।
चाय हमारे मन को भाई।।

कैसे जुड़ा चाय से नाता,
मैं इसका इतिहास बताता,
शुरू-शुरू में इसकी प्याली,
गोरों ने थी मुफ्त पिलाई।
चाय हमारे मन को भाई... 

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"स्मृति उपवन का अभिमत" (चर्चा अंक-2814)

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