Followers

Friday, July 19, 2019

"....दूषित परिवेश" (चर्चा अंक- 3401)

शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
--
--
--
--

स्पर्श.... 

छू कर जरा सा 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा  
--
--
--

हिरणा समझ बूझ बन चरना  

पर्यावरण से लेकर जल जंगल जमीन की चिंता करने वाले करने वाले हिंदी से लेकर आंग्ल तक लेखकों का एक बड़ा समूह है जो सब कुछ लिखता है और बदले में पैसे कमाता है - अपने साथ-साथ अपने कुत्ते बिल्ली के नाम से भी यह लोग लिखकर पैसा कमा रहे हैं

इधर एक नया ट्रेंड जागा है कि इस पूरे कचरे को किताब के रूप में लाया जाए और इनकी कमजोरी का फायदा उठाकर कुछ प्रकाशक देशव्यापी अभियान चलाकर देश भर के ऐसे लेखकों को ढूंढ रहे हैं जो किताब छपवाने के लिए बेचैन है.... 
ज़िन्दगीनामा पर Sandip Naik 
--
--
--

सदा वसंत रहे जब मन में 

एक जीवन है हम सबका जीवन, यानि सामान्य जीवन, जिसमें कभी ख़ुशी है कभी गम हैं. इस जीवन में जिन खुशियों को फूल समझकर हमने ही चुना था वे ही अपने पीछे गम के कांटे छुपाये हैं यह बात देर से पता चलती है. इस जीवन में छले जाने के अवसर हर कदम पर हैं, क्योंकि यहाँ असलियत को छुपाया जाता है, जो नहीं है उसे ही दिखाया जाता है. एक और जीवन है ज्ञानीजन का जीवन, जिसमें सदा वसंत ही है, जिसमें खुशियों के फूलों को चुनने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वे स्वयं ही फूल बन जाते हैं...
--

हम किसका दाना चुग रहे हैं! 

आज जो हो रहा है, वही कल भी हो रहा था, हर युग में हो रहा था। हम पढ़ते आए हैं कि राक्षस बच्चों को खा जाते थे, आज भी बच्चों को खाया ही जा रहा है। मनुष्य और दानवों का युद्ध सदैव से ही चला आ रहा है। समस्याएं गिनाने से समस्याओं का अन्त नहीं होता अपितु समाधान निकालने से अन्त होता है। जंगल में राक्षसों का आतंक मचा था, ऋषि वशिष्ठ राजा दशरथ से राम को राक्षसों के वध के लिये मांगकर ले जाते हैं और राम राक्षसों का वध करते हैं। ऐसे ही पुराणों में सभी समस्याओं का समाधान है लेकिन हम केवल समस्याओं से भयाक्रान्त होते हैं, समस्या समाधान की ओर नहीं बढ़ते है... 
--

वनीला कॉफ़ी 

Bhavana Lalwani   
--
--
--

वो हवा के साथ है 

देशभक्ति को बढ़ाने की फिजा के साथ है 
दीप के जो साथ दिखता वो हवा के साथ है ... 
मनोरमा पर श्यामल सुमन 
--

जाल 

Sunehra Ehsaas पर Nivedita Dinkar 
--

एक जीवन यात्रा और उसमें कितनी यात्राएँ 

अटक जाती है साँस कभी

कभी जीवन भी अटक जाता है

अटकी हुई बात कोई

घुटन हो  
कंठ में ही नहीं 
रोम-रोम जब रुदन हो ... 

नुशील पर अनुपमा पाठक  
--
--

7 comments:

  1. सुंदर संयोजन!
    आभार!

    ReplyDelete
  2. सुप्रभात सर 🙏 )
    बहुत ही सुन्दर सजी चर्चा प्रस्तुति 👌,सभी रचनाएँ शानदार, मेरी रचना को स्थान देने के लिए तहे दिल से आभार, सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनायें
    सादर

    ReplyDelete
  3. शानदार चर्च अंक सुंदर लिंको का चयन सभी रचनाकारों को बधाई।

    ReplyDelete
  4. सुन्दर शुक्रवारीय चर्चा।

    ReplyDelete
  5. वाह!!बहुत सुंदर चर्चा !

    ReplyDelete
  6. सुंदर चर्चा. शुक्रिया

    ReplyDelete
  7. शुक्र है ! शुक्रवार है !
    शुक्रिया शास्त्रीजी का !
    शुक्रिया सभी लिखने वालों का !
    शुक्रिया गंगा-जमुनी चर्चा का !

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।