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Sunday, February 14, 2021

"प्रणय दिवस का भूत चढ़ा है, यौवन की अँगड़ाई में" (चर्चा अंक-3977)

१४  फरवरी दुनियाभर में प्रेमी–प्रेमिका, प्रेम और प्रेम करने वालों के लिए प्रणय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

वैलेन्टाइन-डे का इतिहास 
जिसे लोग प्यार का त्यौहार मानकर सेलिब्रेट करते हैं। भारत में लोग अपने पार्टनर को तोहफे, चॉकलेट आदि देकर प्यार का जश्न मनाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं? 

प्रणय दिवस के मूल में एक दुखद कहानी है। 'ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिन' नाम की पुस्तक में वैलेंटाइन का जिक्र है यह दिवस रोम के एक पादरी संत वैलेंटाइन के नाम पर मनाया जाता है। बताया जाता है कि संत वैलेंटाइन दुनिया में प्यार को बढ़ावा देने में मान्यता रखते थे, लेकिन रोम में एक राजा को उनकी ये बात पंसद नहीं थी और वो प्रेम विवाह को गलत मानते थे। सम्राट क्लाउडियस को लगता था कि रोम के लोग अपनी पत्नी और परिवारों के साथ मजबूत लगाव होने की वजह से सेना में भर्ती नहीं हो रहे हैं. इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए क्लाउडियस ने शादी और सगाई पर पाबन्दी लगा दी थी। पादरी वैलेंटाइन ने सम्राट के आदेश को लोगों के साथ नाइंसाफी के तौर पर महसूस किया. उन्होंने इसका विरोध करते हुए कई अधिकारियों और सैनिकों की शादियां भी करायीं जिसके फलस्वरूप सन्त वैलेंटाइन को 14 फरवरी को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। उस दिन से हर साल 14 फरवरी को प्रणयदिवस के रूप में मनाया जाता है। संत वैलेंटाइन ने जेल में रहते हुए जेलर की बेटी को खत लिखा था, जिसमें अंत में उन्होंने लिखा था "तुम्हारा वैलेंटाइन."। 

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प्रणय सप्ताह की अन्तिम कड़ी

प्रणय दिवस पर देखिए 
मेरी पसन्द के कुछ लिंक!
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गीत"पागल मधुकर घूम रहे आवारा हैं"
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वासन्ती परिधान पहनकर, मौसम आया प्यारा है।
कोमल-कोमल फूलों ने भी, अपना रूप निखारा है।। 
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प्रणय दिवस का भूत चढ़ा है, यौवन की अँगड़ाई में,
छल-फरेब का चलन बढ़ा है, पूरब की पुरवाई में,
रस के लोभी पागल मधुकर, घूम रहे आवारा हैं।
कोमल-कोमल फूलों ने भी, अपना रूप निखारा है।। 
उच्चारण  
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"पीला गुलाब " 

मैं बड़ी तन्मयता से लैपटॉप पर अपने काम में बीजी थी तभी, राज और सोनाली मेरे पास आकर खड़े हो गए। मैंने सर उठाये बिना ही सवाल किया-क्या बात है ? मम्मी बिज़ी हो क्या....कुछ खास नहीं, बोलो -मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा। दोनों के चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ  शर्म और  घबड़ाहट भी साफ़-साफ़ नजर आ रही थी । मम्मी..पहले आप आँखें बंद करों, राज आपको कुछ देना चाहता है - सोनाली ने धीरे से कहा। मैंने जैसे ही राज की तरफ देखा वो भागकर कमरे के बाहर चला गया। मैं सब समझ रही थी फिर भी आँखे बंद करते हुए बोली-लो कर लिया,अब बोलो। दोनों ने मेरी गोद में एक-एक "पीला गुलाब" रखा और भाग खड़े हुए।

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इस शहर में |  ग़ज़ल |  डॉ. वर्षा सिंह |  संग्रह - सच तो ये है 

इक ख़बर अख़बार में छपने-छपाने चल पड़ी 

बात उसकी, कौन जाने किस बहाने चल पड़ी 


एक लड़की सिसकियों का बोझ कांधे पर लिए 

उम्र का पूरा सफ़र तन्हा बिताने चल पड़ी


लोग चर्चा कर रहे थे देश के हालात पर 

और मां बच्चे के ख़ातिर दूध लाने चल पड़ी 

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अगर तुम साथ हो प्रधानमंत्री जी के द्वारा घोषित देश व्यापी लॉकडाउन का टीवी पर सुन कर मलिक साहब और शकुन्तला देवी एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे | " मलिक साहब ...! अब क्या होगा ? " "अब...?" दोनों चुप रहे | परेशानी की बात तो थी ही ... तिहत्तर-चौहत्तर के लगभग मलिक साहब हैं तो शकुन्तला देवी भी उनसे दो-तीन साल छोटी होंगी ! उनके चार बच्चे हैं... दो बेटियाँ-दो बेटे ... साथ कोई नहीं रहता है | बेटे विदेश में है तो बेटियाँ अपने-अपने घरों में मस्त और व्यस्त है | गाँव में पले बढ़े मलिक साहब रेलवे में नौकरी करते थे | विवाह होते ही पत्नी को साथ ले आये | फिर गाँव कम ही गये | जहाँ नौकरी ले गई वहीं चले गये...
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आँसू के रूप 
झिमिर झिमिर 
ठहर ठहर 
बूँदों का बरसना 
आँचल में ठहरना 
देख मैं हुई अचंभित 
सशंकित 
भी !
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गदा, उल्लू व कुतका वर्षों से चली आ रही बहुतेरी कहावतों या मुहावरों के शाब्दिक अर्थ कुछ होते हैं गूढ़ार्थ कुछ और ! हो सकता है कि ऐसा जाने-अंजाने, कलीष्ट शब्दों के सहजीकरण या फिर नासमझी के कारण होता चला गया हो। या फिर आत्मश्लाघि, नीम-पंडितों और विद्वान व्याकरण के ज्ञाताओं के दिमाग की उपज हों। प्रस्तुत है ऐसी ही कुछ बातों का लेखा-जोखा !  
गगन शर्मा,  कुछ अलग सा 
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जेलों में जिस्म तो क़ैद रहे... 

जेलों में 
जिस्म तो क़ैद रहे 
मगर जज़्बात 
आज़ाद रहे
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तुम्हारा वंदन 

 हे हरी तेरा वंदन

 मन को बड़ा सुकून देता

ज़रा समय भी बदलता

बेचैन किये रहता है | 

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जो बंदिशे नहीं होंगी..  निश्चल प्रेम भी नहीं होगा.. 
जो बंदिशे नहीं होंगी..
निश्चल प्रेम भी नहीं होगा..।
मिलन में कोई मतलब हो सकता है..
ना मिले ..और प्रेम हो जाय सदा के लिए..
बस वही तो मन का प्रेम होगा..। 
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सही दिशा 
उठो अब जागो !
दरवाज़ा कोई
खटखटा रहा,
आतुर है तुम्हें 
बुलाने को,
साथ ले जाने को ।

बाहर निकलो ।
देखो दुनिया की 
रौनक, चहल-पहल ।
काम पर सब के सब 
निकल पड़े  हैं ।
नूपुरं noopuram, नमस्ते namaste  
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आकाश पार कहीं 
हिय की मरुधरा, उभरने दो किशलय
प्रणय को नर्म माटी से ज़रा ज़रा।
ये सच कि हर एक ख़्वाब की
ता'बीर नहीं होती, फिर
भी तेरी आँखों की
गहराइयों में,
ज़िन्दगी
डूब
के तलाशता है अक्षय प्रेम की विलुप्त
मणि, ये खोज है, कई जन्मों से 
शांतनु सान्याल, अग्निशिखा : 
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एक ग़ज़ल- ये गंगा माँ निमन्त्रण के बिना सबको बुलाती है 

गले में क्रॉस पहने है मगर चन्दन लगाती है

सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है

ये नाटक था यहाँ तक आ गए संतों के हत्यारे

सुपर्णखा बनके जैसे राम को जोगन रिझाती है 

जयकृष्ण राय तुषार, छान्दसिक अनुगायन 
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ग़ज़ल  (हर सू बीमारी नहीं तो) 
हर सू बीमारी नहीं तो और क्या है दोस्तो,
ज़िंदगी भारी नहीं तो और क्या है दोस्तो।

रोग से रिश्वत के कोई अब नहीं महफ़ूज़ है,
ये महामारी नहीं तो और क्या है दोस्तो। 
Basudeo Agarwal 'Naman',  
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आज का उद्धरण 
विकास नैनवाल 'अंजान', एक बुक जर्नल  
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वो बचकानी बातें ... 

दस पैसे का 

एक सिक्का

जेबख़र्च में 

मिलने वाला

रोजाना कभी,

किसी रोज

रोप आते थे

बचपन में

चुपके से 

आँगन के

तुलसी चौरे में  

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बहुत कुछ कहती है अमेजॉन पर ब‍िक रही  ये ऐश ट्रे 
शाद लखनवी का एक शेर है –

बुझ गई आतिश-ए-गुल देख तू ऐ दीदा-ए-तर

क्या सुलगता है जो पहलू में धुआँ है कुछ और…

ये शेर उस खबर पर पूरी तरह फ‍िट बैठता है जो अमेजॉन के मार्केट प्लेटफॉर्म से आई है, ऑनलाइन बाज़ार की सरताज बनी अमेजॉन पर एक ऐश ट्रे बिक रही थी, ऐश ट्रे की बनावट मह‍िलाओं का सरेआम अपमान करने के ल‍िए काफी थी, इसका ड‍िजाइन कुछ ऐसा था जैसे कोई औरत अपनी टांगें फैलाकर बैठी है और आप उसकी टांगों के बीच में सिगरेट बुझा सकते हैं। हालांक‍ि अब ‘संभवत:’ वह हटा ली गई है, मगर इस एक बात ने ये अवश्य बता द‍िया क‍ि मह‍िलाओं के शरीर की बनावट को लेकर जो मानस‍िकता अब भी बरकरार है, उसे बाज़ार में क‍िस क‍िस तरह भुनाया जा सकता है।

बानगी ही सही, परंतु अमेजॉन पर ब‍िक रही इस ऐश ट्रे की ड‍िजाइन से अंदाज़ा लगाया जा सकता है क‍ि स‍िगरेट पीने वाले व्यक्त‍ि के मन में उसे बुझाते हुए क्या व‍िचार उठते होंगे और उन व‍िचारों की पर‍िणत‍ि क‍िस क‍िस रूप में होने की संभावनायें रहती होंगी। 

देश के लगभग सभी मह‍िला अध‍िकारवादी संगठन जो क‍िसी बलात्कार की घटना पर ज़ार-ज़ार रोते हैं, ज‍िन्हें उसमें ‘दल‍ित… वंच‍ित…,अल्पसंख्यक…ल‍िंच‍िंग’ तक सब नज़र आ जाता है परंतु वे अपनी न‍िगाहें बाज़ार, मीड‍िया, समाचारपत्रों के ” इस हथकंडे” की ओर नहीं डालते। वे इस तरह से बाज़ार में परोसे जा रहे अपराध पर चुप क्यों हैं? 

Alaknanda Singh, अब छोड़ो भी 
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आज के लिए बस इतना ही...!
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8 comments:

  1. सुप्रभात आदरणीय शास्त्री जी 🙏
    आज की चर्चा बेहतरीन लिंक्स के खजाने का पर्याय है। सचमुच आप महासागर से मोती चुनने में माहिर हैं। बहुत बधाई और शुभकामनाएं 🙏
    मेरे लिए गर्व का विषय है यह कि मेरी पोस्ट का लिंक भी इस चर्चा में शामिल किया है आपने, हार्दिक आभार आपका 🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

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  2. सुप्रभात
    उम्दा चर्चा
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए धन्यवाद सर |

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  3. सभी रचनाएँ अपने आप में अद्वितीय हैं मुग्ध करता हुआ चर्चा मंच, मुझे शामिल करने हेतु असंख्य आभार - - नमन सह।

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  4. सभी रचना बहुत ही मनभावन है
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार

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  5. हार्दिक आभार आपका |प्रेम दिवस की शुभकामनायें |

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  6. सभी गुरुजनों को मेरा नमन..
    सादर आभार मेरी कविता शामिल करने के लिए..

    शुभ दिवस

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  7. बेहतरीन रचनाओं का चयन,बहुत ही सुंदर प्रस्तुति आदरणीय सर,मेरी रचना को भी मान देने के लिए हृदयतल से आभार एवं सादर नमन

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  8. बेहद सुंदर चर्चा प्रस्तुति

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