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Saturday, February 27, 2021

'नर हो न निराश करो मन को' (चर्चा अंक- 3990)

 शीर्षक पंक्ति: राष्ट्रकवि कविवर मैथलीशरण गुप्त जी। 

सादर अभिवादन। 
शनिवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

राष्ट्रकवि कविवर मैथलीशरण गुप्त जी ने नैराश्य से उबारने और रग-रग में उमंग और उत्साह भरने में उनका रचा एक काव्यांश पढ़िए-

"करके विधिवाद खेद करो,
निज लक्ष्य न्निरंतर भेद करो।
बनता बस उद्यम ही विधि है,
मिलती जिससे सुख की निधि है।
समझो धिक निष्क्रिय जीवन को,
नर हो, निराश करो मन को।"

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-   

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इंजन चलता सबसे आगे।
पीछे -पीछे डिब्बे भागे।।

हार्न बजाताधुआँ छोड़ता।
पटरी पर यह तेज दौड़ता।।
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प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को
 
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भटक गए है कुछ रास्ते मेरे
तलाश ज़ारी है इस घनी आबादी में
हर तरफ जहां दिखता है अंधेरा मुझे
फूटती है रोशनी की किरण उस चारदीवारी में
आसान नहीं होता भूल जाना किसी को
फिर चाहे दुनियां बना क्यों न ले 
वक़्त को मलहम
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तुम्हारे साथ मिलकर मैं यमन का राग गाऊँगा 
अभी से शाम का मंज़र ये सिंदूरी बना लेना 
तवे की रोटियों का स्वाद ढाबों में नहीं मिलता 
मगर जब भूख हो  रोटी को तन्दूरी बना लेना 
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कलम लिखती मसी बहती,नयी रचना मुखर होती।
लिखे कविता सरस सुंदर, नवल रस के धवल मोती।
चटकते फूल उपवन में ,दरकती है धरा सूखी।
कभी अनुराग झरता है, कभी ये ओज से भरती।।
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आवो हवा जमाने कि जो रही है मिल , 
कुछ इस तरह से हो गई है कातिल , 
कि घायल हो रहे है अब तो कई दिल , 
पता नहीं दिलों पर और कितना सितम ढाते हो  ।
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मैं रोज़ देखता हूँ 
कि शरीर मज़बूत होते जाते हैं 
और आत्माएं कमज़ोर,
आख़िर में शरीर बच जाता है 
और आत्मा मर जाती है.
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अपनी जवानी को 
गृहस्थी के 
हवन कुंड में तपाकर
सुनहरे रंग की हो चुकी
बूढ़ी महिलाएं
अपने अपने घरों से निकलकर
इकठ्ठी हो गयी हैं
--

कांपती हैं पत्तियां बीमार-सी 

अब हवा भी वायरस से है विकल 


इन दिनों लड़की से कहते हैं सभी 

हो गई है शाम, घर से मत निकल

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पान लगे कड़ुआ सखी

सरसों   फूली  खेत  मेंकंत पड़े परदेश
सब कहते मधुमास हैलगता विरही वेश।।
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अमराई  की  देह  मेंव्यापा  सूखा  रोग
पंचम सुर भी खटकते,ज्यों विष का हो भोग।।
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 बाणों से हत हाथी-घोड़े, तथा मनुष्य भी जो मृत हों 
गीदड़ आदि माँसभक्षी पशु, इधर-उधर घसीटें उनको  
सेना सहित भरत का वध कर, शस्त्र ऋण से उऋण होऊँगा 
इसमें संशय नहीं मुझे,  हर अपमान का बदला लूँगा 
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युद्धविराम की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि भारतपाकिस्तान के साथ सामान्य पड़ोसी जैसे रिश्ते चाहता है और शांतिपूर्ण तरीके से सभी मुद्दों को द्विपक्षीय ढंग से सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा, ‘भारतपाकिस्तान के साथ सामान्य पड़ोसी जैसे रिश्ते चाहता है और शांतिपूर्ण तरीके से सभी मुद्दों को द्विपक्षीय ढंग से सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है।’ दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम को लेकर फैसला बुधवार आधी रात से लागू हो गया।
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आज का सफ़र यहीं तक 
फिर फिलेंगे 
आगामी अंक में 

15 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. बढ़िया चर्चा
    बढ़िया लिंक्स
    धन्यवाद

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  3. आदरणीय सभी प्रस्तुतियां बहुत सुंदर , सभी को बहुत बधाइयां । । मेरी रचना को चर्चा में शामिल करने के लिए बहुत धन्यवाद ।

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  4. उपयोगी लिंकों के साथ सुन्दर चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार अनीता सैनी दीप्ति जी।

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  5. सुन्दर चर्चा.मेरी रचना को शामिल करने के लिए धन्यवाद.

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  6. राष्ट्रकवि कविवर मैथलीशरण गुप्त जी की कविता से सजी भूमिका और अत्यंत सुन्दर सूत्र संकलन । सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई ।

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  7. बेहतरीन लिंकों से सजा सुंदर चर्चा अंक,सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं सादर नमन

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  8. अच्छा संकलन !
    :
    पर जिन्होंने टिप्पणियों के लिए अनुमोदन की शर्त लगा रखी है, उन पर विचार करना उचित नहीं होगा

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  9. बहुत सुंदर सूत्र संयोजन
    सभी रचनाकारों को बधाई
    मुझे सम्मलित करने का आभार

    सादर

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  10. मेरी पसंद को सबकी पसंद बानने के लिए हार्दिक आभार, अनिता जी , बेहतरीन संकलन ,सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई सादर नमन

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  11. बेहतरीन प्रस्तुति।

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  12. प्रिय अनीता सैनी 'दीप्ति' जी,
    इस बेहतरीन चर्चा को संजोने में आपने मेरी ग़ज़ल को भी शामिल कर मुझे उपकृत किया है।
    हार्दिक आभार आपका 🙏
    सस्नेह,
    शुभकामनाओं सहित,
    डॉ. वर्षा सिंह

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  13. शानदार पंक्तियां गुप्त जी की भूमिका को उत्कृष्टता देती।
    मनोहारी लिंक मोहक सामग्री।सभी रचनाएं बहुत आकर्षक पठनीय।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय तल से आभार।
    सादर।

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