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Tuesday, February 09, 2021

"मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव"(चर्चा अंक- 3972)

 सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से )

"ऋतुओं का राजा हमेंदेता है सन्देश।
दिल से सच्चे मिलन काउपजाओ परिवेश।।
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छोड़ो ढोंग-ढकोसलेतजो पश्चिमी रीत।
अमर हमेशा जो रहेवो होती है प्रीत।।"
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इन चंद पंक्तियों में शास्त्री सर जी ने इतना सुंदर संदेश दे दिया है कि-
प्रेम-दिवस पर इससे ज्यादा कुछ कहने को बचा ही नहीं
तो इसी संदेश को आत्मसात करते हुए चलते हैं.... 
आज की कुछ खास रचनाओं की ओर.... 
इनमे प्यार का आगाज भी है...वासंती वयार भी है...माँ का दुलार भी है..
और प्रकृति की परवाह भी है  
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 दोहे "मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव"

 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

राजनीति जैसा हुआआज प्रणय का खेल।
झूठे हैं प्रस्ताव सबझूठा मन का मेल।।
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मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव।
खींचातानी में भला, कैसे हो समभाव।।
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एक गीत-नदियों में कंचन मृग सुबहें वो शाम कहाँ

नदियों में

कंचन मृग 

सुबहें वो शाम कहाँ ?

धुन्ध की

किताबों में

सूरज का नाम कहाँ ?

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वैलेंटाइंस डे(Valentine's day)
मैेरिज डे क्यों नहीं होता ये  एक शोध का विषय है। चॉकलेट खिला दी। गुलाब दे दिया। टेडी बेयर दिया। फ्लर्ट  किया,  प्रॉमिस किया,, गले लगाया,  किस किया,  प्रपोज किया, वेलेंटाइन वाले दिन साथ-साथ घूमे-फिरे, सारे अरमां पूरे कर लिये, एक दूसरे को दिल के आकार वाले लाल-गुलाबी गुब्बारे थमा दिए, साथ में खाया-पिया। संस्कारी योद्धाओं से भी पिटाई खाई और इज़हार-ए-इश्क भी किया। लेकिन सारा कार्यक्रम ब्रेकअप डे तक ही चलता है क्योंकि अगले दिन थप्पड़ डे होता है। 
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सुनो ना मां दुनिया अच्छी नहीं है

बादल की पीठ पर

कुछ 

गहरे निशान हैं

जो

फुटपाथ 

तक 

नज़र आ रहे हैं।

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पक्षियों से ली सीख


कबूतर  तुम्हारा  नियमित  आना

समय से दाना चुगना

वख्त की अहमियत समझना

 यही  है मूल मन्त्र जीवन पथ पर 

अग्रसर होने का |

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५३२. गुलाब

असली गुलाब चाहिए,

तो कांटे भी स्वीकार करो,

वरना काग़ज़ के गुलाब ढूंढो,

उनमें न सुगंध होगी,न कांटे,

कांटे हुए भी, तो चुभेंगे नहीं.

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नाविक भी हो मीत पुराना

हो नाव में सुराख़ न कोई 

नाविक भी हो मीत पुराना,

लहरों पर उठते-गिरते ही 

कट जायेगा सफर सुहाना !

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हाल होते जा रहे बदतर, हवा ख़ामोश है 

फूल के बदले मिले पत्थर, हवा ख़ामोश हैं 


नष्ट होती जा रही है उर्वरकता ख़्वाब की 

भावनाएं हो रहीं बंजर, हवा ख़ामोश है 

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दोहे 
"सहमा हुआ पहाड़"  

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दरक रहे हैं ग्लेशियर, सहमा हुआ पहाड़।
अच्छा होता है नहीं, कुदरत से खिलवाड़।।
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प्रान्त उत्तराखण्ड में, सहम गये हैं लोग।
हठधर्मी विज्ञान की, आज रहे हम भोग।।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक', उच्चारण  
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आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दें। 
आप सभी स्वस्थ रहें,सुरक्षित रहें। 
कामिनी सिन्हा 
--

13 comments:

  1. असीम शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका
    श्रमसाध्य कार्य हेतु साधुवाद

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  2. बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार आदरणीयाै कामिनी सिन्हा जी।

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  3. उम्दा प्रस्तुति आज के चर्चामंच की |मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार सहित धन्यवाद कामिनी जी |

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  4. विविध प्रकार की रचनाओं से सुसज्जित, सुन्दर चर्चामंच प्रस्तुति के लिए कामिनी सिन्हा जी का आभार। चर्चामंच का हिस्सा होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।

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  5. सामयिक विषयों पर सुंदर प्रस्तुति, आभार !

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  6. जी बहुत आभार...। सभी रचनाएं उम्दा हैं...। शुभकामनाएं...

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  7. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  8. सुंदर अंक है प्रिय कामिनी। अच्छी रचनाएँ हैं।

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  9. मोहक रंगों में सजी चर्चा,
    सुंदर प्रस्तुति

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  10. बेहतरीन लिंकों से सजा सुंदर चर्चा अंक कामिनी जी !

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  11. सराहनीय अंक कामिनी जी बहुत सुन्दर लिंक संयोजन ।
    सभी रचनाएं बहुत आकर्षक सुंदर, रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
    मेरी रचना को चर्चा में स्थान देने के लिए आत्मीय आभार।
    सादर।

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  12. आप सभी स्नेहीजनों को तहेदिल से शुक्रिया एवं सादर नमस्कार

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  13. बेहतरीन चर्चा.मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार।

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