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Sunday, August 02, 2020

"मन्दिर का निर्माण" (चर्चा अंक-3781)

 मित्रों!
रविवासरीय चर्चा का कार्यभार 
मैंने विधिवत सम्भाल लिया है।
आज की चर्चा में कोई चित्र नहीं दोस्तों!
 आपके लिंक निम्न पाठ में निहित हैं।

         रक्षाबंधन के साथ ही सावन जा रहा है। क्यों, विश्वास नहीं हो रहा है ? नवगीत - '' फटी किनार लिये '' अच्छा बन पड़ा है। नया आकाश नई उमंगों के साथ श्री कृष्ण जन्मोत्सव से पूर्व ही अयोध्या में "मन्दिर के निर्माण का, स्वप्न हुआ साकार" । दिव्य-भव्य होगा भवन, मानक के अनुसार।। भाई-बहन के पावन त्यौहार की मोहब्बत में तुम कुछ यूँ भीग जाना। खण्डहर के शैतान लोगों को न्यायालय ने न्याय दिया है। राखी: बहन की रक्षा का व्रत लेने का पर्व है। चाय और कविता.... लत जी हाँ ये दर्द कब हद से गुजरेगा, कब दवा बनेगा

वक़्त का बदला है तेवर आजकल। वो वकालत काम किसके आ रही मारती जो सच यहाँ पर आज कल।।  34 वर्षों बाद देश में नई शिक्षा नीति का आगाज हुआ है। नई शिक्षा नीति का सबसे पहले तो इसलिए स्वागत है कि उसमें मानव-संसाधन मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय नाम दे दिया गया। मनुष्य को ‘संसाधन’ कहना तो शुद्ध मूर्खता थी।
मुस्लिम पन्थ से जुड़े लोगों को  ईद उल अज़हा की बहुत मुबारकबाद। पढ़िए एक कथा भी प्रतीक बना त्रिशंकु । भगवान हमेशा मेरे रोहित को खुश रखना बहुत दुख झेले हैं उसने। मन ही मन रिया रोहित की सलामती की दुआ माँगती है। है न अनोखी प्रीत । अवनी धमनी सी सखी प्रेम सुधा बरसाय । दूषित उसको क्यों करो ,सुन लो ध्यान लगाय।
        भतृहर‍ि ने कहा था- क्षत‍ि क्या है= समय पर चूकना… और हम ये क्षत‍ि बहुत पहले से करते आ रहे हैं, खासकर न्याय व्यवस्था में। जैसा दिखता वैसा होता नहीं आवश्यक न्याय‍िक सुधारों को लेकर समय पर चूकना आज हमें ऐसे दलदल में फंसा चुका है ज‍िससे न‍िकलने के आसार कहीं द‍िखाई नहीं दे रहे। आख‍िर ये भी तो कानून का मजाक उड़ाना ही है। 

       मुंशी प्रेमचंद का नाम हिन्दी और उर्दू के  लोग आज भी आदर के साथ लेते हैं।  ओ मेरे रफ़ूगर, अगर हो सके तो, सिल भी दे ये चाक-ए-जिगर। ऐ मेरे हक़ीम, है सब कुछ बेअसर, कुछ तो मर्ज़ की दवा कर। प्रेमचंद समस्या नहीं, समाधान के लेखक हैं 

      दिल नहीं लगता कहीं पर आज कल। वक़्त का बदला है तेवर आजकल। वो वकालत काम किसके आ रही मारती जो सच यहाँ पर आज कल। हम को तो गर्दिश-ए-हालात पे रोना आया। रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया। कितने बेताब थे रिम-झिम में पिएँगे लेकिन आई बरसात तो बरसात पे रोना आया ओ प्रेमिका! कुछ सोचते सोचते अचानक मुस्कुरा दोगी तो पागल लगोगी। नींद में सपने से डर कर अचानक उठ जाओगी तो बीमार दिखोगी। काम-काज छोड़ कर खिड़की पर टिकी रहोगी तो कामचोर बनोगी। अजनबी सा लग रहा घर आज कल गिन रहा पलछिन यहाँ पर आज कल।। बैठ कर आँसू बहाते हम जहाँ अब नही दिखता कहीं दर आज कल...!  
     ख़्यालों की देहरी से ... नववधू-सी पर ..  बिन वधू प्रवेश मुहूर्त के  वक्त-बेवक्त .. आठों पहर तुम्हारी यादों की दुल्हन  मेरे ज़ेहन की चौखट वाली ख़्यालों की देहरी से, लौट के...  दरिया रहा कश्ती रही लेकिन सफर तन्हा रहा...  कुण्डली नेकी करके नेक सी, न्यूज फीड पर डाल; वाह वाह होगी तभी, होगा मालामाल; होगा मालामाल, टिप्पणी खूब मिलेंगी; देख देख कर रंगत तेरी, खूब खिलेंगी; कर दहिया में वास, करो अब फेंका फेंकी; पता करेगा कौन, करी क्या सचमुच नेकी ।
      "मोर संग चलव" गीत ने वर्ष 1982 में छत्तीसगढ़ी गीत और संगीत को न केवल छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव तक पहुँचाने में क्रांतिकारी भूमिका निभायी बल्कि देश की सीमाओं से दूर सात समुन्दर पार तक पहुँचा दिया। आइए आज बताता हूँ कि 1982 में ऐसी कौन सी क्रांति हुई थी जिसके कारण छत्तीसगढ़ी गीत और संगीत छत्तीसगढ़ के गाँव से लेकर सात समुन्दर पार तक गूँज उठा था। मन ही मन में ...  करना सर्वेक्षण .. अवलोकन .! आया राखी का त्यौहार... ना तो गहमा गहमी बाजार में ना ही कोई उत्साह आम जन मानस में | हर ओर कोरोना महामारी का भय व्याप्त मार्ग सभी अवरुद्ध हुए है। मित्रता....सागर लहरेंबिलख बिलख वसुधा है रोती ...समझ नहीं कोई पाया हर्ष - विषाद उर में बस जाये प्रेम विशाल दिखा जाता , तब अंतर्मन संवाद करे नयन जलद सा खिल भाता , वीणा यादों की गान करे गीत पुरातन तब गाया , बिलख - बिलख वसुधा है रोती समझ नहीं कोई पाया। विरानों में पदचिन्ह विराने समेटे कितने पदचिन्ह अपने हृदय पर अंकित घाव जाता हर पथिक छोड छाप अगनित कहानियां दामन में जाने अन्जाने राही छोड जाते। टूटा-टूटा मन का दर्पण... जाने क्या-क्या करा गया बिखर रहे माला के मनके जीते-जी ज्यूँ मरा गया। 
इति चर्चा कथा!

10 comments:

  1. सुन्दर लिंक्स. मेरी कविता शामिल करने के लिए आभार.

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  2. वाह अद्भुत प्रस्तुति। मेरी रचना को मंच पर स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय।

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  3. आदरणीय शास्त्री जी, इतने सारे लिंको को एक सुत्र में बांधना...ये कार्य आप ही कर सकते हो! मेरी रचना को चर्चा अंक में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  4. वाह वाह ! प्रस्तुति का यह अंदाज़ भी बहुत भाया ! मेरी कहानी 'त्रिशंकु' को आज की चर्चा में स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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  5. एकदम नायाब संयोजन...

    "खुल जा सिम सिम " जैसी तिलस्मी चर्चा ... बहुत शानदार 🌹
    आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी, मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार 💐🙏

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  6. चर्चा मंच प्रबंधन से जुड़े सभी सदस्यों हृदय से आभारी हूँ, खासकर आदरणीय मयंक सर का... वैसे पहले वाले संयोजनों का तरीका मेरे हिसाब से ज्यादा बेहतर था कि जिसमें सभी रचनाओं की अपनी एक छवि स्पष्ट रूप से दिखती थी। और एक राय ये भी है कि प्रत्येक चर्चा के शीर्षक किसी विशेष विषय वस्तु पर आधारित न होकर सामान्य हों तो बेहतर रहेगा... ताकि हर रचना के साथ उनका संबंध स्थापित हो सके... उदाहरण के तौर पर इस बार का शीर्षक राम मंदिर निर्माण है जबकि ज्यादातर रचनाओं का इस विषय से कोई लेना देना ही नहीं है... ये मेरी अपनी व्यक्तिगत राय है बाकी आप सबको बेहतर पता होगा कि ऐसा किसलिये किया जाता है...

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  7. आदरणीय मयंक जी , पहले का रूप अच्छा था | जिसमें सभी की रचनाओं को अलग से देखा जा सकता था | किन्तु आपने यदि ऐसा किए हैं तो बहुत ही सोच - विचार कर ही किया होगा | सभी रचनाएँ बहुत ही शानदार बन पड़ी हैं |आपने '' फटी किनार लिए '' नवगीत शामिल किया इसके लिए बहुत - बहुत आभार |शानदार प्रयास है |

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  8. सुप्रभात
    मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद सर |उम्दा संकलन आज का |

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  9. रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभ कामनाएं |

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  10. प्रस्तुति का नया तरीका अगर एक प्रयोग है तो मेरी राय में पहले ज्यादा सहज और सुचारू था हालांकि काफी मेहनत दिख रही है एक तारतम्य बिठाने में।
    सुंदर लिंक सभी रचनाकारों को बधाई मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय तल से आभार।

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