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Sunday, May 03, 2020

शब्द-सृजन-19 'मुखौटा'(चर्चा अंक-3690)

स्नेहिल अभिवादन।
रविवासरीय प्रस्तुति में शब्द-सृजन-१९ का अंक लेकर उपस्थित हूँ 
जिसका विषय दिया गया था 'मुखौटा'.
मुखौटा एक प्रकार का छलावा होता है जो भ्रमित मनोरंजन और असलियत छिपाने का सुलभ साधन है। मुखौटों के प्रति हमारी अंधश्रद्धा और ख़ुद को भ्रम में रोमांचित करने की प्रवृत्ति ने इन्हें लोकप्रियता प्रदान की है. जब कई मुखौटे किसी ख़ास प्रयोजन के तहत अलग-अलग तरह का प्रलाप करते हैं तो सुननेवाले भ्रम में पड़ जाते हैं कि कौनसा मुखौटा क्या और क्यों बोल रहा है। 
-अनीता सैनी 
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आइए अब पढ़ते हैं मुखौटा विषय पर सृजित रचनाएँ-

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रेल-पटरी के ऊपर 
वर्षों पहले बने 
जर्जर ज़ंग लगे लोहे के पुल से 
गुज़रते हुए
चिंतनीय सवाल 
मुनिया ने बापू से पूछा-
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ऊंची इमारत सड़क बनाते
टूटी चीजें मरम्मत करते
हठ करते वो जिद्दी होते
श्रमिक ये सारे ऐसे होते.
जन सुविधा को सजाये रहते
विश्वास सबों से बनाये रहते
भूख प्यास को दबाये रहते
गम अनेकों छुपाये रहते.**

नया सवेरा

क्षितिज कभी मोबाइल तो कभी टीवी स्क्रीन पर निगाहें गड़ाए ऊब चुका था। ड्राइंगरूम के ख़ूबसूरत फ़िश बॉक्स में मचलती रंगबिरंगी मछलियाँ और पिंजरे में उछलकूद करता यह मिठ्ठू भी आज उसका मनबहलाने में असमर्थ था । **
आदरणीया साधना वैद जी की मुखौटे के विभिन्न आयाम दर्शातीं दो रचनाएँ-
मुखौटा 
मिथ्या बौद्धिकता,
झूठे अहम और छद्म आभिजात्य
के मुखौटे के पीछे छिपा
तुम्हारा लिजलिजा सा चेहरा
मैंने अब पहचान लिया है
और सच मानो
इस कड़वे सत्य को
स्वीकार कर पाना मेरे लिए
जितना दुष्कर है उतना ही
मर्मान्तक भी है 
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आज भी खड़े हो तुम 
उसी तरह मेरे सामने 
एक मुखौटा अपने मुख पर चढ़ाए 
नहीं समझ पाती 
क्या छिपाना चाहते हो तुम मुझसे 
क्यों ज़रुरत होती है तुम्हें 
मुझसे कुछ छिपाने की ! 
मुखौटे पर दो रचनाओं के माध्यम से अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हैं 
आदरणीय सुबोध सिन्हा जी-
 मुखौटा लघुकथा 

14 फ़रवरी, 2020 को रात के लगभग पौने नौ बज रहे थे।
 पैंतालीस वर्षीय सक्सेना जी भोजन तैयार होने की प्रतीक्षा में 
बस यूँ ही अपने शयन-कक्ष के बिस्तर पर अधलेटे-से गाव-तकिया 
के सहारे टिक कर अपने 'स्मार्ट मोबाइल फ़ोन' में 'फेसबुक' 
पर पुलवामा के शहीदों की बरसी पर श्रद्धांजलि-सन्देश प्रेषित कर स्वयं के
 एक जिम्मेवार भारतीय नागरिक होने का परिचय देने में तल्लीन थे।
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मुखौटों का है जंगल यहाँ, यहाँ लगता हर शख़्स शिकारी है
सच बोलना है ज़ुर्म यहाँ, यहाँ हुआ ये आज फ़तवा जारी है।
उम्मीद नहीं कि बचेगा बीमार, शायद ये अस्पताल सरकारी है
बच जाएगा पर, हर वो मुज़रिम जो नाबालिग बालात्कारी है
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प्रेम के मुखौटे 

ओढ़े दिखावटी प्रेम के मुखौटे
यह झूठे मुलाकातों के सिलसिले
संवेदनाएं मन की कहीं गुम हो गईं
बातों में सरसता छुप-सी गई
शर्तो के अनुबन्ध पर बंधा हर रिश्ता
कभी लगता अपना-सा कभी पराया
प्रेम की बदलने लगी है परिभाषा
प्रेम अब त्याग नहीं, सिर्फ पाने की आशा
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मुखौटा
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  सुहानी गहरी साँस लेते हुए बोली- हाँ , हम सब ने
 " दिखावट का मुखौटा " लगा रखा हैं। "
 मुखौटा " यानी एक चेहरे पर लगा दूसरा चेहरा ....
कभी- कभी तो एक ही चेहरे पर कई- कई मुखोटे लगे होते हैं....
कही, पाप के मुख पर पुण्य के मुखोटे....
कही, दुःख दर्द पर हँसी के मुखोटे.....
कही, बेबसी- लाचारी पर आत्मनिर्भरा के मुखोटे...
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नैनों के झरोखे से झरती ज़िंदगियाँ, 
नहीं देख सकती लवणता में डूबी सांसें, 
वे स्वार्थ का लबादा ओढ़े पीड़ा पहुँचाते हैं, 
नहीं छिपा सकती अपनी संवेदना  को।
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आज सफ़र यहीं  तक 
फिर मिलेंगे आगामी अंक में 
-अनीता सैनी 
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12 comments:


  1. मुखौटे के प्रति मेरा आकर्षण ' मेरा नाम जोकर' के पात्र राजू से हुआ । अपने दर्द को छिपाकर रंगमंच पर औरों के मनोरंजन के लिए मुस्कुराना कोई बुरी बात नहीं। लेकिन, इस सभ्य समाज में ऐसे तथाकथित जेंटलमैन हैं जो अपने मनोरंजन के लिए औरों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते रहते हैं। उनका यह बनावटी चेहरा समाज के विकास के लिए अत्यंत घातक होता है। परंतु यह तय है कि एक न एक दिन ऐसे लोग बेनक़ाब होंगे और मुखौटे के हटते ही उनका सच हर कोई जान लेगा।
    शब्द अधारित सुंदर चर्चा युक्त भूमिका और प्रस्तुति । मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका अत्यंत आभार। प्रणाम।

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  2. सुंदर चर्चा युक्त भूमिका और प्रस्तुति

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  3. शब्द सृजन-19 के अंक में मुखौटा पर पठनीय लिंकों के साथ सुन्दर चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार अनीता सैनी जी।

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  4. आज एक-एक चेहरा कई-कई मुखौटे रखने लगा है

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  5. अब तो कई मुखौटे वाले अपनी असली सूरत भी भूल जाते है, नशा होता है मुखौटे का भी
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  6. " मुखौटे " को परिभाषित करता बेहतरीन भूमिका के साथ शब्द -सृजन का सुंदर अंक ,सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई ,मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार अनीता जी

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  7. शब्द-सृजन के विषय 'मुखौटा' पर बहुत सुंदर सृजन हुआ जिसमें विभिन्न दृष्टिकोण उभरे हैं विचार-मंथन के लिए।मुखौटे के महत्त्व को स्पष्ट करती प्रभावी भूमिका।

    सभी सहभागी रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाएँ।

    मेरी रचना सम्मिलित करने हेतु बहुत-बहुत आभार अनीता जी।







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  8. मनभावन चर्चा प्रस्तुति, मुखौटे के कई रुप दर्शित हुये

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  9. आज के समाज के बाशिंदों के असली चेहरों पर लगे छद्म मुखौटों की पड़ताल करती सुन्दर प्रस्तुति ! मेरी दोनों रचनाओं को आज के अंक में स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार अनीता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  10. शब्द-सृजन की अत्यंत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति अनीता जी ।

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  11. बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार सखी।

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  12. मुखौटे पर बहुत शानदार भूमिका शानदार प्रस्तुति।
    सभी रचनाएं बहुत ही आकर्षक ,हृदय स्पर्शी।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय तल से आभार।

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