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Monday, October 21, 2019

(चर्चा अंक- 3495) "आय गयो कम्बखत, नासपीटा, मरभुक्खा, भोजन-भट्ट!"

सादर अभिवादन।

हवा में ख़ूब घुल रहा है ज़हर,
प्रदूषण अब ढा रहा है क़हर,
साँस घुट रही पहर-दर-पहर,
धुंध में क्या सुबह क्या दोपहर।
रवीन्द्र सिंह यादव 
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भारत त्योहारों का देश है।  करवा-चौथ के बाद आज अहोई-अष्टमी है। इस दिन पुत्र की कामना लिये उपवास की परंपरा है जो अब एक आलोच्य विषय है। बेटा-बेटी में भेद रखने वाली सामाजिक बुराई पर सार्थक संदेश देती आदरणीय शास्त्री जी की दोहावली-

दोहे 

"पर्व अहोई-अष्टमी"

 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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आदरणीय प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जैसवाल जी के संस्मरण साहित्यिक धरोहर हैं जिनमें तत्कालीन समाज की दशा का सूक्ष्म चित्रण मिलता है जो समाज के बदलते स्वरुप की कहानी कहते हैं। आइए पढ़ते हैं 'तिरछी नज़र' ब्लॉग पर एक शानदार संस्मरण -

खीरगति

 तिरछी नज़र
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आज आलोचना किसी कोने में दुबककर सुबक रही है। आत्ममुग्धता की आँधी में आलोचना के तिनके हमें चुभने लगे हैं फलस्वरूप साहित्य में सृजन का स्तर वाँछित ऊँचाइयों तक पहुँचने से पूर्व ही हाँफने लगा है। पढ़िए आदरणीय संतोष त्रिवेदी का एक विशिष्ट व्यंग्य -

आलोचक की चपेट में साहित्य !
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टेढ़ी उँगली
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वर्तमान में दाम्पत्य जीवन में व्याप्त होती नीरसता और प्रेम के नये प्रतिमान प्रेम में आधुनिक मूल्यों की स्थापना कर रहे हैं। ध्रुव सिंह 'एकलव्य' जी की रचना रोबोटिक-प्रेम और स्वाभाविक प्रेम पर प्रकाश डालती हुई व्यापक संदेश छोड़ती है -

आभासी क्षितिज 

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शब्द बोलते हैं। शब्द का जीवंत होना ही जीवन है और शब्द का ख़ामोश हो जाना मृत्यु। न्यूनतम शब्दों में भाव गाम्भीर्य से ओतप्रोत सीमा सदा जी की एक ख़ूबसूरत एहसासात से सजी रचना आपकी नज़र -

परिक्रमा मन से मन तक !!

SADA 
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मख़मली जज़्बात को समेटे हमारे एहसासात से गुज़रती आदरणीया पम्मी सिंह 'तृप्ति' जी की मनमोहक प्रस्तुति आपकी सेवा में पेश-ए-नज़र है-

माहिया 

 गुफ़्तगू 
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सवालों की झड़ी लगाती अपने वजूद को स्वीकारती वक़्त को ललकारती अनीता लागुरी 'अनु' जी की मुखर अभिव्यक्ति में कई गंभीर सवाल किये गये हैं जो उन विशिष्ट परिस्थितियों से जूझ रहे व्याकुल दिल-ओ-जिगर को बींधते नज़र आते हैं। पढ़िए एक जीवंत चित्रण-

तुम क्यों नहीं..?
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अनु की दुनिया : भावों का सफ़र
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सुखों में सर्वश्रेष्ठ सुख आध्यात्मिक सुख है। आँचल पाण्डेय जी अपने लघु लेख में विस्तारपूर्वक चर्चा कर रहीं हैं सुख के प्रकारों और तत्त्वबोध के महत्त्व पर और भौतिकता के मायाजाल से सचेत रहने का आह्वान विचारणीय है-

सुख क्या है? 

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ज़िंदगी में अति ख़ुशनुमा लम्हात आते हैं पर कभी-कभी लेकिन वे यादों की पूँजी बनकर जमा हो जाते हैं। आनन्द सिंह शेखावत जी प्रस्तुत कर रहे हैं एक मर्मस्पर्शी रचना-

यादें तेरी 

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यथार्थपरक चिंतन में मार्मिकता की झलक को महसूस करा देना सृजन की सार्थकता है। आदरणीया अनुराधा चौहान जी पेश कर रहीं हैं अभावग्रस्त जीवन का एक हृदयस्पर्शी शब्दचित्र-

दफ़न हो जाते सपने

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भारतीय जीवन शैली में भोजन में अनेक शोधों के बाद जो सामग्री शामिल की गयी है वह आज तक अपनी उपयोगिता बनाये हुए है। मैंथी एक आयुर्वेद औषधि भी है।  स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करती एक प्रस्तुति आपकी सेवा में-

जादुई मैथीदाने के लज़ीज़ व्यंजन - 

मैथी खिचड़ी 

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और अब चलते-चलते पेश-ए-नज़र है आधुनिक कविता में युवा पीढ़ी का आधुनिक चिंतन। रवीन्द्र भारद्वाज जी की प्रेम में चलती उथल-पुथल का नया रूप पेश कर रहे हैं-

मेरे हाथ मे तेरा हाथ था

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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले सोमवार।


रवीन्द्र सिंह यादव 

16 comments:



  1. हालात मैंने बनाये या तुमने
    ये सवाल सुई की तरह मुझे चुभते हैं
    पर शायद तुम्हें क्यों नहीं..?
    अपने अहं के साथ तुम जीते रहे
    तिल-तिल दर्द के साथ मैं मरती रही..
    अनु जी की रचना की इन भावपूर्ण पंक्तियों में अनेक प्रश्न हैं। 
    परंतु यदि हम इस रचना पर आत्मचिंतन करें तो इस प्रश्न का एक ही उत्तर होगा कि इस लौकिक जगत में हम अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें, क्यों कि चहुँओर स्वार्थ भरा अनुबंध है या फिर सारे रिश्ते कच्चे धागे जैसा डोर है।
    अब रवींद्र जी की प्रस्तुति पर नजर डाले तो उन्होंने चर्चा मंच पर विविध विषयों को एक साथ पढ़ने और समझने का अवसर पाठकों को दिया है। विचारों के प्रदूषण का काला धुआँ जबतक मानव के मन- मस्तिष्क पर जमा रहेगा, धुंध छटने वाला नहीं है। 
    साहित्यकारोंं की लेखनी पर भी प्रश्न किया गया है। मेरा तो यही मानना है कि यदि हमारी रचनाओं से आम जनता को कुछ नहीं मिला , साहित्यकार इसी तरह आत्ममुग्ध होते रहे, परंतु उनकी रचनाओं का मोल जनता के लिए कुछ नहीं होगा। 
    सभी को सादर नमन।

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    1. जी धन्यवाद आदरणीय पथिक जी जी सहमत हूं आपके विचारों से चाहू और स्वार्थ भरा अनुबंध ही है हर रिश्ता स्वार्थ की तराजू पर तौला जाता है तो फिर पति पत्नी का रिश्ता इससे कैसे बच सकता हैपरंतु जब एक स्त्री अपने अंदर के अस्तित्व को खोखला पाती है तब वो चीत्कार उठती है... कहीं ना कहीं उसके अंदर सुप्त पड़ा ज्वालामुखी...बाहर आने को उबल पड़ता है.. बस इसी झंझावात को लिखने का प्रयास किया मैंने और आपने अपने विस्तृत विचार रखें जिसे पढ़कर मुझे बेहद प्रसन्नता हुई...!!!

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  2. बहुत सुन्दर, मनभावन और पठनीय अद्यतन लिंक।
    आपका आभार आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी।

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  3. बहुत बहुत आभार,रविन्द्र जी और चर्चा मंच का,
    मेरी छोटी सी कृति को स्थान देने के लिये।

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  4. बेहतरीन संकलन.. रचनाकार के नाम सहित सभी रचनाओं के सारगर्भित परिचय ने प्रस्तुति को और अधिक सुन्दर और रोचक बना दिया है।

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  5. बेहतरीन प्रस्तुति के साथ सुंदर संकलन..
    हार्दिक आभार मेरी रचना को चर्चामंच पर शामिल करने के लिए।
    धन्यवाद।

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  6. चर्चा मंच के प्रवेश द्वार पर ही आपकी चंद पंक्तियों की अभिव्यक्ति ने मन मोह लिया रविंद्र जी.... आदरणीय एकलव्य जी की उपन्यास ..में फुलझरिया और जमुना बाई की संवाद की रेलमपेली गांव की पृष्ठभूमि की याद दिला देती है... खंड खंड करके इस रचना को पढ़ने का एक अलग ही अनुभव मिल रहा है.. वर्तमान समय में आधुनिक खान-पान ने हमारे मुंह का स्वाद ऐसा बिगाड़ा है कि मेथी के लजीज खिचड़ी आज ही बनाकर खाने का जी कर आया.. बहुत-बहुत धन्यवाद इतनी उपयोगी जानकारी को आज के संकलन में जोड़ने के लिए.. आदरणीय #अनुराधा चौहान जी की दफन होते सपने.. वाकई में एक बहुत ही मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया एक भारतीय परिवार की आर्थिक स्थिति का बहुत अच्छा चित्रण उन्होंने अपनी कविता के जरिए किया... आदरणीय रविंद्र जी आज के लिंक में आपने जीवन के अनेक खट्टे मीठे अनुभव का निचोड़ प्रस्तुत करने का प्रयास किया अन्य चयनित रचनाएं भी बहुत प्रभावी है मुझे भी शामिल करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद...!!!

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  7. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  8. बहुत ही सुन्दर सजी है चर्चामंच प्रस्तुति 👌
    बेहतरीन रचनाएँ, सभी रचनाकरो को हार्दिक शुभकामनाएँ
    सादर

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  9. हवा में घुलते ज़हर की ओर ध्यान आकर्षित करती आपकी पंक्तियों को कोटिशः नमन आदरणीय सर। आज प्रदूषण के रोकथाम पर निरंतर चर्चा की बहुत आवश्यकता है क्युन्कि जितने जल्दी लोग प्रदूषण की रोकथाम में अपना योगदान देने हेतु संकल्पित होते हैं उतने ही जल्दी भूल भी जाते हैं। एक ओर ये कसम खा कर आते हैं कि हम पेड़ लगायेंगे,पानी बचायेंगे वही दूसरी ओर बेवजह ही किसी कमरे की लाइट जलती छोड़ देते हैं। इस ओर जागरुकता की अत्याधिक आवश्यकता है।
    ये मनुष्य तन भी पंच तत्वों से निर्मित है अतः इसे भी एक स्वस्थ समाज हेतु शारीरिक और मानसिक ( मन के विकार ) प्रदूषण से मुक्त होना होगा।

    बाकी आपकी प्रस्तुति की हम क्या ही सराहना करें आदरणीय सर हर बार की तरह शानदार 👌। सभी रचनाएँ बेहद उम्दा और अंक बहुत सुंदर। सभी को ढेरों बधाई। हमारे छोटे से लेख को यहाँ स्थान देने हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर नमन शुभ संध्या 🙏

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  10. बहुत सुंदर प्रस्तुति मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय 🙏

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  11. आदरणीय रवींद्र जी सर्वप्रथम आपको और इस मंच को मेरा प्रणाम। आपकी दार्शनिकता एवं आपका कौशलपूर्ण चयन कजरौटा और टोटका को भी मात दे देता है। अंततः मैं यही कहूँगा, निरंतर आप प्रगति के पथ पर सत्य की मशाल लेकर दौड़ते रहें ,साथी ख़ुद- ब- ख़ुद मिल जायेंगे राहों में, हाथों में नासा वाली  उड़नतश्तरी लिये हुए। सादर  

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  12. वाह बेहतरीन प्रस्तुति

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  13. बेहतरीन व सारगर्भित कार्य योजना।

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