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Saturday, May 02, 2020

"मजदूर दिवस"(चर्चा अंक-3689)

स्नेहिल अभिवादन। 
शनिवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 
कल विश्वभर में कोरोना संकट के दौर में पहला मई दिवस संपन्न हुआ। 
 अब हमारे देश में कोरोना वायरस संक्रमण को नियंत्रण में लाने के लिए 
लॉक डाउन की अवधि दो सप्ताह और बढ़ा दी गई है। सभी लोग हिदायतों का पालन करें, 
महामारी से बचाव में अपना-अपना योगदान दें। 
-अनीता सैनी
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आइए अब पढ़ते हैं मेरी पसंद की कुछ रचनाएँ-
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तोड़ती पत्थर
वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।
कोई छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गई,
प्रायः हुई दुपहर :-
वह तोड़ती पत्थर।
देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
"मैं तोड़ती पत्थर।"

-सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' 


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My Photo
मैं अहसास की जमीन पर ऊगी
भयानक, घिनौनी, हैरतंगेज
जड़हीना अव्यवस्था हूं
जीवन के सफर में व्यवधान
रंग बदलते मौसमों के पार
समय के कथानक में विजन
My Photo
खेल जारी था.
हाँ, तो उसमें क्या हुआ?
मैंने कई बार चाल चली .
इनने टोका , ए क्या कर रही हो ?
मैं हँस कर रह गई .
और एक चाल चल दी.
 अपने पत्ते फेंककर ये मेरे पास चले आए 
अरे वाह, कमाल करती हो तुम..
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पेट की आग बुझाने के लिए रोटी अनिवार्य है।
 जब तक पेट में रोटी नही जाती तब तक सारी बातें खोटी लगती है।
 पापी पेट सबकुछ करवा सकता है। कहते हैं 
कि भूख की मार तलवार की धार से भी तेज होती है। 
भूखा कुत्ता भी डंडे की मार से नहीं डरता है 
और भूखा आदमी जितनी चीजें ढूंढ़ निकालता है, 
उतनी सौ वकील भी नहीं ढूंढ़ पाते हैं। 
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मेरे जानाँ ! न आजमा  मुझको
जुर्म किसने किया ,सज़ा मुझको
जिन्दगी तू ख़फ़ा ख़फ़ा क्यूँ है ?
क्या है मेरी ख़ता ,बता  मुझको
यूँ तो कोई नज़र नहीं  आता
कौन फिर दे रहा सदा मुझको
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धाम नवाबों के नगर,लखनपुरी है नाम ।
बागों का है ये शहर,लिये दशहरी  आम ।।
अविरल नदिया गोमती, उत्तर रहा प्रदेश ।
हँसते हँसते आप भी ,कुछ पल करें निवेश।।
आप आप पहले कहें,अद्भुत है तहजीब ।


अवध नज़ाकत जानिये, उर्दू रहे करीब ।।
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धरती के दो तारे टूटे 
उल्का तो गुजर गया दूर से,
र धरती के दो तारे टूटे।
ध्रुवतारा- से जगमग करते,
फिल्मी दुनियाँ के सितारें टूटे 
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शोहरत में ख़लल डालो 
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यह दृश्य मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था |
          होटल का मरियल मालिक 
अपने तगड़े नौकर को पीट रहा है 
और नौकर चुपचाप मार खा रहा है | 
मुझे चाय कसैली लगने लगी , 
साथ ही गुस्सा भी आने लगा
 कि नौकर सिर झुकाये मार क्यों खा रहा है ? 
यों नहीं कि मालिक को जड़ दे दो हाथ |
 एक हाथ खाते ही वहीँ बैठ जायेगा |
दबे पाँव बिन आहट के,
तांडव करती मौत खड़ी।
कोई आहट सुन न सका,
टूट रही है साँस कड़ी।
थोड़ी की लापरवाही,
फिर जीवन को खोना है।
ज़िंदगी सबका लील रहा,
जग फैला कोरोना है।
शहरों में कहाँ ख़ाली हो गए मज़दूरों के घर
बन बंजारा मज़दूर चल दिए
 अपने गाँव - घर
रास्ते की थकान को कम करने के लिए
 वह लिखता है ख़ुद पर एक कविता-
हर रात
अपनी हिम्मत को समेटे चल पड़ता हूँ
ऊबड़-खाबड़ सी वो राहें,
शान्ति अनंत थी घर-आँगन में।
अपनापन था सकल गाँव में,
भय नहीं था तब कानन में।
यहाँ भीड़ भरी महफिल में,
मुश्किल है निर्भय रह पाना।
दशकों पहले शहर आ गये,
नहीं हुआ फिर गाँव में जाना।
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'शब्द-सृजन-१९ का विषय है- 
"मुखौटा" 
आप इस विषय पर अपनी रचना (किसी भी विधा में) आगामी शनिवार (सायं 5 बजे) तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म (Contact Form ) के ज़रिये हमें भेज सकते हैं।चयनित रचनाएँ आगामी रविवासरीय चर्चा-अंक में प्रकाशित की जाएँगीं।
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आज सफ़र यहीं  तक 
फिर मिलेंगे आगामी अंक में 
-अनीता सैनी 
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14 comments:

  1. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति, बेहतरीन लिंक्स, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार अनीता जी।

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  2. निराला जी की रचना के साथ सुन्दर भूमिका।
    मजदूर दिवस को सार्थक करते, सुन्दर पठनीय लिंक।
    --
    आपका आभार अनीता सैनी जी।

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  3. सुगढ़ ,श्रमसाध्य और बेहतरीन प्रस्तुति अनीता जी .चयनित रचनकारों को हार्दिक बधाई .निराला की "वह तोड़ती पत्थर" ने स्कूल के दिन याद दिला दिये. बहुत बहुत आभार आपका इतनी सुन्दर कविता के लिए .

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  4. .. बहुत सुंदर प्रस्तुति ....निराला जी को पढ़ना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव है मेरी रचना को भी सम्मिलित करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

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  5. सारगर्भित संक्षिप्त भूमिका के साथ बेहतरीन प्रस्तुति।

    मज़दूरों को समर्पित महाकवि निराला जी की रचना 'वह तोड़ती पत्थर' से प्रस्तुति का सुंदर आग़ाज़।

    सभी रचनाएँ सरस एवं पठनीय हैं।

    सभी रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाएँ।

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  6. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति में मेरी पोस्ट शामिल करने हेतु आभार!

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  7. कैसी बिडंबना हैं " मजदुर दिवस " और मजदुर ही दुखी, बेबस ,लाचार और बेघर ,सुंदर भूमिका के साथ बेहतरीन प्रस्तुति अनीता जी ,सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं सादर नमस्कार

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  8. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति, बेहतरीन लिंक्स

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  9. सार्थक चर्चा की है आपने मजदूर दिवस पर अच्छी रचनाओं के साथ.. बधाई स्वीकार करें. मेरी लघुकथा शामिल करने के लिए आपका आभार 🙏

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  10. सुन्दर ,सार्थक प्रस्तुति , बधाई

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  11. बहुत सुंदर चर्चा प्रस्तुति

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  12. बहुत सुन्दर सार्थक चर्चा मंच सभी रचनाएं बेहद उत्कृष्ट....मेरी रचना को स्थान देने के लिए हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार।

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  13. 1889 में मजदूरों को समर्पित यह दिवस एक छुट्टी में बदल कर रह गया है ! सवा सौ साल से भी ऊपर हो गए; मजदूर वहीं के वहीं आस-पास हैं

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  14. सार्थक चर्चा अंक।
    सार्थक भूमिका और कालजयी रचनाओं के साथ सुंदर लिंक ।
    सभी रचनाएं सराहनीय सभी रचनाकारों को बधाई। मेरी रचना को शामिल करने के लिए तहेदिल से शुक्रिया।

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