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Tuesday, February 16, 2021

"माता का करता हूँ वन्दन"(चर्चा अंक-3979)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से )

जिन देवी की कृपा हुई है,
उनका करता हूँ वन्दन।
सरस्वती माता का करता,
कोटि-कोटि हूँ अभिनन्दन।।
--
आप सभी को बसंत-पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 
माँ सरस्वती की चरण-वंदना करते हुए चलते हैं... 
आज की कुछ खास रचनाओं की ओर...
********* 

 कविता "माता का करता हूँ वन्दन"

 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मैं तो केवल जाल-जगत पर,
इन्हें लगाता जाता हूँ।
क्या कुछ लिख मारा है,
मुड़कर नही देख ये पाता हूँ।।
********************

नव अभिज्ञान - -
आसमान, स्मृतियों में कहीं न कहीं,- -
हम तुम अभी तक हैं, नए रूप में
विद्यमान, झरते पत्तों के
ठीक पीछे होते हैं नए
कोपलों के अदृश्य
अभिज्ञान।

**************************
कब और कैसे भारत, इंडिया हो गया
ये तो सिर्फ एक बानगी है कि कैसे, 
ऐसे कुछ ज्ञानियों ने दूध का 
दही और दही का रायता बना दिया होगा ! क्यूँ-कब-कैसे धीरे-धीरे कुछ का कुछ हो जाता है, क्या से क्या हो जाता है, महसूस ही नहीं हो पाता ! कब असल एक किनारे हो नए को जगह दे देता है, एहसास ही नहीं होता ! और एक बार चलन में आने के बाद वही असली लगने लगता है ! पुराने को कोई याद भी नहीं करता ! *************
एक कशमकश
रोकती रही, ये कशमकश,
कर गई, कुछ विवश,
छिन चला,
इस मन का वश,
पर रहा खुला, ये मन का द्वार,
सोचता हूँ,

*************************
 लिफाफे के बाहर जो पड़ा है ख़त 
उस ख़त में ऐसा तो कुछ लिखा  नहीं ।
जैसा कि हाथ फेर महसूस.... किया मैंने ।
*******************

एक ही शब्द भावात्मकता दर्शाता

 जिसकी है जैसी नजर वही उसे वैसा नजर आता  

प्रणय प्रीत की भावना होती केवल अपनों के लिए

गैरों के लिए किये उपयोग गलत मनोंव्रत्ति दरशाता 

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ऋतुराज आए हैं

फिर उलझ गई 

पैरों से झाँझर खिसक गई 
क्या सुन्दर थी 
मन मुंदर थी 
बजती थी झनन झनन 
कानों में खनन खनन 
मधुर रस बरबस 
बिहँस बिहँस 
घोलती थी 
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'चल बिटिया स्कूल चलें हम '

आज प्रस्तुत है बच्चों के लिए लिखी गई विश्वमोहन कुमार की कविता 'चल बिटिया स्कूल चलें हम ' हमारे You Tube chanal Indradhanushi duniya पर....

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**************************अंग्रेजी के अल्फाबेट्स पर बहुत कुछ पढ़ा होगा आपने आज पढ़ें... हिंदी वर्णमाला के क्रम से कवितामय प्रयोग.... अनाम कवि की रचना....

चानक 
आकर मुझसे 
इठलाता हुआ पंक्षी बोला  
ईश्वर ने मानव को तो 
उत्तम ज्ञान-दान से तौला 
ऊपर हो तुम सब जीवों में 
ऋषितुल्य अनमोल 
एक अकेली जात अनोखी 
ऐसी क्या मज़बूरी तुमको 
ओट रहे होठों की शोखी 
और सताकर कमजोरों को 
अंग तुम्हारा खिल जाता है 
अ:तुम्हे क्या मिल जाता है 
कहा मैंने-कि कहो 
खग आज सम्पूर्ण 
गर्व से कि-हर आभाव में भी 
घर तुम्हारा मजे से 
चल रहा है 
छोटी सी- टहनी के सिरे की 
जगह में,बिना किसी 
झगड़े के,ना ही किसी 
टकराव के पूरा कुनबा पल रहा है 
ठौर यही है उसमे 
डाली-डाली, पत्ते-पत्ते 
ढलता सूरज 
तरावट देता है 
थकावट सारी,पूरे
 दिवस की-तारों की लड़ियों से 
धन-धन्य की लिखावट लेता 
नादान नियति से अनजान अरे 
प्रगतिशील  मानव  
फ़रेब के पुतलो 
बन बैठेहो समर्थ 
भला याद कहाँ तुम्हे 
मनुष्यता का अर्थ ?
यह जो थी प्रभु की 
रचना अनुपम...
वशीभूत होकर 
शर्म-धर्म सब तजकर 
षड्यंत्रों के खेतों में 
सदा पाप बीज बो कर 
होकर स्वयं से दूर 
क्षणभगुंर सुख में अटक चुके हो 
त्रास को आमंत्रण करते 
ज्ञान-पथ से भटक चुके हो 

**********************

आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दें। 
आप सभी स्वस्थ रहें,सुरक्षित रहें। 
कामिनी सिन्हा 
--

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर चर्चा।
    बसन्त पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    आपका आभार कामिनी सिन्हा जी।

    ReplyDelete
  2. वसन्त पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌺🌷🌾🌷🌾🍁
    इस ख़ूबसूरत चर्चा में मेरी पोस्ट को शामिल करने हेतु हार्दिक आभार प्रिय कामिनी सिन्हा जी।
    सस्नेह,
    डॉ. वर्षा सिंह

    ReplyDelete
  3. बसंत की उत्सव जैसा रंगीन चर्चा प्रस्तुति

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति, बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐

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  5. आप सभी को हृदयतल से धन्यवाद एवं सादर नमस्कार

    ReplyDelete
  6. सुंदर रचनाओं का संकलन।
    मेरी रचना को शामिल करने हेतु हार्दिक आभार कामिनी जी।
    सादर।

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर और सराहनीय चर्चा प्रस्तुति कामिनी जी!

    ReplyDelete

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